ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
ब्रह्म पुराण अट्ठारह महापुराणों में से एक है। इसे सृष्टि के आदि ग्रंथों में गिना जाता है। यह पुराण भगवान ब्रह्मा द्वारा कहा गया माना जाता है और इसमें मुख्यतः तीर्थों, धार्मिक स्थलों, दान, व्रत और पौराणिक कथाओं का विस्तृत वर्णन है। इस पुराण को "ब्रह्मपुराण" के अलावा "सौरपुराण" भी कहा जाता है क्योंकि इसमें सूर्योपासना का विशेष महत्व बताया गया है।
ब्रह्म पुराण में दो भाग हैं – पूर्वभाग और उत्तरभाग। पूर्वभाग में सृष्टि की रचना, प्रजापतियों की वंशावली, मन्वंतर, देवताओं और ऋषियों की कथाएँ हैं। उत्तरभाग में तीर्थों का विशद वर्णन है, विशेषकर पुरी (ओडिशा) के जगन्नाथ मंदिर का महात्म्य। यहाँ भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति, रथयात्रा और उनसे जुड़े अनुष्ठानों का उल्लेख है।
इस पुराण में एक अनूठा अध्याय "गणेश महिमा" भी है, जहाँ गणेश जी की उपासना के फल बताए गए हैं। इसके अलावा धर्मशास्त्र, राजनीति, आयुर्वेद, ज्योतिष और वास्तुकला के सिद्धांत भी सम्मिलित हैं। ब्रह्म पुराण को पढ़ने से जीवन के सभी पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल संस्कृत श्लोकों के साथ सरल भाषा में व्याख्या दी गई है। यह संस्करण उन साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो तीर्थयात्रा, दान-पुण्य और धार्मिक संस्कारों की गहरी समझ चाहते हैं।