अध्याय सूचकांक 13 कुल

1. अध्याय 1: ब्रह्म पुराण का मंगलाचरण, नैमिषारण्य का वर्णन और सूत-ऋषि संवाद 2. अध्याय 2: स्वायम्भुव मनु की वंश-परंपरा और शतरूपा की तपस्या 3. अध्याय 3: देवदानवोत्पत्ति-वर्णनम् - देवता, दानव और अन्य प्राणियों की उत्पत्ति 4. अध्याय 4: पृथु से लेकर सभी देव-दानवों के राज्याभिषेक का वर्णन 5. अध्याय 5: मन्वन्तरवर्णन - सभी मनुओं और उनके युगों का विस्तृत विवरण 6. अध्याय 6: सूर्य की उत्पत्ति का वर्णन (आदित्योत्पत्ति-कथनम्) 7. अध्याय 7: सूर्यवंश वर्णन - इला की कथा और मनु के पुत्रों की कहानी 8. अध्याय 8: सूरयेवश वर्णन - सत्यव्रत की तपस्या और वशिष्ठ का आशीर्वाद 9. अध्याय 9: चंद्रवंश-वर्णन और सोम की उत्पत्ति का विवरण 10. अध्याय 10: पुरूरवा की कथा और चन्द्रवंश का वर्णन 11. अध्याय 11: देवासुर-संग्राम, रजि की वरदान-विजय और ब्रह्मा का शस्त्र-उपदेश 12. अध्याय 12: ययाति का चरित्र-वर्णन और सोमवंश की महिमा 13. अध्याय 13: पुरु वंश का विस्तृत वर्णन और राजकुल का इतिहास
Brahma Purana • अध्याय 7

अध्याय 7: सूर्यवंश वर्णन - इला की कथा और मनु के पुत्रों की कहानी

अध्याय 7 : ७

सप्तमोऽध्यायः

सूर्यवश वर्णनम्‌

रोमहषण उवाच

मनोर्ववस्वतस्यासन पुत्रा वै नव तत्समा ॥१॥

इक्ष्वाकुद्चेव मभागो धृष्टः शर्यातिरेव च ।

नरिष्यन्तदच षष्ठो वै प्रार्‌ रिष्टइच सप्तम ।

करूपश्च वृपधयङ्च नवैते मुनिसत्तमा ॥२॥

अकरोत्‌ पुत्रकामस्तु मनुरिष्टि प्रजापति ।

भित्रा्र्णयोविप्र पूवमेव महामति ॥३॥

अनुत्पनेषु बहूप पुत्रेष्वेतेषु भो दविजा ।

सस्या च व्तमानस्यामिष्टया च द्विजसत्तमा ॥४॥

मिरावरुणयोरसे भ्वनुराहुतिमावहत्‌

तत्र दिव्याम्बरधरा दिष्याभरणभूविसा ॥५॥

दिव्यसह्नना चैव दलम जज्ञ इति श्रुति ।

तामिलेत्येव होदपच मनु्दण्डघरस्तदा ॥६॥

अनुगच्छस्व मा भद्रे तमिला प्रत्युवाच ह्‌ ।

धम्म॑ुतमिद नाष्य पुत्रकाम प्रजापतिम्‌ ॥७॥

इलोवाच

मिनावरुणयोरशे जातास्मि वदता वर।

तयो सकाश यास्यामि न मा घम्मेंहुता क्‌ ॥८॥

सेवमुकत्वा मनु देव भित्रावस्णयोरिसा।

गत्वान्तिक वरारोह प्राज्जसिर्वाक्यमश्रीत ॥९॥

अध्याय ७

सूर्यवश्का वर्णन

लोमहुपन ने कहा--दैवस्वत मनु के अपन ही समान इक्वाकु नामाय पृष्ट शर्याति नरिप्यन्त प्राश।

रिप्ट कल्प आर पुपश्च--ये न, पुत्र ये॥१२॥

विप्रवृद ! इन पुत्नो कौ उत्पत्ति से पहलें बुद्धिमान प्रजापति मनु नें पूत की इच्छा से मिता वर्ण का यज्ञ किया ॥३३॥

द्विजवय ! उस वतमान यन म मनु मित्र वरुण के भा से अग्नि मे घहुत-सी आहुतियाँ दी ॥४३॥

उस यश मे दिव्य वस्मामरण से अकृत तथा दिव्यरूपव्ती कन्या उलन हई।५२॥

दण्डधारी मनु न उसका नाम इला रखकर क्टा-- पुति) तुम मेरे साथ चलो।' तव पुना्थी प्रजापति से हला नं यह्‌ धम-युक्त वावय वहा (६७

इला बोली-- भ्रष्ठ वक्ता । मैं मित्रावरुण के जन से जनमी हुं । इसलिये उन्दी के पास जाऊँंगी। आप मुझ घम से च्युत न कर ॥८॥

एसा कहकर वह सुन्दरी दका मित्रावरण के पास चरी गई और अजलि वाँघकर कहने लगी ॥९॥।

इलोचाच

अंग्लेश््मि युवयोर्जाता देवों किं करवाणि घास ।

मित्रावरणावू चतुः अनेन तव धम्मेग प्रश्रयेण दमेन च स्त्येन चैदं सुश्रोणि प्रीतौ स्वो वरर्वाणिनि १९२

आवयोरत्व महामाये स्याति कन्येति यास्यसि! मरोचवंश्चकरः पुश्रसस्वसेव च भधिष्यसि १३१

सुदुम्न इति विह्यातस्त्रिपु ककेषु झोभने। जगतुमियों घम्म॑शीलो मनोव्वंश्विवद्ध न॥ १ ४॥

निवृत्ता सा तु तचुछुत्वा गच्छन्ती पितुरन्तिकात्‌ १५

युपेनान्तरमासाद्य मेयुनापोपमन्त्रित । भसोमपुत्राद्बुधािप्रस्तस्यां अने पुरूरवा। १६१

जनयित्वा तत। सा तमिला सुयुम्नतां गत्ता। सुयुम्नस्प तु दायादास्त्रयः परमधरप्मकाः। १७१

उत्कल गयदचेव विनतादवश्च, भो द्विजा" | उत्कलस्योत्कला विप्रा विनतादइवस्य पश्रिचमा॥१८॥

दिकुपूर्ववों मुनिशादुदैला गयस्य तु गया स्मृता! प्रविष्टे तु मनौ विप्रा दिवाकरमरिन्दमम्‌॥१९॥

दक्षया तत्पुम, क्षत्रमकरोत्‌ पुथिवीमिमाम्‌। श्ष्वावुर्पेष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवानु 0२०१

अन्याभावातु सृधुभ्नो .नैतदराज्यमवाप्तचान्‌। वतिष्ठवचनप्वासीत्‌'" प्रतिष्ठाने महात्मन॥२११

इला ने कहा दे देवताओ। आप दोनो के अश से मैं उत्पन्न हुई हूँं। किन्तु मनु न मुझे अपन साय चलने के लिए कहां था १० अव आप मुझे आदेश दे, षया करं 7 दिजवर्य ! उस धर्म-परायण साध्वी इला के

ऐसा कहन पर मित्ा-वरुण ने उससे कहा ॥११॥

मित्रावरुण बोलें--हे सुन्दर कटि वाली ! हे भङ्गे! तुम्हारे इस घम, विनय, शान्ति और सत्य से हम प्रसन हैं ॥१२॥ छुम हमारी पुनी रुप में ससार मे स्यात होगी । हे शोमने ! मनु का वद-वघेक पुत्र तुम्ही होगी ॥। १३॥ जत्‌ प्रिय, धर्मात्मा और मनु-वश-वर्धक सुचुम्न--इस नाम से तीनो लोक मे विख्यात होगी'। यह सुनकर णह पिता ये" यहीँ से लौट पडी ॥ १४--१५॥ तो अवसर पाकर चन्द्रमा वे पुत्र वघ > उससे रति की प्रार्थना की । और बुध से इला मे पुरूरवा नाम का रष उत्पत्र हुआ ॥१६॥ उसको उत्पत्त कर इव्त सुदुम्न बन गई। विप्रवृद !

सुयुम्न के परम धार्मिक तीन पुत्र हुए--उत्कल, गय आर विनता १७१) मुनिश्रेष्ठो ! उत्कर को उत्कल, विनताश्व की दिक््पाश्चिमा अगर गय की गया नामक नगरी वनी॥१८३॥ द्विजेवृन्द ! जवे मनु शत्रसुदन सूये मे प्रवेश तिया, तब उसके पूत्रो ण इस पृथिवी को फिर दस मामो मे बॉट दिया॥ १९२॥ ज्यप्ठ पुत्र इक्पाकु को मध्यदेश मिला रना कम्यामाव हो" के कारण सुधुम्न को यह राज्य मही मिला। ब्राह्मणवर! वरिष्ठ के वचन से घर्मराज सुधम्न की प्रतिष्ठा महात्मा परयो के समान होने लगी॥र१ट्ेत जि है ख रस्मियुक००८ २ कं मनुवदा० । ३ कं ०पहासिता। ४ खं ०घाद्रांजा तस्माज्जजे। ५ क. विजिता०। ६ विजिना०। ७क' ०घातदमूत्ल्त० | ग न्धा तु कुर्पेनम०! ८स ०कुर्मऽ््टदाऽ। ग्‌ ण्तदूगुण स० १० ख ° नाच्चाऽऽपी० ।

ब्रह्मपुराणम्‌ द

प्रतिष्ठा धर्स्मराजस्य सुम्नस्य द्विजोत्तमाः) तद्पुरूरवसे प्रादद्राग्यं प्राप्य सहायशाः ॥२९॥

मानवेयो मुनिश्रेष्ठाः स्त्रीपूंसोलंक्षणयुतः | घृतर्वास्तामिलेत्येवं' सुचुम्नेति च भ्विभुतः ॥२३॥

नारिष्यन्ताः शकाः पुत्रा नाभागस्य तु भो द्विजाः | अम्बरीदोऽभवत्‌ पुत्रः '्पाथिवर्षनसत्तमः

मुहुर्तंभूत देवस्थ तस्यौ बहुयुगं द्विजाः आजगाम स चैवाथ स्वां पुरीं, यादवेवुतामु ॥३१॥

कृतां द्वारवतीं नाभ वहुद्रारं मनोरमाम्! भोजवृष्ण्यन्धकंगुप्तां वसुदेवपुरोगमैः ॥३२॥

तत्रेव रेवतो ज्ञात्वा यथातच्वं द्विजोत्तमाः कन्यां तां बलदेवाय सुभद्रां नाम रेवतीम् ॥३३॥

द्या जगाम शिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः। रेमे रामोऽपि घर्म्मत्मा रेवत्या सहितः सुखी ॥३४॥

मान् यशस्वी सुयुम्न राज्य प्राप्त कर पुरूरवा कौ दे दिया ॥२२॥

मुनिचर! स्त्री-पुरुष उभय लक्षणों से युक्त।

मुद्युम्न को देखकर लोग उसे इला और सुथुम्न दोनों नाम से पुकारने लगे॥२३॥

विद्रवृन्दे। नरिष्यन्त के शक जाति वाले पूर्व हुए। नामागे के राजाओ में शरेष्ठ अम्बरीप पुत्र हुआ ॥२४॥

धृष्ट के युद्ध-गर्वी पाष्ठ नामक काबिय-पुत्र हुआ। करप के युद्धामिमानी करूप नामक क्षेत्रिय-पुत्र थे ॥२५॥

नामागर और घृप्ट के क्षत्रिय पुत्र ववय बन गये। प्राशु के एक पुत्र हुआ जो प्रजापति बहलाया ॥२६॥

नरिष्यन्त का पुत्र यम दण्ड धारी राजा हुआ। र्याति बे आनन नामक पुत्र और सुकन्या सामने पूर हुई। सुकन्या च्यवनं मुनि की पत्नी बनी। आनत का युवन सहा तेजस्वी श्व हुआ ॥२७-२८॥

आनतं देश में इसका राज्य था और कुशस्थली (द्वारका) राजधानी थी। रैव का धर्मात्मा पुत्र रैवत और कुदो दोनों नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥२९॥

वह उच्चेष्ठ युवा था और उसी को इसका राज्य मिला। गान्धर्वं वेद को सुनकर यह अपनी वन्धा सहित ब्रह्मा के पास चला गया॥३०॥

वहाँ वह देवताओं की दो घड़ी के बराबर बहुत युगों तक ब्रह्मा के पास ठहर गया। फिर यादवों से व्याप्त यप, नगरी दका पुरी नामक लट आया ॥३१॥

नगरी बहुत दाससे वालों और मनोहर थी। भोज, वृष्यि और अन्धक वशवाले, जिनमे बसुदेव प्रधान थे, उसके रक्षा करते थे ॥३२॥

विमरकेरा उसी नगर में श्रीकृष्ण के वंदे साई बलराम बे यथायं तत्त्व को जानकर रैवत रेवती नामक अपनी सुन्दरी कन्या बलदेव को समर्पित कर तपस्या करने के लिए मुमेरु पर्वत पर चला गया। धर्मात्मा बलराम और रेवती के साथ सुखपूर्वक रमण के ॥३३-३५॥

सप्तमोऽध्यायः

मुनय उचुः

मथं बहुपुगे काले समतीते महामते। न जरा रेवतीं प्राप्ता रवं च पकुदुमिनमू ॥३५॥

मेदं मतस्य वा तस्य हायति सन्ततिः कथम्। स्थिता पृथिव्यामद्यापि भोतुमिच्छाम त्वतः ॥३६॥

लोमहर्षण उवाचं

म जरा लुत्पिपाता वा न मृत्पुर्मुनिसतमा। ऋतुचधरं प्रभवति ब्रह्मलोके सदानघाः ककुद्मिनः, स्वर्लोकं तु रेधतत्य तस्य हु ॥३७॥

हताः पुण्यजनेदिप्रा राक्षसैः सा कुशस्यलो। तस्य श्ातृशचतं स्वासीदधाम्म स्य महात्मनः ॥३८॥

तद्वध्यमानं रक्षोभिर्दिशा प्रापामदच्युताः। विद्ूतस्य च विप्रद्रास्तस्य स्रातुदातस्य वै॥३९॥

अन्ववायस्तु सुमहास्तभ तन द्विजोत्तमा। तेषां छेते मुनिशेष्ठाः शर्याता इति विभुता ॥४०॥

क्षत्रिया गुणसम्पन्ना दिक्षु सर्वासु विभुता। सर्वव सथ्वंगट्नं श्रदिष्टारते महौजसः ॥४१॥

माभागरिष्टपुत्रौ दौ वैश्यौ

प्राप्त हुई? (३५॥ या भेर परैत पर उनके चले जान पर शर्यात्रि राजा की सन्तान आज भी पृथ्वी पर कहाँ अवस्थित है? यह बात हम लोग तत्वतः सुचना चाहते हैं ॥३६॥

लोमहर्षण बोले--निष्पाप मुनिवृन्द ! बुढापा, मूत, प्यास, मृत्यु और ऋतु-परिवर्तन आदि ब्रह्मलोक में नहीं होते हैं।

ककुदी, रवत के देव-लोक चले जग पर राक्षसों ने अधिकार कर लिया॥ ३७॥

उस धार्मिक राजा के भाई थे, जो राक्षसों के पीड़ित होकर विभिन्न दिशाओं में भाग गये।।३८॥ ब्राह्मणश्रेष्ठों ! उन आये हुए मध्यों का वंश बहुत बड़ा था। उसी वंश के लोग सब दिशाओं में शयति नाम से विख्यात सर्वगुण सपन क्षत्रिय हैं ॥३९॥

वे महान् तजस्वी शरव और से सब चनो में प्रविष्ट हुए ३९-४१॥

नामागारिष्ट के वैश्य जाति वले दो पुत्र ब्रह्मण् चन गए। करूप के ऋरूष नाम से प्रसिद्ध युद्धाभिमानी क्षत्रिय उत्पन्न हुए।४२॥

सिप्रचर पृषं गुरु की गायों को मारके कारण शाप से शूद्र हो गया। मुनिश्रेष्ठों ! मैंने पुत्र वैवस्वत मनु के कहलाये ॥५३॥

ब्राह्मणों ! मनु की श्रीक से इक्ष्वाकु उत्पन्न हुआ॥४४॥

इक्ष्वाकु के बहुत-सी दक्षिण देने वाले सौ पुत्र हुए। उनमें भिक्षि सबसे ज्येष्ठ था। यह पेट की गड़बंडी के कारण युद्ध करने में असमर्थ रहा ॥४५॥

प्राप्तः परमधर्मज्ञ। सोध्योध्याधिपतिः प्रमुः। शकुनिपरमुखास्तस्य पुत्राः पञ्चशतं स्मृताः ॥४६॥

उत्तरापथदेशास्य रक्षितारो महाबलाः। चत्वारिंशदष्टी च दक्षिणस्यां तथा दिशि॥ ४७॥

चद्विप्रमुखाश्चान्ये रक्षितारो द्विजोत्तमा। इहास्त विकुक्षि वा अष्टकायामयादिशत्‌ ॥४८॥

मांसमानय श्राद्धार्थ मृगान्‌ हत्वा महाबल। श्राद्धकर्मणि चोद्दष्ठों अदत श्राद्धकर्णि ॥४९॥

भक्षयित्वा शकं विप्रा शशादो मृगयां गतः। इक्ष्वाकुणा परित्यदतो वसिष्ठबचनात्‌ प्रभुः ॥५०॥

इक्ष्वाकौ संस्थिते विप्रा शशादस्तु नृपोऽभवत्‌। शकुञादस्य तु दायादः ककुत्स्यो नाम वीर्यवान्‌ ॥५१॥

अनेनास्तु, ककुतुस्थस्य पृथुरचानेनस् स्मृत।। विष्टराइवः पृथोः पुत्रस्तस्मादष्टवजायत ॥५२॥

आस्य युवनाइव्तु श्रावस्तस्तरसुतो विजः। जज्ञे धावस्टको राजा श्रावसती मेन निर्मिता ॥५३॥

श्रावस्तस्य तु दायादो बृहदश्वो महीपति। कुवलाइव सुतस्तस्थ राजा परमधार्मिकः ॥५४॥

यः स पुंधुदधाद्राजा धुन्युमारत्वमप्तः ॥५५॥

मुनय उचुः

धुन्धोर्यय, मीभ्राज्ञ श्रोतुमिच्छाम तत्वतः। यदधात्तुवलादवोऽसतै धुन्धुमारत्वमागतः ॥५६॥

लोमहर्षण उवाच

कुवलाइवस्य पुत्राणा दातमत्तसधन्विनाम्‌। स्वे विद्यासु निष्णाता बलवन्तो दुरासदः ॥५७॥

विकुक्षि अयोध्या का शामक था। उसके शकुनि आदि पाँच सा धुन हुए ॥४६॥। जिनमें से चालीस उत्तराध्य के और अर्ह दक्षिणापथ के महावर रक्षक ये ॥४७॥

और उसमे भद्रं हुआ। ॥५२॥

विग्रृन्द आदं कय पुत्र युवनाइव आर उसका धुव धरामि हुआ। श्राव के पुत्र थावस्तक श्रावस्त। नाम की नगरी बसायी। ॥५२॥ श्रावस्तक का पु राजा वृद्व हुआ। उसका पुत्र परम चर्मात्मा राजा कुवलादव हुआ, जिसका नाम धुधु नामक दैत्य क मारु से धुघुमार पड गया।

५४-५५

मुनियों ने कहा-हे महाविद्वन्! हम धु कै मारन का अस्यान तत्त्वपूर्वक सुनना चाहत हैं, जिसके मार से कुवलाइव धुघुमार कलाया।

॥५६॥

लोमहुर्पण घोले-ुवलाय्व वे उत्तम घनुर्घर, चव विचा-विशारद, वलवान्, सुन्दर, घर्मोत्मा, म्र्ता मौर हैक रर्मज्ञ पृथिव्याधिर रख नशि इणदध०। रे ख ण्ननय कर बस न्त वारािवस्तु पृर।

५क विप्यारद पुर। दय्। ख। यस्तु घु०। ७ क, ०प वय बरहुज्भादु।

पद सप्तमोऽध्यायः

बभूवुर्धार्मिकाः सर्ववे यज्वानो भूरिदक्षिणाः। कुवलाइव पिता, राज्ये बृहद्वो न्ययोजयत्। ॥५८॥

पुन्रसंकामितश्रीस्तु वनं राजा विवेश ह्। तमु्तड,कोध्य विप्रपिः प्रयान्तं पर्यवारयत्। ॥५९॥

उत्तझूक उवाच

भवता रक्षणं काय्यं तर्च कर्तु त्वमर्हसि! िशुद्िभ्नस्तपश्चतु नहि शवनोमि पार्थिव। ॥६०॥

ममाश्रमसमोपे कै समेषु मरुधन्वसु) समुद्रो बालुकापूर्ण उद्दालक इति भूमृतः। ॥६१॥

देवतानामवध्यश्च महाकायो महाबल। अन्तभूमिगतस्तत्न वालुकारन्ताहतो महान।

राक्षसस्य मधोः पुत्रो धृन्धर्नाम महासुर। शेते लोकबिनाशाय तप आस्थाय दारणम्। ॥६३॥

संवत्‌सरस्य पग्येन्तं स निइवासं निमुरचति। यदा तदा मही तेत्र चलति स्म नराधिप। ॥६५॥

तस्य नि इवासवातेन रज उद्धूयते महत्। भादित्यपथमावृत्य सप्ताहं भूमिकम्पनम्। ॥६५॥

सविस्फ्लिद् साद्वारं सधूममतिदारुणम्। तेन तातं न शछवनोमि तस्मिन्‌ स्थातुं स्व आश्रमे। ॥६६॥

तं मारथ महाकायं लोकाना हितफाम्यया। लोका स्वस्या भवन्त्यद्य तस्मिन्‌ विनिहते त्वया। ॥६७॥

त्वं हि स्यं वधायैकः समय: पृथिवोपते। विष्णुना च वरो दत्तो महं पव्वयुगे नृप। ॥६८॥

यस्तं महासुरं रौप्रं हमिष्यति महाबलम्। तस्य त्वं वरदानेन तेजदचार्यापपरिष्यति। ॥६९॥

न हि धुनधुमंहातेजास्तेजसाल्पेन करास्यते। निदेग्धु पृथिवीयार चिरं युगदातैरपि। ॥७०॥

बहु-दक्षिणा-दाता सौ पुच्र हुए। ॥५७॥ पिता वृहवश्व कुवलाइव को राज्य प्रदान किथा। इस प्रकार राज्य-चक्ष्मी पुत्र के अधीन चर राजा थे कन मे एवे किंया। पर उत्कर नामव बरहि उसको आने से रोक दिया।

उत्तक ने फहा--राजन्‌। सुम्हे रक्षा करनी चाहिये तुम उसके योग्य हो, मैं निश्चिस्ततापूर्वक तपस्या नहीं कर पाता। ॥६०॥ क्योकि मेरे आश्रम के समीप मरुघन्वा नामक देश मे बालू से भरा हुआ समुद्र उदारक नाम से श्यात है। ॥६१॥ वहाँ पृथ्वी के भीतर प्रवेश कर रेत से आच्छादित, देवंताआ से मी अवध्य, महाकाय और महाबली मधु नामक राक्षस का पुत्र घुघु नामक महाराक्षस कठित तपस्या करके लोक विनाश के लिए शयन करता है। ॥६२

ब्रह्मपुराणम्‌ ४७

वौयल्च भुमहत्तस्य देवैरपि दुरासरदम्‌। स एवमुक्तो राजपिरुततड.केन महात्मना ! कुवलाश्व सुत प्रादात्तस्मे घुन्चुनिबहूँणे ७ शा

बृहुदइव उवाच

भगवग्यस्तशषस्योऽहुमय तु तनयो मम। भविष्यति द्विजेष्ठ धुन्युमारो न सदाय ॥७२॥

सख त व्यादिश्य तनय राजपिर्दुन्युमारणे। जयाम पर्व्वता्यैव नृपति सरितद्रत ।७३१)

स्मोमहुवंण उवाच

कुबलाइवस्तु पुनाणा दतेन सह भो दिना । भरायादुत्तड क सहितो धुन्धोस्तस्य निवर्हणे ॥ ७४॥

तमाविदालदा विष्णुस्तेजसा भगवान्‌ प्रभु । उत्तड कस्य नियोगा लोकाना हितकाम्यया ।१७५॥

तस्मिन्‌ प्रयाते दुर्ये दिवि इ्दो महानभूत । एप श्मानवध्योऽदय धुन्धुमारो भविष्यति॥ ७६॥

दिव्यरगन्दच मात्यैश्च' त देवा समवाफिरन। देवदुनदुभयदचैव णेव र सत्तम ॥७७॥

स॒ भत्वा जयतः 'श्रेष्टस्तनय सह्‌ वीर्यवान्‌ समुद्र लानयामास वालुकान्तरमव्ययम ७८

तस्य पुर्रें खर्नाद्धिदच बालुकार्न्ताहितस्तदा । घुघुरासादितों विप्रा दिदमावृत्य पढिचमाम ॥७९॥

मुखजेनाग्निना... फ्रोधाल्लोकानुद्तयक्निव । चारि. सुखाव वेगेन महोदधिरिवोदये ॥८०॥

सोमस्य मुनिशाददूखा वरोर्मिकलिलो महान्‌ । तस्य पुत्रशतं द्व त्रिभिल्नतु रक्षसा ॥ ८१॥

दववाजा से मा अजय है। महात्मा उत्तव क एसा कहने पर राजपि 4 अपन पुर कुवलाइव को धृचु-वध क निमित्त उस मुनि को दे दिया।॥७१॥

बृहुदश्व ने फहा--मगवन'! नता शस्त्र का व्याग कर दिया है। कितु मरा यह पुत्र निः्सलेह घुषु को मारगा॥ 3२ इसक वाद अपन प्र को धुपु-वव का आदेश देवर वह राजपि तपस्या करू क लिए पवत पर चरा गया।॥+७३॥

छोभहंण बोल्--ब्राह्मणो! स धवा को सगल कुवलागव नेउत्तक के साथ घुधु का मारन वे लिए प्रस्थान किया तो लोकहित क रिट उत्तक की आता से मगवान विष्णु उस कुदलारव के गरीर में प्रविप्ट हुए॥ 3४ ७५॥। राजा कं प्रस्थान करते ही आवारावाणा का महानाद हुआ क्रि यह राजा अवध्य हैं अर घुधु का मारेगा। ७६॥ देवताओआ + उसके ऊपर दिव्य मुगिधिन पूष्पा दी दृष्टि की। ई दुमा वजन लगा ॥ 3 जय नीला मे श्रष्ठ वह्‌ पराक्रमी राजा अपन पुता क साय जाकर वालू से परिषुण समुद्र को खुरवान लगा ॥ 3८) ब्राह्मणों! राजा-पुत्ना वे खान वे समय वानव मीतर छिपा बुघु परिचिम दिए को ढक कर खडा हो गया ॥3९॥ आर ऋ्रोष से दिव को सहार करन कं लए मुख से अग्नि निवालत टुए चद्ोरय म॒ अत्यन्त तरगित महासागर की तरह वेग से जल वदान लगा ॥८०टै॥ मुनिवृन्द ! राशख न तान को छोर कर सब पुदा को जला टिया ॥८१॥

४८ सप्तमोऽध्यायः

त्तः स राजा धुतिमान्‌ राक्षसं तं महावलम्‌ } आससाद भहातेजा धुन्धुं धुन्धुविनाशनः ॥ ८२॥

तस्य वारिमयं वेगमापीय स नराधिपः। योगी योगेन बद्धिरूप ध्मयामाप वारिणा॥१८३॥

निहत्य तं महार्घं बलेनोदकराक्षसम्। उत्तङ्कं दर्शयामास कृतकर्मा नराधिपः॥८४॥

उत्तङ्कस्तु वरं प्रादात्तस्मै रत्ने महात्मने। ददौ तस्मै क्षयं वित्तं श्रुभिः अपराजितम्॥८५॥

र्मे रतिर सततं स्वर्गे वासं तयाक्षयम्। पुत्राणा चाक्षयात्सोत्थं स्वर्गे ये राक्षसा हताः॥८६॥

तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा दृढाइवो ज्येष्ठ उच्यते। चर्दाइवकपिलाइवी तरु कनीयांसौ कुमारकौ॥८७॥

धौन्धुमारेदृदादवस्य हर्गयस्वद्वात्मज स्मृतः। हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत् क्षयपर्मरत भ्वद॥१८८॥

संहताश्वो निकुम्भस्य सुतो रणविशारदः। अशशाइवकृशाइवों तु संहतागवसुतौ द्विजाः॥८९॥

तस्य हैमवतो कन्या सतां मता दृषद्वती। विष्याता प्रिपू लोकेषु पृद्रहचास्याः प्रसेनजितु॥९०॥

लेभे प्रसेनजिद्भास्य गौरी नाम पतिव्रतम्। अभिरास्ता तु सा भर्ता नदो थे बाहृदामवत्॥९१॥

तर्य पूरो महूनासीदूवनादवो नराधिप। माग्धाता मुवनादवस्य त्रिलोक विडयौ सुतः॥९२॥

तस्य चेप्ररयो भार्या द्वादाविन्दोः सुत्ताभवत्। साध्वी दिन्दुमती नाम रुपेणासदूशी भुपि॥९३॥

पतिव्रता च अप्रेष्ठा च मातृणामयृतस्य दे। तस्यामुतुपादयामास भान्धाता द्रौ सूतौ द्विजाः॥९४॥

पुदवुत्सं च परम्म्ं मुचुवुन्दं च पायवम्। पृरकुत् ससुतरत्वासीए्यसदस्युंहोपतिः॥९५॥

हद कल्निनान् एवं महान जस्वौ बह न्यूना राजा उस महायली धुन्धु के पाग पहुँचा॥८२॥ उस योगी राजा मे शायविया बे बल मे उसने जरमय वेग को पीकर जत से अआग्नि को शान्त पिया॥८३॥ उत सहाय जल-राझस को बल से सारम कृत दृश्य राजा ने उत्तर को दिललाया दशा उ्तोक में उस राजपि का यह दद्दान दिया अधाय चन सुग्हारे पाय होगा, शमो से पराजय नहीं होगा, धर्म में सदा अनुराग रहेगा, अशय रूप से स्वर्ग में बाय होगा अर दिन पु को रात ने मारा, उन्हें वर्ग मे अक्षय लोग मिलेंगे॥८५-८६॥उय राजा थे अवधिप्ट तीन पुरा मृड स्पष्ट था। बुभार चन्दादव और कपिलायव छदे थे।॥८७॥ पुपुमारदुय दय हैं हयेसव सामक पुर उशत हुआ। हपरव थे सदा दाथियन्यर्म से तत्पर नितुम्से नामक धूम हुआ॥८८॥ निहुस्स थे युद्ध कूराल शजताएय पुत्र हुमा। दियवुन्द रहदाइव ड दा पुषर हुए-एमइणारव आर बूसाइव॥८९॥ सटतारय दे शतपुरणों गे झाइरणत्या और तल लोहा मे दूपदती माम से विख्यात हैमवत सामक बन्या हुई। इसने प्रसनजितू ममक गुव हुआ॥९०॥ प्रसर्जितू के पतिया घटती बा सास ररी था। पति थे शाप से सही गंतरी बदृदा मामक नदी हमार) प्रमनकितू का प्र ऐुशवाएय महाक राजा हुआ! पूषदारय के पेलाकय सिजर्य, सता पूवा॥ गुर पॉ्डडिन्टु थी श्ष्या चवरपी उनी सां हुई। वर अनुम मुन्डी, दिधुमनी मानने दश्यत, पृन्स्या आर दस हजार सपा से सवन बही थी॥९३॥ हे दिरेगण + साधा से उसमे दो सु कसम वि देर पुर्तुरण मोत राजा पून् ट) पुरदुरय का चुत पसदर्यू नमत राजा ब्‌॥५९.१५४॥ उसके समेदा उतर ण कन्दा २ के रिहा वे विन्द देर द्वि गुद्दागा स्वना ४ हा ग रएत। भूष पमा एक तरया। छक स्प्यी पल्ट्ूसन॥८॥

एयामथोलन्नः तम्भूतस्तस्य चात्मजः। प्सम्भूतस्य ततु वायादस्तरिधन्वा नः॥९६॥

राज्ञस्निधन्वनस्त्वासी द्विहदस्त्रव्यारुणः प्रभुः। तस्य सत्यव्रते नाम कुमारोऽभून्महावलः॥९७॥

परिग्रहूणमन्ाणां विध्नं चकते सुदुम्मेतिः। येन नार्य्या कृतोद्वाहा हता चैव

नाहं पुरेण पुत्रार्था स्वयाद्च कुलपांसन। इत्युक्तः स निराफामद्नराद्र चनात् पितुः ॥१०२॥

न चतं वारयामास सिष्ठो भगदानूषिः। स तु प्त्यद्रतो विप्राः इवपाकादसयान्तिके॥१०३॥

पिन व्यवततोऽवसद्रीरः विताप्थस्य चनं गौ। ततस्तस्मिंस्तु दिवये नावर्वत् पावशासनः॥१०४॥

समा द्वादश मो विप्रास्तेनाधस्मेण वे तदा! दारास्तु तस्य दिपये विदवामित्रो महातपाः॥१०५॥

संन्यस्म सागरास्ते तु चकार विपुलं तपः! तस्य पत्नी गले बदृच्वा मध्यमं पुत्रमौरसम्॥१०६॥

शोषस्य भरणाय श्व्यक्रोणाद्गोक्षतेन यै। तं च वद्धं गले दुष्ट्वा धियां नुपात्मजः॥१०७॥

महधिपुनं धम्मत्मि मोक्षयामास भो द्विजाः। सत्यद्रतो महाबाहुर्भरणं तस्य चाकरोत्॥१०८॥

विश्वामित्रस्य दुष्टूयथंमनुषम्पांनेव च। सोऽभददगाख्यो नाम गे बन्धान्महप्तपाः॥

समूत नामक पुत्र हुआ। समूत का पूर त्रिवन्वा शत्र का मर्दन करनवाला या॥९६॥ राजा त्रिधन्वा के व्रग्ाह्ण नामक विद्वान पुन हुआ। उसके सत्यद्रतं नामक महाबलो कुमार हुआ।।९७॥ वहं बद दुप्टबुद्धि था, छोगो के विव मे विघ्न करता था, दूसरे की विवाहिता पत्नी का अपहरण कर छेता था॥९८॥ उसने बचपन, काम, मोह, साहस तथा चचलता के कारण काम से पीडित हो किस नगरवाप्तौ की क्म्या चुरा छी।१९९ उसके अधर्माचरण के वारण चय्यारुण ने क्रोध से बहुत मालिया वकते हुए उका परित्याग कूर दिया। परित्यक्तं पुत्र पिता से वारम्बार बहने ल्ग कहाँ जाऊंगा?'

तद पिता में बहा--'चाडालों मे साथ रह। रे कगार! आज तुच जैसे पुत्र से मुझे बोई प्रयोजन नहीं है।'॥१००-१०१॥ दद प्रकार पिता के वचन से वहु नगर से निकल गया॥१०२॥

भगवान् चखिष्ठ ने मी उसे जाने से मही रोका। विप्रगण। वहु वीर सत्यब्रत पिता से त्यक्तं होषर चाडाल दे घर रने र्या। उसका पिता भी वन चला गया॥१०३॥ ब्राह्यणो। तब इर नै दारह घो तक उसने राज्य मे बुष्टि नही की। महातपस्वी विशेवामित्र अपनी पत्नी को उसके राज्य में छोडकर समुद्र-तंट पर धोर तपस्या वरे सगे॥१०४-१०५॥

उनकी स्यौ अपने मक्के पुत्र के गले को वाव कर देय दुम्ब के पालन के लए उसें सी गायों बे मूल्य में बेचने को चली॥१०६॥ विप्रदृन्द! इस प्रवार बेचे हुए महर्पि-पुत्र को देखकर धर्मात्मा सत्यव्रतं ने उसे छुडा दिया भार विश्वासित्र की प्रसनता तथा अनुकम्या के निमित्त उसका मरण-पापण नी किया॥१०७-१०८॥

शक नमूतिस्त०{ २क नमूतश्चैव दा०। देख शद्विदरान्वस्माऽ०$ ग दना। ५ छ रयक्ता॥ ६ स. पात। ७ ख दुष्टेन। ८ ख. शप्रा पुरस्य स्वस्य चान्ति०। ९ स «णादास०