मीराबाई के भक्ति-रस से सराबोर यह पद "अब तो मान कहयो मेरी मांय, म्हाने सावंरियो परणाय" राजस्थानी-मारवाड़ी मिश्रित भाषा में रचा गया एक अमर भजन है, जिसमें मीरा अपनी माता को संबोधित करते हुए कहती हैं कि हे मां! अब तो मेरा मन मान गया है, मेरा विवाह तो सांवरे (श्रीकृष्ण) से ही होगा। यह पद मीरा की अटूट भक्ति, सांसारिक बंधनों से मुक्ति और प्रभु-प्रेम की पराकाष्ठा का प्रतीक है। भजन में मीरा राणा के भेजे विष-प्याले, सर्प-पिटारे और अन्य कष्टों का वर्णन करते हुए यह दर्शाती हैं कि कैसे श्रीकृष्ण की कृपा से हर विष अमृत बन जाता है। यह भजन विशेष रूप से मीरा-भजन, कृष्ण-भक्ति, कीर्तन, जागरण और भक्ति-संध्या के अवसरों पर गाया जाता है। इसकी भाषा में राजस्थानी का माधुर्य और भक्ति का भाव ऐसा है कि श्रोता स्वयं को मीरा की भक्ति-धारा में बहता हुआ अनुभव करता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
अब तो मान कहयो मेरी मांय, म्हाने सावंरियो परणाय
अब तो मान कहयो मेरी मांय, म्हाने सावंरियो परणाय
अब तो मान कहयो मेरी मांय, म्हाने सावंरियो परणाय।
सांवरियो प्रणाय मात मेरी सांवरियो प्रणाय,
मात मेरी सांवरियो प्रणाय।
ऐसे वर को क्या वरु, ऐ जो जन्मे और मर जाय,
मात मेरी जन्मे और मर जाय,
वर पायो मेरो साँवरो, ऐ मेरो चुड़ो अमर हो जाय,
मात मेरी चूड़ो अमर हो जाय,
मात मेरी सांवरियो प्रणाय।
अब तो मान कहयो मेरी मांय, म्हाने सावंरियो परणाय।
सर्प पिटारा राणा भेज्या, म्हाने सर्प न डस्यो जाय,
मात मेरी सर्प न डस्यो जाय,
साँवरो मेरे सिर पै बैठो, ऐ म्हारो सर्प न डस्यो जाय,
मात मेरी सर्प न डस्यो जाय।
अब तो मान कहयो मेरी मांय, म्हाने सावंरियो परणाय।
जहर प्यालो राणा भेज्या, म्हाने जहर न लाग्यो जाय,
मात मेरी जहर न लाग्यो जाय,
साँवरो मेरे सिर पै बैठो, ऐ म्हारो जहर न लाग्यो जाय,
मात मेरी जहर न लाग्यो जाय।
अब तो मान कहयो मेरी मांय, म्हाने सावंरियो परणाय।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, म्हाने दरस दिखाओ जाय,
मात मेरी दरस दिखाओ जाय,
चरणों में बलि जाऊं, ऐ म्हारो दरस दिखाओ जाय,
मात मेरी दरस दिखाओ जाय।
अब तो मान कहयो मेरी मांय, म्हाने सावंरियो परणाय।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का केंद्रीय भाव यह है कि मीराबाई अपनी माता से कहती हैं कि उनका मन अब पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित हो चुका है। "अब तो मान कहयो मेरी मांय" का अर्थ है — हे मां, अब मेरा मन मान गया है, अर्थात मेरे भीतर कोई द्वंद्व शेष नहीं रहा। "म्हाने सावंरियो परणाय" का अर्थ है — मेरा विवाह तो सांवले श्रीकृष्ण से ही होगा। यह केवल एक सांसारिक विवाह की बात नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन है — जिसे भक्ति-साहित्य में 'आत्म-विवाह' या 'ब्रह्म-विवाह' कहा जाता है।
मीरा कहती हैं कि ऐसे वर से विवाह करने का क्या लाभ जो जन्म लेता है और मर जाता है? परंतु मेरा वर तो सांवरा श्रीकृष्ण है, जो अजर-अमर है, इसलिए मेरा चूड़ो (विवाह-चिह्न) भी अमर हो जाएगा। यह पंक्ति भक्ति की उस अवस्था को दर्शाती है जहाँ भक्त सांसारिक नश्वरता से ऊपर उठकर अमर प्रभु से जुड़ जाता है।
आगे मीरा राणा द्वारा भेजे गए सर्प-पिटारे और विष-प्याले का वर्णन करती हैं। वे कहती हैं कि सर्प ने उन्हें डसा नहीं और विष ने उन्हें लगा नहीं, क्योंकि सांवरा श्रीकृष्ण उनके सिर पर विराजमान हैं। यह भाव यह सिद्ध करता है कि जिस भक्त पर प्रभु की कृपा हो, उसके लिए विष भी अमृत बन जाता है और संकट भी वरदान। अंत में मीरा अपने प्रभु गिरधर नागर से दर्शन की याचना करती हैं और कहती हैं कि वे उनके चरणों में बलि जाऊँगी।
यह भजन भक्ति की पूर्ण समर्पण-भावना, निर्भयता और प्रभु-प्रेम की पराकाष्ठा का प्रतीक है। मीरा का जीवन ही यह सिद्ध करता है कि जब भक्त अपना सर्वस्व प्रभु को अर्पित कर देता है, तो संसार के सभी कष्ट उसके लिए सहज हो जाते हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- भाषा की मिठास: राजस्थानी-मारवाड़ी मिश्रित भाषा में रचित यह पद अपने लोक-स्वरूप और भक्ति-भाव के कारण अत्यंत मधुर है।
- भक्ति-भाव: इसमें मीरा की अटूट भक्ति, प्रभु-प्रेम और सांसारिक बंधनों से मुक्ति की भावना प्रमुख है।
- दैवीय संदर्भ: भजन में श्रीकृष्ण की कृपा से विष और सर्प जैसे संकटों का निवारण दर्शाया गया है।
- आध्यात्मिक संदेश: यह भजन आत्मा-परमात्मा के मिलन, निर्भयता और पूर्ण समर्पण का संदेश देता है।
- गायन का महत्व: कीर्तन, जागरण, भक्ति-संध्या और मीरा-भजन के विशेष अवसरों पर इसका गायन अत्यंत फलदायी माना जाता है।
इस भजन को सुनने और गाने से भक्त के भीतर वैराग्य, प्रेम और श्रीकृष्ण के प्रति अटूट विश्वास जागृत होता है। यह भजन मीरा की भक्ति-धारा में श्रोता को बहा ले जाता है और हृदय को शुद्ध करता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन का गायन विशेष रूप से निम्न अवसरों पर किया जाता है:
- प्रातःकाल: स्नान के बाद पूजा-स्थल पर दीप जलाकर श्रीकृष्ण के समक्ष इस भजन का गायन करें।
- संध्या-आरती: संध्या के समय आरती के बाद यह भजन गाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- एकादशी एवं जन्माष्टमी: श्रीकृष्ण से संबंधित पर्वों पर इस भजन का विशेष महत्व है।
- जागरण एवं कीर्तन: रात्रि-जागरण और भजन-कीर्तन के कार्यक्रमों में यह भजन विशेष रूप से गाया जाता है।
- मीरा-भजन संध्या: मीराबाई की भक्ति से जुड़े विशेष आयोजनों में इसका गायन किया जाता है।
गायन की विधि: शुद्ध हृदय से, प्रभु के चरणों में ध्यान लगाकर, ताल-लय के साथ इस भजन का गायन करें। ढोलक, मंजीरा, झांझ और हारमोनियम के साथ इसका गायन और भी मधुर हो जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
"अब तो मान कहयो मेरी मांय" भजन किसने लिखा है?
यह भजन मीराबाई की भक्ति-रचनाओं में से एक माना जाता है, जो राजस्थानी-मारवाड़ी मिश्रित भाषा में रचित है।
इस भजन का मुख्य भाव क्या है?
इस भजन का मुख्य भाव यह है कि मीरा का मन अब पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित हो चुका है और वे सांसारिक विवाह के बजाय प्रभु से आत्म-विवाह करना चाहती हैं।
इस भजन में सर्प और विष का उल्लेख क्यों है?
यह उल्लेख मीरा के जीवन की उस घटना को दर्शाता है जब राणा ने उन्हें सर्प-पिटारा और विष-प्याला भेजा था, परंतु श्रीकृष्ण की कृपा से वे सुरक्षित रहीं।
इस भजन को कब गाना चाहिए?
इस भजन को प्रातःकाल, संध्या-आरती, एकादशी, जन्माष्टमी, जागरण और कीर्तन के अवसरों पर गाना शुभ माना जाता है।
क्या इस भजन के गायन से कोई विशेष लाभ होता है?
इस भजन के गायन से भक्त के भीतर भक्ति-भाव, वैराग्य और श्रीकृष्ण के प्रति अटूट विश्वास जागृत होता है। यह मन को शांति और हृदय को शुद्धता प्रदान करता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें मीराबाई की भक्ति-परंपरा, राजस्थानी-मारवाड़ी भाषा की विशेषताओं और श्रीकृष्ण-भक्ति के आध्यात्मिक संदर्भों को समाहित किया गया है। भजन के बोल पारंपरिक रूप से प्रचलित हैं और इनका भावार्थ भक्ति-साहित्य की प्रामाणिक परंपरा के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस भजन को श्रद्धा-भाव से गाएँ और श्रीकृष्ण की कृपा का अनुभव करें।
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें