अध्याय 7 : स्वायम्भुव मनु के वंश का वर्णन
स्वायम्भुव मनु के वंश का वर्णन
पिछले अध्याय में मनु और शतरूपा के पुत्र-पुत्रियों का संक्षिप्त परिचय दिया गया। अब सूत जी ऋषियों के अनुरोध पर स्वायम्भुव मनु के सम्पूर्ण वंश-विस्तार का वर्णन करते हैं।
प्रियव्रत और उत्तानपाद का राज्य
स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत ने सातों द्वीपों पर शासन किया। उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी रथ से पृथ्वी की सात बार परिक्रमा की और समुद्रों व पर्वतों का निर्माण कराया। दूसरे पुत्र उत्तानपाद अत्यन्त धर्मात्मा और भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। उनकी दो पत्नियाँ थीं – सुनीति और सुरुचि। सुनीति से ध्रुव का जन्म हुआ, जो परम भागवत बने और आकाश में ध्रुव तारा बन गए। सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र हुआ।
प्रियव्रत की सन्तानें
प्रियव्रत की दो पत्नियाँ थीं – बर्हिष्मती और अन्या। बर्हिष्मती से दस पुत्र हुए – आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, महावीर, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, सवन, मेधातिथि, वीतिहोत्र और कवि। इनमें से तीन पुत्र – कवि, महावीर और सवन – बाल्यकाल से ही विरक्त होकर तपस्या करने चले गए। शेष सात पुत्रों ने सप्तद्वीपों का शासन किया।
दक्ष प्रजापति और उनकी पुत्रियाँ
मनु की कन्या प्रसूति का विवाह प्रजापति दक्ष से हुआ। दक्ष ने अपनी पत्नी प्रसूति से चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। इन कन्याओं का विवाह धर्म, कश्यप, चन्द्रमा, अंगिरा आदि देवताओं और ऋषियों से हुआ।
दक्षः प्राचेतसो ब्रह्मन् प्रजासर्गे प्रजापतिः ।
चतुर्विंशतिकन्यानां पिता स परिकीर्तितः ॥
इनमें श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, पुष्टि, तुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री, मूर्ति आदि का विवाह धर्मदेव से हुआ। इनसे अनेक धार्मिक गुणों का प्रादुर्भाव हुआ। तेरह कन्याओं – अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि – का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ। इन्हीं से देवता, दैत्य, दानव, पशु-पक्षी, वृक्ष और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति हुई।
कर्दम ऋषि और देवहूति
मनु की तीसरी कन्या देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम से हुआ। कर्दम ने अपनी तपस्या से भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उन्हीं के वर से भगवान कपिलदेव ने देवहूति के गर्भ से जन्म लिया। कपिलदेव ने अपनी माता को सांख्य-शास्त्र का उपदेश दिया, जिसे ‘कापिल सांख्य’ कहा जाता है।
यज्ञदेव और दक्षिणा
मनु की ज्येष्ठ कन्या आकूति का विवाह रुचि प्रजापति से हुआ। इनसे एक पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न हुए – पुत्र का नाम यज्ञ और पुत्री का नाम दक्षिणा था। यह यज्ञ ही स्वायम्भुव मन्वन्तर में भगवान विष्णु का अवतार माने गए हैं। इन्होंने दक्षिणा से विवाह किया और बारह याम नामक देवताओं को उत्पन्न किया।
स्वायम्भुव मन्वन्तर का महत्त्व
सूत जी बोले – “यह प्रथम मन्वन्तर, जिसके अधिपति स्वायम्भुव मनु थे, अत्यन्त श्रेष्ठ और पवित्र माना गया है। इसी मन्वन्तर में सनातन धर्म, वर्णाश्रम व्यवस्था और यज्ञ-पद्धति की स्थापना हुई। स्वायम्भुव मनु और शतरूपा के वंशज ही सम्पूर्ण मानवता के मूल हैं।”
मनोर्वैवस्वतस्याद्याः सर्वे वंशधराः स्मृताः ।
आद्यो मनुः स्वायम्भुवः सर्वेषां प्रपितामहः ॥
फलश्रुति
“जो मनुष्य इस वंशानुक्रम का नियमित पाठ और श्रवण करता है, उसका अपना वंश शुद्ध होता है, वह पितृ-ऋण से मुक्त होता है और सभी लोकों में उसकी कीर्ति फैलती है। मनु-वंश की कथा सुनने से समस्त मनोरथ सिद्ध होते हैं।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥