अध्याय 10 : दनु और दिति के पुत्रों का वर्णन
दनु और दिति के वीर पुत्रों का विस्तृत वर्णन
ऋषियों ने आग्रह किया – “हे सूत जी! आपने अदिति और अन्य माताओं की सन्तानों का परिचय दिया, किन्तु हम दानवों और दैत्यों के विस्तृत वंश को जानने के लिए उत्सुक हैं। दनु और दिति के पुत्र कौन-कौन से हुए? उनके पराक्रम और चरित्र कैसे थे? कृपया यह कथा सुनाइए।” सूत जी बोले – “दनु के पुत्र अत्यन्त बलवान और मायावी हुए। ये दानव कहलाये। दिति के पुत्र दैत्य कहलाये, जो और भी अधिक शक्तिशाली थे। इन्हीं दोनों वंशों ने देवताओं के साथ अनेक बार भीषण संग्राम किये।”
दनु के प्रमुख पुत्र
दनु के गर्भ से चालीस प्रमुख दानव उत्पन्न हुए। उनमें सबसे बड़ा विप्रचित्ति था, जो अपनी माया के लिए प्रसिद्ध हुआ। शम्बर नामक दानव ने इन्द्र पर अनेकों बार आक्रमण किये और उसे स्वर्ग से निकाल दिया। नमुचि ने इन्द्र के साथ मैत्री करके छल का आश्रय लिया, किन्तु अन्ततः इन्द्र ने फेन (झाग) से उसका वध किया। पुलोमा और उसका पुत्र च्यवन ऋषि की कथा विख्यात है। इसी वंश में महाबली केशी, दुर्जय, अयोमुख, शंकु, कालकेतु, दृढ़हा आदि अनेक दानव हुए।
विप्रचित्तिः शम्बरश्च नमुचिः पुलोमा तथा ।
दनोः पुत्रा महावीर्याः सर्वे देवविरोधिनः ॥
दिति के पुत्र – हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष
दिति के दो प्रधान पुत्र हुए – हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को जल में डुबो दिया था, जिसे भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर बचाया और उसका वध किया। हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त किया कि न वह दिन में मरे, न रात में; न मनुष्य द्वारा, न पशु द्वारा; न भीतर, न बाहर। उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया।
प्रह्लाद, विरोचन और बलि
हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के घोर अत्याचार सहने के बाद भी उसने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। प्रह्लाद का पुत्र विरोचन हुआ, जो अत्यन्त दानी और पराक्रमी था। विरोचन का पुत्र बलि हुआ, जिसने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की। बलि के अभिमान को शान्त करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण करके तीन पग में सब कुछ माँग लिया और बलि को पाताल का राजा बना दिया।
प्रह्लादश्च विरोचश्च बलिश्चैव महाबलः ।
हिरण्यकशिपोः पुत्राः दितिवंशविवर्धनाः ॥
अन्य दैत्य और दानव वंश
इनके अतिरिक्त दिति के वंश में मय दानव हुआ, जो विश्वकर्मा के समान शिल्पकला में निपुण था और उसने असुरों के लिए त्रिपुर नामक तीन अद्भुत नगरों की रचना की। सिंहिका नामक दैत्य-कन्या से राहु का जन्म हुआ, जो समुद्र-मन्थन के समय देवताओं के साथ अमृत पान कर बैठा था। इस प्रकार दनु और दिति के वंश ने त्रिलोकी में अपनी वीरता और शक्ति का परिचय दिया। इनकी कथा सुनकर मनुष्य को यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और अधर्म का अन्त सदा विनाश में होता है, जबकि भक्ति और सत्य का मार्ग ही शाश्वत है।
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे दशमोऽध्यायः समाप्तः ॥