अध्याय 2: स्वायम्भुव मनु की वंश-परंपरा और शतरूपा की तपस्या
अध्याय २ : द्वितीयोऽध्याय
द्वितीयोऽध्यायः
तत्र आदि स्वायम्भुवमनु दशवर्णनम्
लोमहर्षण उवाच
स सुष्टु तु प्रनास्त्वेवमापवो दे प्रजापति । लेभे वै पूर्व पत्नीं प्रातर्पामयोनिसाम् ॥ १॥
आपवस्य महिम्ना तु दिवमावृत्य तिष्ठत । धर्मेणेव मुनिशेष्ठा शतरूपा व्यजायत ॥ २॥
सा तु वर्धयत तप्त्वा तप परमदुर्भरम् । भर्तारं दुप्ततपत पुरुष प्रत्यपद्यता ॥ ३॥
स वै स्वायम्भुवो द्विप्र पुरुषो मनुरुच्यते । तस्य एकसप्ततियुग मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ ४॥
मनु की काल अवधि (कल्प) होता है और मानस मनु का वह दूसरा अन्तर कहा जाता है। विष्णु से उत्पन्न शक्तिशाली पुरुष ने प्रजा की सृष्टि की। नारायण के अंश से उत्पन्न हुए उस पुरुष की ही प्रजाएँ अपनिज हुई। जो व्यक्ति इस प्रकार आदि सृष्टि की रचना को समझे, वह आयुष्मान्, कौर्तिमान् तथा पवित्रप्रजावान् होगा और यथास्थिरूषित गति की प्राप्त करेगा।
इति श्रीब्रह्मपुराणे आदिसर्गवर्णन नामक प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १॥
अध्याय २
स्वायम्भुव मनु का वंश-वर्णन
लोमहर्षण बोले--
उस प्रकार आपव नामक प्रजापति ने प्रजा की रचना कर तेजस्वी कन्या शतरूपा को अपनी पत्नी बनाया। मुनिवरों! अपनी महिमा से स्वर्ग को सकर स्थित हुए आपव के धर्म से ही शतरूपा उत्पन्न हुई थी। उसने दस हजार वर्षों तक अत्यन्त उग्र तपस्या करके अतितेजस्वी पुरुष को पति के रूप में प्राप्त किया था। ब्राह्मणों! वही पुरुष स्वायम्भुव मनु कहलाता है। इकहत्तर युग का उसका एक मन्वन्तर कहा जाता है। उस पुरुष से शतरूपा ने प्रियव्रत नामक पुत्र को उत्पन्न किया।
वैराजात् पुष्यादरीरं शतरूपा व्यजायत । प्रियव्रतोत्तानपादौ घीरातू क्या व्यजायत ॥ ५॥
काम्या नाम सुता श्रेष्ठा कर्दमस्य प्रजापतेः । काम्यापुरस्क चतुरः सम्राड् कु क्षित्रिराड्प्रमुः ॥ ६॥
उत्तानपादं जग्राह पुत्रमत्रिः प्रजापतिः । उत्तानपादाच्चतुरः सूनृता सूपुवे सृतान् ॥ ७॥
चर्मण्स्य फल्या सुश्रोणी सूनृता नाम विश्रुता । उत्पन्ना वाजिमेघेन ध्रुवस्य जननो शुभा ॥ ८॥
भरत कौत्तिमन्तञ्च आयुष्मन्तं वसुं तया । उत्तानपादोऽननयत् सूनृतायां प्रजापतिः ॥ ९॥
भ्रुवो वर्षसहस्राणि वरीणि, दिव्यानि भो द्विजाः तपस्तेपे सहाभाग: प्रायन् सुमह्यशषः॥१०॥
तस्मे ग्रह्मा ददौ प्रीतः स्थानमात्मसमं प्रमुः। अचललचेव पुरतः सप्तपीणां प्रजापतिः॥११॥
तस्याभिनानमृदिजञ्चर महिमानं निरीक्ष्य च देवासुराणामाचार्यः इलोक प्रागुशना अगौ॥१२॥
महोऽ्य तपसे वोरय्यमहा शरुतमहोऽदूमुत्म्। यमद्य पुरतः एतवा धुवं सप्त॑यः स्थिताः॥१३॥
त्स्माच्छिलष्टं च भव्यं च धुवाच्छम्भुच्यं जायत। दिरष्टेराघत्त सुच्छाया पड वेपुत्रानवल्मपान्॥१४॥
पिपुं' प्णुख्जयं भवीरं वृकलं वृकतेजसम्। रिपोराधत्त बृहतौ ५चकषुपं॑सव्वतेजसम्॥१५॥
जीजनत् पुष्करिण्यां वैरिण्यां चाक्षुषं मनुम्। प्रजापते रात्मजायां ५ बोरणस्य महात्मनः॥१६॥
मनोरजायस्त दश॒ नड्वलायां, महौजसः। कन्यायां सृनिगादूदा वैराजस्य भ्रनापतेः॥१७॥
भोर उत्तानपाद उत्पन्न हुए॥५॥ काम्या कदम नामक प्रज पति की व्येष्ठ बेन्या चौ। वाम्या तरे वार पृथ हृए--
शघराद्, बुत्ति, विराट और प्रमु॥९॥ पृष्ठ उत्तानपाद को अति प्रजापति ने प्रहण किया। उत्तानपाद से सूनृता में चार पुषनी को प्रसव किया॥१७॥ अश्वे यज्ञ से उत्यप्न भौर सुनुता नाम ते दिस्यात सुन्दर कटि वाली धमकी कन्या प्रुद क कत्याणी माता हुई॥१८॥ प्रजापति उत्तानपाद ने ध्रुव, कीतिमान्, आयुष्मान् और वसु नामक पुत्रा जो सूनूता से उत्पन्न विया॥१९॥ विपवृन्द! ध्रुव ने मदान् यशं वी इच्टा से तोन हजार देववपं परवन्त तपस्या की॥२०॥ जहा ने संतुष्ट होकर सप्तथियों के आगे उसे अपने समान अचल स्यान दिया॥२१॥
शद बै अमिमान, ऐश्वर्य और माहात्म्य को देखकर देवता और दैरपो बे आचाय धुर उचदी प्रस्य भेले लगे-डा! हरा अहो! पुव को तपस्या दापित आइचर्य है! इसका श्रूतं (दझारस्-हान या कोति) आध्यं है! आज इसी पुव को भते करने सत्तयि अवस्थित ह॥२२॥ पद से रिलिप्टि और मव्य मौ शमु ने उत्पम क्रिया पिलप्टि से सुच्छाया ने पाँच निष्यप पु को जन्य दिया--॥२३॥ सु, रिपुजय, वीर, वृक और दुकल्तेया! रिपु थे बहती मे बडे तेजस्वी चथु् को उतर दिया॥२४॥ चसुप से बैरियों पुष्करिणी मै चानूप मनु की अन्म दिया। पुष्वरियी अत्मा प्रजापति बीरण की बेन्या थो॥२५॥ नहूदला से चाशुप मनु दे इरे तेजस्वी दस पुत्र हुए। भूनिपेष्ठ! नडूवलां वैरा प्रदापति को पुत्री थी॥२६॥
॥ शक, स ण्म मुनिधेप्टा १० रग श्म्राने त्राण ३ ०थि दर्पाधि मो०। य्य न्नवुद्धिष वं। इग. स «रमात्सूध्टि। छन. ०त। सृष्टे दक ज्या मन्यपूनानन। शत, नपुजय पुरजय पुत्र भ षु*) ०. दिए। दक ब. दादुद। दरक भ. गजापामग्ष्यप्य। रेस, नद्टा०॥
८ द्वितीयोऽध्याय
कुत पुर श्तथम्नस्तपस्वी सप्यवादकवि। अग्नष्टुदतिरात्रस्च गुदयुम्नदचेत्ति ते नव॥१८॥
अभिम-्युश्च दशमो नड्वलाया महौजस। पुरीरजनयत् पुमान् षडाग्नेयी महभान्॥१९॥
द्ग सुमनस स्वाति क्तुमद्धिरित मथम्। अद्भातु सुवौथापत्य व बेनमेक व्यजायत॥२०॥
अपचारेण वेनघ्य॒ प्रकोप सुमहानभूत्। प्रजाय॑मृषपों चस्य ममन्धुदक्षिण करम्॥२१॥
वेनस्य मयिते पाणौ सबभूव महान्तृष। त दृष्ट्वा मुनये भाहुरेष वे मुदिता प्रजा
भादाद्यभेस्ित क्षीर तेन प्राणानधारयन् । पृथोस्तु पुत्रौ धम्मो जन्नातेऽ्तधिषातिनौ ॥२८॥
शिलण्डिनी हविर्धानमन्तर्थानादूयजायत । हुविर्घानात् पडाग्तेयी धिषणाजनयत् सुत्तान्
प्राचीनवहिप शुक्र गय कृष्ण गजाजिनो। प्राचीनबहिभेगवान्महानासीतुप्रजापति ॥३०॥
उमा व नाम दुत्व पुर शतथुम्न तपस्वी सत्यवाक कवि अग्निषटुन् अतिरात्र सुधुम्न और अभिमय् पे॥१८३॥
पुमे आग्नया ने छह मदातजस्वी पन्नो को उत्पन्न किया वे अग सुमनस् स्वानि ऋत अगिरस और
मय नाम से स्यात दए ॥१९१॥ अग स सुनीथ न दन नामक एव धृत उत्पत किया॥२०॥ वेन वे अनाचार से मुनिगण
सरयन्त कुपित हुए मोर् उन्होंने सन्तान वे निए उस दाहिने हाथ का मथने किया ।२१॥ उसमे एक महानु राजा उत्पन्न
६मा॥ उसे देखङ्र मुनिया ने वद्दा-- यह प्रजा को आनन्दित करेगा महान् तजस्वी होगा ट बडी प्रतिष्ठा
माप्त बरेया।। र३३। उन धनुष और कवच धारण किये थे । वह अग्नि के समान कान्तिमानु था ५२३॥ उसका नाम पुथ
सदा । उस राजा न पुथ्वी कौ राकी! वहु राजसूय न्न करन वाले राजाओ म् पहला राजा टूआ ॥ १४)
उसी से प्रवीण सूत मार सागय उत्पन्न हुए। मुनिम्रष्ठ। राजा पुथु ने प्रजाओ को जीविका देन की इच्छा मे इस पृथिवी
स अपना बा दाहन किया ॥२५॥ उखक साय देवता ऋषिगण पितर राष्ठ गधव अप्यराएँ, सपगण पुष्यजन,
रहय भर पते भी (टूहन म रुगे हुए) ये ॥२६॥ उन उन पाता म दुंद्ी गई पृथिवी ने यधच्छ द्रप दिया। उसमें
जाओ न॑ प्राण धारण किय । यब अन्त से पृच् के अन्तथि और पातिन् नाम दो धमशाता युव हुए ॥२७-२८१॥
निपम्डिनी ने अन्तर्धान स हृवियानि को उत्पन्न किया। अग्नि वी पुरी घिपणा ने हविषि मे ष्ट पुर पैदा
स्रिपि॥२९॥ प्राचानदहिस् युक बय कृष्ण प्रजभीर अजिनं । उनम भगवान् आचीनय्हिस् महान् प्रजापति
ध्व ष्यष गे ऊद। देण पूह। दत णषटुबनि०। प॒ ग्म्न्वाप्रिते। पकः मतिमा दम नदरा०। एष श्य। उरो चव स्यातति। स्क भ ्यम्।
से १ राजा। दर्रे वेमों। इस दशपूवज । भस तन पृथ्वी भुनि०। १५१ देवैजपिग०॥
रईस. ०यर्वाप्य०। १७ ०प्परता ग०। १८क् न्पी पुम्यानज०।
ब्रह्मपुराणमु ९
हविर्धानान्मुनिश्रेष्ठा येन संवद्धिता: , प्रजः} प्राचोनवहिर्भगबानू पूरविवीतलचारिणी: ॥३१॥
समुद्रतनयायां तुः इतदारोऽभवत् श्रमुः । महतस्तपसः भारे सवर्णायां प्रजापतिः ।३२॥
सवर्णाधत्त सामुद्री दश्च प्राचीनर्वाहुषः! सर्व्वान् प्राचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगान्
अपुयण्वम्माचरणास्तेऽ्प्यन्त महतषः। दक्ष॒ वर्षसहस्राणि घमुद्रसलिलेश्षपाः ॥३४॥
तपश्चरत्सु पुथिवौं प्रचेतासु महौषहाः। अरश्
गये ॥३१॥
बहुत तपस्या करे के बाद सवर्णा नाम की समुद्र-कन्या से प्रम् प्रजापति ने विदाह त्रिया ॥३२॥
समुद्री सद ने प्राचीनवहिसु से दस पुत्र उत्पन्न किए।
धनुर्वेद में पारंगत वे सभी पुत्र प्रचेता नाम से विख्यात हुए ॥३३॥
एकही चर्म के अनुष्ठान करने वाले अर्बुद ने दस हजार वर्षों तक समुद्र के जल में ध्यान करते हुए तपस्या की ॥३४॥
प्रचेतागण की तपस्या के समय वृत्तों ने अमृतरूप पृथ्वी को आच्छादित कर दिया। तव प्रजा का नाश होने लगा ॥३५॥
वृक्षों में भरे हुए आवाश में वायु नहीं रही।
दस सुदीर्घ वर्षों तक प्रजा निश्चेष्ट पड़ी रही ॥३६॥
यह सुनकर तपस्वी प्रचेताओं को क्रोध हुआ। उन्होंने मुख से वायु और अग्नि की सृष्टि की ॥३७॥
वायु ने वृत्तों को उदा कर सुमा दिया। उनको अग्नि में जला दिया। इस प्रकार वृत्तों का महान नाश हो गया॥३८॥
जब कदी वृत्त वच गये, तब वृत्तों का विनाश जानकर सोम उन प्रचेतागण प्रजापतियों के पास जाकर बोले ॥३९॥
हे प्राचीनवर्हिमु राजाओ! आप क्रोध का त्याग करें। पृथ्वी दुःख से रिक्त हो गई है। अग्नि और वायु को आप शान्त करें ॥४०॥
हे तात! वो बीस सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी कन्या को सविधि जानते हुए मैंने यथम से यारण श्रिया ॥४१॥
मारी नाम की यह कन्या युक्त द्वारा रची गई है। महानुभाववान सोमदत्त को बढ़ाने वाली यह माहिया आपकी पत्नी हो ॥४२॥
आप और मेरे आधे-आधे तेज से दक्ष नामक विदानु प्रजापति इससे उत्पन्न होगा ॥४३॥
तेजस्वी दक्ष आपके तेजरूप भक्ति से दाव हुई इस पृथ्वी पर फिर प्रजा को बढ़ाएगा ॥४४॥
ततः सोभस्य् वचनाज्जगृहुस्ते प्रचेतसः। संहत्य कोपं वृकेभ्यः पतनं धर्मेण मारिषाम् ॥४५॥
तव सोम के वचन से प्रचेतागण ने क्रोध त्यागकर वृक्षों के मारिया को सर्व पत्नी रूप में प्रण किया ॥४५॥
ददाम्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारियाया प्रजापतिः। दक्षो जाते महातेजाः सोमस्यांशेन भो द्विजाः ॥४६॥
विप्रवृन्द! श्वसो प्रचेताओ से मारी ने महान् तेजस्वी प्रजापति दक्ष को सोम के अंश से उत्पन्न किया ॥४६॥
अचराद् इच चराश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदः। स सृष्ट्वा मनसा दक्षः पदचादसृजत स्त्रियः ॥४७॥
उस दक्ष ने स्थावरों और दौपैर जन्मों दार्जना बाली जन्मों की मानसी सृष्टि कर पीछे स्त्रियों की रचना की ॥४७॥
ददौ ददा स धर्माय कश्यपाय जवोदश। शिष्टाः सोमाय राजते च नक्षत्राया ददौ प्रभुः ॥४८॥
तासु देवाः खया मावो नागा दितिजदानवाः। गन्धर्वप्तरसश्चैव जन्निरे व्यश्च जातयः ॥४९॥
ततः प्रभृति विद्नेद्राः प्रजा मेयुमसंभवाः। सड्धुल्पादुदर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषां प्रोच्यते प्रजा ॥५०॥
॥ मुनय ऊचुः ॥
देवानां दानवानास्च गन्धर्वोरगरक्षसाम्। सम्भवस्तु शताब्स्माभिदक्षस्य च महात्मनः ॥५१॥
अदगुष्ठादु ब्रह्मणो जज्ञे दक्षः किल शुभत्रत। वामाडगुष्ठात्तथा चैवं तस्य पत्नी व्यजायत ॥५२॥
प्राचेतस्त्वमस
ममू ने दश कन्यां घमं को और तेरह क्यप को दीं। अवशिप्ट मशवरूपी वन्यायें साम राजा वो दी॥४८॥
उन मन्यामो से देव, पक्षी, गौ, नाग, त्य, दानव, गन्धवं, अप्सरा भौर दूसरी जातियाँ उत्पन्न द॥५४९॥
विग्रवदेवृन्द वमी से मैयुनी सृष्टि का प्रारम हुआ। पढ़ले सबल्प, दर्शन और स्यं से प्रजा उत्पन्न हुआ करती थी॥५५०॥
मुनिगण बोले--देवता, दानव, गन्पर्व, नाग, रसय योनियो और मद्दात्मा दश की मी उत्पत्ति हम ने सुनी॥५१॥
ब्रह्मा दे अगूटे से शुभादय दक्ष का जन्म हुआ। उसी प्रकार वाये अगूढ से उसही पतली को उत्पत्ति हुई॥५२॥
पिर उठ महानू तपस्वी मे प्रचेताओं का पूतत्वं बे से प्राप्त किया? सूतभी। आप हमारी पठ पका ने समाधान बरें दि चन्दमा का दौद्ि (दक्ष) चन्दमा का समुर कंसे वना?॥५५३॥
सोमहर्पग बोले-िप्रवृन्द। प्राणियों म उत्पत्ति मौर निरो (मरण) नित्य हव रहत हैं। मुनि और विदान् सोय दम माहि नहीं हुआ करत॥५४॥
ये दक्ष आदि राज लय हेर्मुग म उत्पन्न हाव हैं और फिर नष्ट एस। तपोदना। रेष। वृुशेपु। उक ०मत्स्याय्त्मणमों दिल भ्व नष्टा मानान्दकष।। भष रा मूप प०। इस नपवत्यूजन्स्वियः; बरस ण्दौ से दा ध०। द्वृ च। तु। ९१, ऋषय। ष्य। ण्ष्टादुकषिणाग्बाता द०। १११। ०णों जाता द०। ष्स्मः चः देष। एव।स। एन तु स०्। षष्ठ न्तु ये रयम १५१। विपत्तिद।