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मेरो मन वृंदावन में अटको – कृष्ण भजन (Mero Man Vrindavan Mein Atako) | Indresh Upadhyay

273 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Chandan Sah | 2 मिनट पठन समय
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श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों को जानने के लिए भगवद्गीता खंड अवश्य पढ़ें और भगवान कृष्ण की लीलाओं के गहन अध्ययन के लिए ब्रह्म पुराण का पाठ करें।

🙏 मेरो मन वृंदावन में अटको – कृष्ण भजन

(Mero Man Vrindavan Mein Atako) – Indresh Upadhyay | Krishna Bhajan

मेरो मन हरि चरणन में अटको ॥

📝 भजन विवरण

🎤 गायक: श्री इंद्रेश उपाध्याय
🎶 संगीतकार/अरेंजर: करण खेमानी
✍️ गीतकार: नवदीप पंचाल शुभ
🎬 निर्माता: मोहित लालवानी
🏷️ श्रेणी: कृष्ण भजन, विरह भजन
📍 भाव: वृन्दावन की कुंज गलियों में मिलन की तड़प

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

॥ स्थायी ॥

मेरो मन वृंदावन में अटको
मेरो मन हरि चरणन में अटको
बनके जोगन डोलत ब्रज में
बन के जोगन डोलत ब्रज में
पीवत यमुना जल को
मेरो मन वृंदावन में अटको
मेरो मन हरि चरणन में अटको ॥

॥ अंतरा १ ॥

मेरो मुझ में कुछ ना मोहन
तेरी मिट्टी तेरो कण कण
मेरो मुझ में कुछ ना मोहन
तेरी मिट्टी तेरो कण कण
वृंदावन की कुंज गलिन में
वृंदावन की कुंज गलिन में
मिल जाओ प्रभु मुझको
मेरो मन वृंदावन में अटको
मेरो मन हरि चरणन में अटको ॥

॥ अंतरा २ ॥

इस जोगन के तुम हो साजन
करना है सब आत्म समर्पण
इस जोगन के तुम हो साजन
करना है सब आत्म समर्पण
अंत समय आनंद मिले मोहे
अंत समय आनंद मिले मोहे
बस वेणु के रस को
मेरो मन वृंदावन में अटको
मेरो मन हरि चरणन में अटको ॥

॥ अंतरा ३ ॥

याद में तोरी भई बावरी
सुद लो मोरी कुंज बिहारी
याद में तोरी भई बावरी
सुद लो मोरी कुंज बिहारी
अब आओ मेरे प्राण पियारे
अब आओ मेरे प्राण पियारे
अपनाओ या जन को
मेरो मन वृंदावन में अटको
मेरो मन हरि चरणन में अटको ॥

॥ अंतरा ४ ॥

बन के जोगन डोलत ब्रज में
बन के जोगन डोलत ब्रज में
पिवत यमुना जल को
मेरो मन वृंदावन में अटको
मेरो मन हरि चरणन में अटको ॥

॥ अंतरा ५ ॥

गिरधर नागर नटवर नागर
तरसे मेरो मन
खीचे मेरो ध्यान बुलावे
तेरो वृंदावन
बरसे नैना बैरी रैना
कब दोगे दर्शन
यमुना तट पे
एक दिन मुझको
मिल जाओ मोहन ॥

🎵 गायक: श्री इंद्रेश उपाध्याय | संगीत: करण खेमानी | गीत: नवदीप पंचाल शुभ | निर्माता: मोहित लालवानी

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह भजन एक भक्त (जोगन – योगिनी) के हृदय की वह व्यथा है जिसका मन वृन्दावन और हरि के चरणों में अटक गया है। "मेरो मन वृंदावन में अटको, मेरो मन हरि चरणन में अटको" – मेरा मन वृन्दावन में लग गया, मेरा मन हरि के चरणों में अटक गया।

"बनके जोगन डोलत ब्रज में, पीवत यमुना जल को" – मैं योगिनी (भक्तिन) बनकर ब्रज में विचरती हूँ और यमुना का जल पीती हूँ। यह वृन्दावन में रमण करने की लालसा है।

"मेरो मुझ में कुछ ना मोहन, तेरी मिट्टी तेरो कण कण" – हे मोहन, मुझमें मेरा कुछ नहीं, तेरी मिट्टी (वृन्दावन की धूल) ही तेरा कण-कण है। "वृंदावन की कुंज गलिन में मिल जाओ प्रभु मुझको" – हे प्रभु, वृन्दावन की कुंज गलियों में मुझे मिल जाओ।

"इस जोगन के तुम हो साजन, करना है सब आत्म समर्पण" – इस योगिनी के तुम साजन (प्रियतम) हो, अब मुझे पूर्ण आत्म समर्पण करना है। "अंत समय आनंद मिले मोहे, बस वेणु के रस को" – अंत समय में मुझे वह आनंद मिले, जो केवल बाँसुरी के रस में है।

"याद में तोरी भई बावरी, सुद लो मोरी कुंज बिहारी" – हे कुंज बिहारी, तेरी याद में मैं बावरी (दीवानी) हो गई हूँ, मेरी सुध लो। "अब आओ मेरे प्राण पियारे, अपनाओ या जन को" – अब आओ मेरे प्राण प्यारे, इस जन को अपना लो।

"गिरधर नागर नटवर नागर, तरसे मेरो मन" – हे गिरधर नागर, नटवर नागर, मेरा मन तरस रहा है। "खीचे मेरो ध्यान बुलावे तेरो वृंदावन" – तेरा वृन्दावन मेरा ध्यान खींच रहा है और मुझे बुला रहा है। "बरसे नैना बैरी रैना, कब दोगे दर्शन" – आँखें बरस रही हैं, रात बैरन हो गई है, कब दर्शन दोगे? "यमुना तट पे एक दिन मुझको मिल जाओ मोहन" – हे मोहन, एक दिन यमुना के तट पर मुझे मिल जाओ।

यह भजन वृन्दावन के प्रति आसक्ति, कृष्ण के चरणों में मन लगने की लालसा, और उनके दर्शनों की तीव्र व्याकुलता को व्यक्त करता है। भक्त ने अपना सब कुछ त्यागकर वृन्दावन की धूल अपना ली है और अब केवल कुंज गलियों में प्रभु के मिलन की आस लगाए है।

📖 विशेष शब्दों के अर्थ

  • अटको: अटक गया, लग गया
  • जोगन: योगिनी, भक्तिन, साधिका
  • डोलत: विचरती हुई, घूमती हुई
  • पीवत: पीती हुई
  • कुंज गलिन: बेलों से घिरी गलियाँ, वृन्दावन की संकरी गलियाँ
  • आत्म समर्पण: स्वयं को पूर्णतः अर्पित करना
  • वेणु: बाँसुरी
  • बावरी: दीवानी, पागल
  • सुद: सुध, खबर
  • गिरधर नागर: गिरिधर (गोवर्धन धारण करने वाले) नागर (नगर के स्वामी)
  • नटवर नागर: नटवर (नटखट), नागर (नगर के स्वामी)

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

🌿 वृन्दावन की धूल

"तेरी मिट्टी तेरो कण कण" – भक्त वृन्दावन की धूल को ही अपना सब कुछ मानता है। वृन्दावन की कण-कण में कृष्ण बसते हैं, इसलिए भक्त वहाँ रमना चाहता है।

🎵 वेणु के रस की लालसा

भक्त को अंत समय में केवल बाँसुरी के रस की लालसा है। कृष्ण की मुरली ही सच्चा आनंद देने वाली है।

🎯 संदेश : सच्चा भक्त अपना सब कुछ त्यागकर वृन्दावन की धूल में समा जाता है। वह योगिनी बनकर ब्रज की कुंज गलियों में विचरता है और यमुना जल पीता है। उसे कुछ नहीं चाहिए, केवल कृष्ण के चरणों में मन लगाना है। वह बार-बार पुकारता है – हे कुंज बिहारी, अब आओ, मुझे अपना लो। यह भजन हमें सिखाता है कि वृन्दावन की धूल भी कृष्ण प्रेम का मार्ग है।

॥ मेरो मन वृंदावन में अटको ॥
॥ मेरो मन हरि चरणन में अटको ॥
श्रेणियां: vrindavan bhajan

सनातन संस्कृति एवं प्रामाणिक संपादन

यह भजन/आरती लिरिक्स भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों के संदर्भ में समीक्षा एवं संपादन के बाद प्रकाशित किया गया है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 10 Aug 2026

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