अध्याय 8: सूरयेवश वर्णन - सत्यव्रत की तपस्या और वशिष्ठ का आशीर्वाद
अध्याय 8 : अष्टमोध्यायः
५८ अष्टमोऽध्यायं
महापि कौशिको धीर्मास्तेन वीरेण मोहित ॥१०९॥
इति श्रीब्राह्य महापुराणे सूर्य निरूपण नाम सप्तमोऽध्याय ॥ ७०
अष्टमो ऽध्यायः
सूरयेवशा वर्णनम्
लोमहर्षण उवाच
सत्यव्रतस्तु भवत्या च शृङ्गया च प्रतिष्ठया । विद्यामित्रकलञ्चैव बभार विनये स्थितः ॥१॥
हया मृगान् दराहाश्च महिषाश्च वनेचरान् । विविधामित्राध्रमाभ्यासे मास युते यज्ञे च ॥२॥
उपाश्रुदनमास्याय दोक्षा द्वादशवाधिकः। पितृणियोगादवसत्तस्मिन् वनगते नृपे ॥३॥
अपोध्यां पद राज्य च तयैवात पुर मुनि । याज्योपाध्य्यसयोगादुघसिष्ठ पर्यरक्षत ॥४॥
सत्पग्रतस्तु यात्याच्च भाविनोऽर्थस्य ये बलात्। घसिष्ठेशस्यधिक ममू घारयामास नित्यदा ॥५॥
पित्रा हि स तदा राष्ट्राटपस्यमान प्रिय सूतम् । नियारयामास मुनिरयहना कारणेन च ॥६॥
१०८] गढे मे मघन पहन दे नार्य यहमुनिः यतर गाल्य नाम से विख्यात महातपस्वी हुआ। विद्यात् महरपि दविक
शोर सत्यदत गद्य उमुगत विपे गये ॥१०९॥
श्री ब्रह्म-महापुराणम् मूपदन निरूपण नामङ्क सातवाँ अध्याय समाप्त ॥७०
अध्याय ८
सूरयेवश वा वर्णन
सोमहर्षभ ने कहा-- सत्यव्रत मक्त शया, विनय तथा प्रतिभा से विकामिव की पत्नी का पालन बरतें। वह मुग सूररं मय और जरठी जानयर्सा दो सारगर मांए को विविधासित्र दे आधम मे दुश पर बाप देता है। बह राजा के वन ले जाने के बाद थद उपायुग्ठ (अप कोई नहीं जान खक एस नियम) सर्वकार बारह कय की दीता सवार शिता की मज़ा के अनुएर रदून या। यजमान-उरोट्टि गे एम्य पतै वद्धिप्ट जी अपाप्याधुरी, दम्य शषा अल पुर (सश) की देर सह बरन सगे यत्यत्न षन तथा मादी बे कारण वश्ष्ठ जी के प्रति भिरित श्र चार्व बर शापा। जद पिता से थिय पुत्र को एण्य से निदाल टिया था। अधि जी ने ठेके दाप्या से उपर रण मदी रिया था विद्मा की टि (भर्पाएू दियाहू का हि।
एव पर प०। २१ स्पियमूत पषा से नित्पदा।
ब्रह्मपुराणम् ५१
पापिग्रहुणमन्त्राणां निष्ठा स्यात् सप्तमे यदे । न च सत्यव्रतस्तस्मस्दुतवान् सप्तमे पदे ॥११७॥
जानन् धम्मवसिष्टस्तु न मा त्रातीति भो द्विज। सत्यव्रतस्तदा सोपं वसिष्ठे मनसाकरोत् ॥११८॥
गुणबुद्ध्या तु भगवान् वसिष्ठः कृतवांस्तया। न चे सत्यव्रतस्तस्य तमुपांशुमबुध्यत ॥९॥
तस्मिन्नपरितोषद च.... पिचुरासीन्महात्मन: | सेन द्वादवा वर्थाणि नावत् पॉकशासन' ॥१०॥
तेन त्विदानीं विहितां दीक्षां तां दुर्वहां भुवि। कखस्य निष्कुतिदिप्राः कृता सा वे भवेदिति॥११॥
न. तं घसिष्ठों भगवान पित्रा त्यदतं न्यवारयत्। अभिषेक्ष्याम्यहं पुच्रमस्येतयेवंमतिम्मुनि" ॥ १२॥
स लु द्वादश वर्षाणि तां दीक्षामवहद्बली। अविद्यमाने मांसे तु वततिष्ठस्य महाद्मन. ॥ १३॥
सर्व्वकामदुघा दोग् धौं स ददल नुपात्मज. | तां दे क्रोधाच्च मोहाच्च श्रमाच्चैव क्षुघान्वित" ॥ १४॥
देक्षधमम्मगतो राजा जधान, मुनिसत्तमा.| तन्मसि स^ स्वयं चैव पिदवामित्रस्य चात्मजानू 0 १५॥
भोजयामास तच्छत्वा वरसिष्ठोऽप्यस्य चुनुधे ॥१६॥
वसिष्ठ उवाच
पातयेथमह क्रूर तवं श्ाईकुमसं वायम्! यदि ते द्वाविमी शडकू न स्यातां दे छृती पुन. ॥१७॥
पितुद्चापरितोवेण 'गुरदौर ्नीवधेन च। अभरोक्षितोपयोगाच्च ननिविधस्ते व्यतिक्रम. ॥ १८॥
एवं चरीण्यस्य शडकयूनि तानि दृष्ट्वा महातपा। व्रिकाडकुरिति होघाच त्रिक पुस्तेन सस्मृत" ॥ १९॥
विद्वामित्रस्य, ष्दाराणामनेन भरणं छतम्! तेन तस्मे षरं प्रादान्सुनि- प्रीतस्त्रिशद्धुबे॥ २०॥
पयंत्रसान) सप्तपदी मे जाकर होती है। इसलिए सत्यप्रत ने सप्तपदीः मे कन्या का अपहरण नहीं क्या ॥७॥
विप्रवन्द। "वषिष्ठ घमं फो जानते हुए मौ मेरी रक्षा नहीं कर रहे हैं' ऐसा सोचकर सत्यब्रत ने वसिष्ठ के प्रति मनं मे कोघ किया ८ भगवान् वसिष्ठ ने तो उखका हित समय करके ऐसा किया था। पर सत्यत्रत ने उनका आय नहीं समझा ९ उसके ऊपर महात्मा पिता का पृः असतोप था। इसलिए बारह तरपो तक इन्द्र से वर्षा नहीं की ॥१०॥ द्विजगण! बारह वर्ष की कटिं दीक्षा से इसके कुल का प्रिव (अर्थात् श्रायस्वित्त) हो जायगा। तब इसवे' पुत्र का अभिषेक मैं कर दूंगा।' ऐ सा सोचकर मेगवानु बसिष्ठ न उसे महौ रोका था, जवं पिता ने उसका परित्याग कर दिया था॥११ १२॥ वहं बार्ह चयं तक दीक्षा धारण किए रहा। (एक्दिन) मास मिलने पर महात्मा वसिष्ठ की कामघेनु भाय को राजपुत्र (सत्यब्रत) ने देखा ॥ १३ ॥ मुनिश्नेष्ठो ! भूखे राजा ने योध, मोह, मौर श्रम दे" कारण देशघ्म के अनुसार उस गाय को मार डाला ॥१४॥ उसके मास की स्म सी खाया आर् विश्वामित के पुवी को भी खिलाया। यह सुकर वसिष्ठ जी आग बदूला हो गये। १५-१६! वसिष्ठ ने कहा--दुष्ट ! मैं तेरे कु (पाए या अपराध) को दूर कर देता, यदि तून ये दो शकु मही किये होते॥१७॥ पिता का असतोप, गुरु की गाय का वव भौर असस्कृत मास का संक्षण--ये तीन भरतिकूल कार्य तूने किये हैं।१८। इस प्रकार उमे तीन शुभो को देखकर मुनि ने उसे 'न्रिशड' कहा। इसी से उसका नाम त्रिरकृ पडा ॥१९॥विद्वासित्र थे रमी-बच्चो को पालन उसने किया या इससे मुनि (विश्दामित्र) ने प्रसन्न होकर तिक्र को श्ख ०त। हत्वा घेनु ततो सा०। रख जगाम। दे ख तु। '४ ख याडकु ने सगय। य००।५क ख गुरो- दोॉग्घ्ीन। ६१ न्त्रस्तु दा०। ७क ख.०णामागतो मरणे इते। ततस्तस्मै।
अष्टमोऽध्याय
छन्द्यमानो वरेणाथ वर वे नुपात्मज़। सशरीरों बजे स्वर्गमित्पेद चितो वर ॥२१॥
अनावृष्टिभये तस्मिन गते द्वादगवार्षिकें। पिच्ये राज्येंडभिपिच्याय याजयामास पाथिवम ॥२२॥
पहपास्ताल एद्घाइच निरस्यत स्म ते नूपम। ततपत्ती गभमादाय जौस्वस्याभममायिद्नत ॥ २९॥
नास्तयो धाम्मिकरचेद स हि धमम्युगेऽभवत। सगररतु सुतो याहोयज्ञे सह गरेण वे ॥ ३०॥
मौच्वस्याध्रममासश्यं भागदंगामिरक्षित। आग्नेयमस्त्र लद्ध्या च भागंवात सगरो नूप ॥ ३१॥
लिंगाय पृथिवीं हत्वा तारजडघान सहेहयान। श्वकाना पह्ववाना च धमं निरसदच्युत ॥
कषव्रियाणौ मुनिश्नेष्ठा पारदानां च धम्मवित पदरा।
मुनय ऊचु
श्य स सपरों गातो गरेंणेय सहाच्युत। फिमयें च नकयदीनां क्षत्रियाणां महौजसाम ॥ ३३॥
ब्रह्मपुराणम ५३
धर्म्मन्कुलोचितान राजा करदधो निरसदच्युत। एतन्न सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामते ॥ ३४॥
लोमहर्पण उवाच
वाहो्यसनिन पूव्यं हत राज्यमभूत किल। हेहदेस्तालडजघेदच शफं साद द्विजोचमा ॥ ३५॥
यवना पारदाक्चैय काम्बोजा पह्लवास्तया। एते ह्यपि गणा पञ्च हंहया्भे पराक्रमम ॥ ३६॥
हतराज्यस्तदा राजा स वै यह्वा ययौ। पल्या चानुग्तो दुखी तन प्राणाननासृज्त ॥ ३७॥
पत्नी तु यादवी तस्य सगर्भा पुष्ठतोऽन्यमात। सपत्न्या च गरस्तस्ये दत्त पूर्वं श्लाघा ॥ ३८॥
सा तु भर्तुर्टिता कृत्वा वने तामम्यरोहत। ओव्वस्तां भार्गवो विभ्रा कारण्यात समदारयत ॥ ३९॥
तस्थाधरमे च गर्भ स गरेणैव सहाच्युत। व्यज्यत महाव सगरो नाम पार्थिव ॥ ४०॥
मौव्वस्तु जातकम्मादीस्तस्य कृत्वा महात्मन। सध्याप्य वेदद्नास्याणि ततोऽस प्रत्यपादयत ॥ ४१॥
आनेय तु महाभागा अमरेरपि दुसहम। स तेनास्मबलेनाजों दलेन च समन्दित ॥ ४२॥
हेहयान थिलधानाशु कधौ रुद्र पशुनिव। आजहार च लोकेपु कीति बीतिमता चर ॥ ४३॥
तत पराकाद यबनान च्काम्बोलान पारदासतया। पहलवाइचेव नि शेषान् कर्तं व्यवसितो नूप ॥ ४४॥
ते वध्यमाना वीरेण सगरेण महाटमता। वसिष्ट दारण गत्वा प्रणिदेतमनीपिणम ॥ ४५॥
घसिष्ठरत्वय सान दृष्टवा समयेन महाद्युति। सगर वारयागास तेथा दच्वाभय तदा ॥ ४६॥
सगर स्वा प्रतिज्ञा तु गुरोर्वावय निदाम्य च। घम्म अयान तेषा ये वेशानयाइचदरर हौ ॥ ४७॥
राजाय को उनक कुल घर्मो से च्युतं किया? है महाविद्वन! यह सब विस्तार से हमलोगों का तान्ये ॥ ३४॥
लोमहर्पण उवाच - पहिले हैटय तालजघ आर णन दव्यसनी बा ने राय वा अपहरण कर ल्वा चां ॥ ३५॥ शक भवन पारदं कम्बोज य रपह् खव - ये भी पाच गण टैटय के सनाय थे ॥ ३६॥ तव राज्य से वचित वाहु वन चला गया। पनी मी पीछ से गई। दसी होकर वाह ने वही पर प्राण योग कर दि
अष्टमोऽध्यायः
अद्धं चाफारना शिरसो मुण्डयित्वा व्यसर्जयत् । यवनानां शिरः सर्व्वं काम्बोजानां तथैव च ।।४८।।
पारदा मृषतकेशाङ्च पह्लवाः इमधरुधारिणः। निस्वाध्यायववद् काराः तास्तेन महात्मना ।।४९।।
डाका यवगकाम्थोजाः पारदाइच द्विजोत्तमा: । कोणिसर्पा माहिपफा दर्ववषचोलाः सकेरलाः ।।५०।।
स्वे ते क्षत्रिया विप्रा धम्भेस्तेपां निराकृतः! वसिष्ठवचनाद्राज्ञा स्सगरेण महात्मना ।।५१।।
स धर्मविजयी राजा विजित्येमां वसुन्धरामू। अश्वं प्रचारयामास वाजिमेधाय दीक्षितः ।।५२।।
तस्य चास्यतः सऽ्वः समुद पूर्वदक्षिणे । वेलासमीयेऽपहतो भूमि चैव प्रवेकितः ।।५३।।
स तं देश तदा पुत्रः खानयामास प्थवः। आसेदुस्ते तदा तत्र खन्यमाने महार्णवे ।।५४।।
तमादिपुरुष॑ देवं हरि कृष्णं प्रजापतिम्! विष्णुः कपिलरुपेण स्वपन्तं पुरुषं तदा ।।५५।।
तस्य॒ च्षु-समूत्येन तेजसा प्रतिबुध्यतः! दभ्धाः सर्व्वे मुनिश्नेष्ठाइचत्वारस्त्ववशेपिता: ।।५६।।
ग्वहिकेतु. सुकेतुश्च तया भ्वम्भरयो नुपः। पूरः पञ्चनदश्येव तस्थ वंदकरा नृपा ।।५७।।
प्रादाच्च तस्मे भगवान् हरिनौरायणो वरम् । अलयं वंशमिक्ष्वाकोः कीसिं चाप्यनिवत्तिनीम् ।।५८।।
प्रं समुद्रं च विभुः स्वगे वासं तयाक्षयमु । समुद्रश्चा्यंमादाय दवन्दे तं महीपतिम् ।।५९।।
सागरत्वं च लेभे स कम्मेणा तेन तस्य ह। तं चादवमेधिकं शोऽदवं समुदरादुपलरघवान् ।।६०।।
आजहाराइवमेघानां श्वतं स सुमहातपा.। पुत्राणां चं सटस्राणि पष्टिस्तरयेति नः भूतम् ।।६१।।
यवनो तयां काम्बोजो वे सम्पूर्ण शिर को मुंडवा कर छोड दिया! ।।४८।। पारदो को सुक्तवे-श (लिखरे वालो वाले) और पहल्वो को दाढी-मूंछ-युक्त बनाकर छोड दिया। विप्रवर ! शक, यदन, काम्बोज, पारद, कोणिसपं, माहि धक, दवं, चोल, केरछ-ये सब क्षत्रिय वेदाध्ययनं, जप आदि से वचित कर दिये यये वशिष्ठ के वचन से राजा सगर ने इनके धर्मों का नाश कर दिया ।।४९-५१।।
धरम -विजयी राजा ने सम्पूणं पृथिवी को जीतकर अदवभमेव यज्ञ की दीक्षा लेकर अश्व को छोड दिया ।।५२।। वटं अश्व पूर्व-दक्षिण समुद्र मै समीप गपहृत होकर पुथिवी मे प्रविष्ट हुआ तो राजा से अपने पुत्रो वे हारा उस प्रदेश को खुदवाया ।।५३।।
महासमुद्र को खोदते हुए वे राजपुत्र वहाँ पहुंचे, जहाँ आदि पस्य, देव, हरि, हेय्ण, प्रजापति--सज्ञक विष्णु सगव कपिल सुनि के रुप में झयन कर रहे ये ।।५४-५५।।
मुनिवर ! भगवान् ने जगन पर उनवी आंखो मै तेज से सगर वे सव पुत्र दग्थ हो गये। केवल वितु, सुवतु, राजा पर्भरप, दौर पचनद--ये चार राजपुत्र वदा वदनं दे लिए बच गये ।।५६-५७।।
पश्चातु सण्वान् नारायण से सवर दो वग्दानं दिया--'इय्वाइु वा अशय वदा रहेगा, तुम्हारी कीति बढ़ेगी, तुम्हें समुद्र पुत्र होगा ओर तुम अद्य स्वगंवाष शप्त बरीगे' ।।५८।। समुद्र मी अर्य लेबर राजा की वन्दना करने लमा ।।५९।।
उसी दमं से समुद्र सागर कल्पया। उस अग्व वो राजा ने समुद्र से प्राप्त दिया और सौ अव्वमेघ यज्ञो को सम्पन्न विया। उसने शाट हजार पुत्र टुए--ऐसा हमने गुना है ।।६०-६१।।
क भमा) केलिसर्गो महाधीका मोदका स०। स नमा) बेली माहिपदा हारवोलाइथ स०।
र्वः स दृनस्पेण। ३क्मस्वयम्। से ग बढ़े ०। ५ के
ब्रह्मपुराणम् ५५
मुनय ऊचुः
सगरास्थात्मजा धीराः षष्टि जाता महावलाः। विक्रान्ताः षष्टिसाहस्ता विधिना येन सत्तमः॥६२॥
लोमहर्षण उवाचः
दै भाग्ये सगरस्यास्तां तपस्या दग्धकिल्विषे। ज्येष्ठा विदर्भदुहिता केसिनौ नाम नामतः॥६३॥
कनोपसी च महतौ पत्नी परमधर्मिणी। अरिष्टनेमिदुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि॥६४॥
भव्यस्तामेव बरं ब्रह्मा दत्तव्यश्च द्विजोत्तमाः। षष्टि पुत्रसहस्राणि गृहणात्वेका नित्यदिनः॥६५॥
एकं वंशधरं त्वेका यथेष्टं वरयत्विति। तैका जगृहे भुनान् पर्टिसाहस्र समर्पितान्॥६६॥
एकं वंशधरं त्वेका तयेत्याहं ततो मुनि। राजा पञ्चजनो नाम बभूव स महातेजाः॥६७॥
इतरा सुषु तुम्बीं बीजपूर्णाभिति श्रुति। तत्र षष्टिसहस्राणि गर्भास्ते तिलसम्मिताः॥६८॥
संवभूधुयंयाकाल ववृधुश्च यथासुखम्। पृथपूर्णपु कुम्भेषु तान् गर्भान्निदधे तत्॥६९॥
धात्रीर्चैकैकश प्रादात्तावती पोषणे नुपः। ततो दशु मासेषु समुत्तस्थुयंथाक्रमम्॥७०॥
कुमारास्ते यथाकालं सगरप्रीतिवर्धनाः। षष्टिपुत्रसहस्राणि तस्यैवमभवन् द्विजाः॥७१॥
गर्भादेलावुमध्याद जातानि पृथिवीपतेः। तेषां नारायण तेजः प्रविष्टानां महात्मनाम्॥७२॥
एकः पञ्चजनो नाम पुत्रो राजा बभूव ह। शूरः पञ्चजनस्यासीदश्वमान्नाम वीर्यवान्॥७३॥
हिंदी अनुवाद:
मुनियों ने पूछा--हे सूतजी! सगर के वीर, महाबली साठ हजार पुत्र कंसे हुए?॥६२॥
लोमहर्षण बोले--तपस्या में निष्पाप हुई दो पत्नियां सगर की थीं। उनमें ज्येष्ठ थी विदर्भराज की कन्या केसिनी नामक।॥६३॥
छोटी पत्नी अरिष्टनमि की कन्या थी, जो अनुपम सुंदर और परम धर्मात्मा थी।॥६४॥
विष्णु ने उन्हें वरदान दिया: एक को साठ हजार पुत्र और दूसरी को वंश का धारण करने वाला एक ही पुत्र।॥६५॥
जिसको जो अभीष्ट हो वह ग्रहण करे। ब्रह्मा की स्वीकृति पर एक स्त्री ने साठ हजार पुत्रों की और दूसरी ने एक ही वंशधर पुत्र की याचना की।॥६६॥
दूसरी स्त्री ने एक ही पुत्र की याचना की। मुनि! उस पुत्र का नाम पञ्चजन था, जो महान् तेजस्वी राजा हुआ।॥६७॥
ऐसी प्रसिद्धि है कि दूसरी स्त्री ने बीज से भरी हुई एक तुम्बी का प्रसव किया। उसमें साठ हजार गर्भ थे, जो तिल के समान बारीक थे।॥६८॥
वे अपने समय और सुख के अनुसार बढ़ने लगे। उन्हें घी से भरे हुए कुंभों में रख दिया गया।॥६९॥
राजा ने प्रत्येक के लिए एक-एक दाई नियुक्त की, जो उनके पालन-पोषण के लिए समर्पित थीं। दस महीने बीत जाने पर वे कुमार क्रमशः खड़े होने लगे।॥७०॥
जैसे-जैसे वे समय आया, वे सभी सगर के लिए प्रीति को बढ़ाने वाले हुए। द्विजगण! इस प्रकार उस राजा के साठ हजार पुत्र हुए।॥७१॥
उन बच्चों की उत्पत्ति तुम्बी से हुई थी। उन महात्मा बालकों में नारायण का तेज प्रविष्ट था।॥७२॥
पञ्चजन नामक एक पुत्र राजा हुआ। वह अत्यंत वीर था और अश्वमान नाम का भी प्रसिद्ध था।॥७३॥
दिलीपस्तस्य तनयः खद्वाड इति विश्रुतः। येन स्वर्गादिलोकगत्य मुहुर्त पापं प्राप्य भोजनम्॥७४॥
तस्माद्गागीरयो गद्धा कथ्यते 'वक्षचिन्तके । भगोरथसुतो राजा श्रुत इत्यभिविभुत ॥७७॥
नाभागस्तु श्रुतस्यासीत् पुत्र परमधार्मिक । अम्बरीषस्तु नाभागि सिन्धुद्वीपसमुद्भवत् ॥७८॥
अयुताजित्तु दायाद सिन्धुद्वीपस्य वीर्यवान् । अयुताजित्सुतस्त्वासीद्ऋतुपणो महायशा ॥७९॥
दिव्याक्षहुबयन्नो बै राजा नलसखो बलो । क्रतुपर्णसुतस्त्वासीदात्तपार्णि महायशा ॥८०॥
सुदासस्तस्य तनयो राजा इन्द्रसतो'भवत् । सुदासस्य सुतः भ्रातः सौदासो नाम पार्थिव: ॥८१॥
यात् कल्मषपादो वै राजा मित्रसहो'भवत् । कल्मषपादस्य सुत शर्वकर्मेति विश्रुत ॥८२॥
अनरण्यस्तु पुनो'मृद्धिभूत सर्वकर्मण: । अनरण्यसुतो निघ्नो निघ्नतो द्वौ बभूवतु ॥८३॥
भनमित्रो रघुश्चेव पार्थिवोभसत्तमौ । अनमित्रसुतो राजा विदान् शदुलिदुहो'भवत् ॥८४॥
दिलीपस्तनयस्तस्य रामस्य प्रपितामह: । दशरथदिलीपस्य रघुनामा सुतो'भवत् ॥८५॥
रघोध्यापा महाराजो यत् परमासीन्महावल: । अजस्तु राघवो जज्ञे तथा दशरथो'प्यजात् ॥८६॥
रामौ दशरथ्यौणशें धर्मत्सौ सुमहायशा: । रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रुत: ॥८७॥
आर जिसने स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतार दो घड़ी मर जीवित रहकर बुद्धि अर सत्य से तीनो लोक को जोड़ दिया ॥७४१ ॥
दिलीप के महाराज भगीरथ पुत्र हुआ, जिस नदियों मे श्रेष्ठ भागीरथी को इस लोक मे अवतरित किया अर पुत्री-भाव से उसे समुद्र मे मिला दिया ॥७५ ७६॥ इसलिये वंश को समझने वाले लोग गंगा को 'भागीरथी' कहते हैं। भगीरथ वे 'भुक्त नामके परम विख्यात पुत्र हुआ ॥७७॥ श्रुत को पुत्र नाभाग परम धर्मात्मा था।
नाभाग वा पुत्र अम्बरीष छि सिन्धुद्वीप का पिता हुआ ॥७८॥ सिन्धुद्वीप क पुत्र अयुताजित् शक्तिशाली हुआ । अयुता-जित् का पुत्र सहायदस्वी ऋतुपण था ॥७९॥ वहं राजा पालो बे' खेलने मे अतिचतुर (या दूरदर्शी तथा हृदयज्ञ) मर नल नामक राजा बा मित्र था। क्रतुपण को पुत्र आत्तपार्णि महायशस्वी था॥८०॥ उष्का सुदास नामक प्रषद्रकामिता। सुदास वा पुत्र सदाय नामक राजा था॥८१। यही कल्पापाद आर मित्रसह नामा से भी प्रसिद्ध हुआ। कल्मषपाद क पुत्र का नाम शर्वकर्मा था॥८२॥ शर्वकर्मा थे अनरण्य नामक पुत्र हुआ। अनरण्य वे निघ्न नामक पुत्र हुआ। निघ्न क दो पुत्र हुए-- ८३॥ भनमित्र मरे रघु। भनमित्र ब पुत्र दुल्दुह हुआ, जो राजा अर विद्वान दोना था ॥८४॥ उससे पुत्र दिलीप हुआ, जो राम का प्रपितामह (परदादा) था। दिलीप क लम्बी बाहुआा दशरथ नामक पुत्र हुआ ॥८५॥ जो पूर्वकाल मे अयोध्या वा महाराज था। रघु से अज उत्पन्न हुआ अर अज स दशरथ। ॥८६॥ दशरथ स अत्यन्त धर्मस्वी अर परमात्मा राम का उत्तति हुई। राम से कुश नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ८७॥ कुश से अति महायशस्वा कर धर्मात्मा अतिथि उत्पन्न हुआ। अतिथि के पश्चात्॥