अध्याय 1: ब्रह्म पुराण का मंगलाचरण, नैमिषारण्य का वर्णन और सूत-ऋषि संवाद
अध्याय 1 : १
॥ गणेशाय नमः ॥
ब्रह्मपुराणम्
प्रथमो अध्यायः
तत्रादौ नैमिषारण्य-वर्णनम्
यं ध्यात्वा सुनिष्ठितप्रपञ्चरहित विन्दन्ति भोक्षं रुव, तं वन्दे पुद्धोत्तमार्यममलं नित्यं विभुं निश्चलम् ॥ १॥
यं ध्यायन्ति बुधाः समाधिसमये शुद्ध वियत्सदृशं, नित्यानन्दमयं प्रसन्नममलं सर्ववेदवरं निर्गुणम् । ध्यक्ताव्यक्तपरंप्रपञ्चरहितं ध्यानैकयम्यं विभु, तं संसारविनाशकहेतुमजरं वन्दे हरि मुवितदम् ॥ २॥
भुपुष्ये नैमिषारण्ये पवित्रे सुमनोहरे। नानामुनिजनाकीर्णे मानपुष्पोपललोभिते ॥ ३॥
सरलः कणिकारश्च पनसेधवखादिरेः। आम्रजम्बूफलिस्येदव न्यग्रोधदेवदारुभिः ॥ ४॥
अशोकैः पारिजातैश्च चन्दनागुरपाटले। बकुलः सप्तपर्णैश्च पुष्टागर्नगिकदरः ॥ ५॥
दालेस्तालेस्तमालेदच नारिकेलेस्तथार्जुनिः। अप्येश बहुभिर्वृक्षैश्चम्पकाचैश्च शोभिते ॥ ६॥
सानापक्षिमणाकीर्णे नानामृगमणेवुते। नानानताशयैः पुष्येदोधिकावेरलटषटते ॥ ७॥
अध्याय १
जिससे यह विस्तार के साय रचा हुआ माया-मय सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है, जिसमे स्थिति रहता है तथा रस्ये कल्प के अन्त में विलीन हो जाता है और जिसका ध्यान करके मुनिगण प्रपञ्चरहितं मुक्ति को प्राप्त करते हैं उस निर्मल, नित्य, व्यापक, अचल, पुद्धोत्तमसज्क देव को प्रणाम करता हूँ। है। समाधि की अवस्था में विद्वान (खावक) जिसका ध्यान करते हैं, उच आकाश के समान स्वच्छ, आनन्दमय, सदा प्रसन्न, निर्मल, सर्ववेद्वर, निर्गुण, स्पष्ट और अस्पष्ट रूप से परे, सृष्टि से रहित, केवल ध्यानयोग से प्राप्त करने योग्य, व्यापक, संसार में प्रलय के परण, अनर्य और मोक्षदायक हरि को प्रणाम करता हूँ॥२॥। मुनियोंगण से व्याप्त, अनेक प्रकार के पुष्पों में सुशोभित, पुष्पाल्पक, पवित्र और मनोहर नैमिषारण्य की दनन्यत्ती चरक (सदर), मार्जनक (अमलताय), कटे, घव, सदिर (सर), आम, जामत, कटवरेल, वरगद, देवदार, पीएल, पारिजात, चन्दन, अगर, पाटला, मुलबेरी, साल, तुहाग, नांगकेसर, दाल (ससू), ताल, तमाल, मारिवंख, अर्जुन और चम्पा आदि नानाविध वृक्षों से भी सुशोभित था ३-६। वह अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों, पवित्र बावली मादि अनेक जन्तुओं से
ब्राह्मणैः क्षत्रियैः वैश्यैः शूद्रैश्चान्येदच जातिभिः। वानप्रस्थगृहस्थैश्च यतिभिर्यतिचारिभिः ॥ ८॥
सम्प्रपञ्नगोडुलेश्चैव सवत्र सुसमृद्धकृते। धवगोधूमचणकर्मावमुद्गततिरेकषुमि ॥ ९॥
चौनकादयस्तथा मेध्यैः रयेदचान्येदच शोभिते । तन दीप्तं हुतवहे हुयमाने महामखे ॥ १०
यजतां तनैमिपेपाणां सत्रे द्वादशवाधिके। आजम्मृस्तत्र भुनयस्तथाऽ्येऽपि द्िजातयः।। ११॥
तानायतान् द्विजांस्ते तु पूजा च्ययोचिताम् तेवु तनोपविष्टेषु नद्त्विभ्मि. सहितेषु च॥१२॥
तत्राजा सूतस्तु भति्मरलोमहर्पणः। तं दृष्ट्वा ते मुनिवरा. पूना चरुर्मुदारिविता. ५१३५
सोऽपि" तान् प्रतिपूज्यैव सदिव वरासने । कथा चस्तदन्योन्ं* सूतेन "सहिता द्विजाः ।\ ९४१
कथान्ते* ब्यासशिष्य ते" पप्रच्छ."* संशयं मुदा \ ऋत्विग्भिः सहिताः सर्व्वे सदभ्येः सह् दीक्षिता: ॥ १५
मुनय ऊचुः ।
पुराणागमशास्त्राणि सेतिहासानि सत्तम \ जानापि देवदैत्यानां चरितं जन्म फ््मंच॥१६॥
न तेऽस्त्यविदितं किश्चिद्ेंदे"' शास्त्र च भारते । पुराणे मोक्षशास्त्रे च सर्व्वलोऽसि महामते १७१
अलकृत था ।१७ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद तथा ब्रह्।चारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी--चागे वणे और आश्रम के छाग वहाँ निवास करते थ ॥^ पर्याप्त पलुघन एव जौ, गेहे, चना, उडद, मूंग, तिष्ट ईष और चीन आदि पवित्र अभन्नो से वह क्षेत्र सपन्न था ॥९३॥ उस क्षेत्र मे नैमिपारण्यवासौ वारह वर्षों मे समाप्त होने वक्ति यम का अनुष्ठान कर रहे थे) महायज की प्रस्व अग्नि मे आहतियां पड रही थी । उस यज्ञ में बहुत से मुनि और दुसरे द्राह्मण लोग मी जाए हुए थे ॥१०-११॥ उन श्रागन्तुको का मैमिपारप्यवासियों ने यथोचित आतिथ्य-सत्कार मियां । ऋत्विजो कै सहित्त जाएं हुए ब्राह्मणों, मुनियों पै बैठ जाने पर सुप्रसिद्ध मेघानी सूत लोमहपण वहाँ उपस्थिद हुए ५१२३॥ उन्हें देखते ही आनन्दित मुनिगण ने परथितं सत्कार किया। तदनतर छोमहर्पण सुठजी मीः उनके प्रति यथोचित सम्मान प्रकट करते हुए ब्यापीट पर सीन हो गये। फिर सुतजी सहित उपस्तत दिप्रवृत्द परस्पर कथा वार्ता करने लगे 0१३-१४॥ क्थः के समाप्त होते पर शदस्यो सहित दीक्षित हुए कऋत्विद, और सुनिवृन्दं अपनी शका बे समाधान हतु सूतजी से नम्रतापूर्वक भरन करने लगे ॥ ९५१
मुनिं ने कहा---मगवन् । पुराण, अप्गम, दसन और इतिहास एव देवता राक्षसो दे' लरम्, वं और चरति! के आप विज्ञाता हैं ५१६]! वेद, दास्त्र, महामारत, पुराण, मोक्षगास्न-~ इनमे से कोई भी ऐसा विषय नहीं है, जिसे आप न जानते हो। महाघीमन् ! अप सरव हैं 0१७ हे सूतजी । प्रारम में देवता, राक्षस, गन्धव,
शक ण्मिं। समदेगो०। ख. ०मिं। समु्धंगों०! द्ग ०मि। शालिमिरच तथा। इक न्नयेच टिं। क सख ण्योदिता०। पक. ०्माररोम०। द्ग ०पि. ता प्रतिगृह्यैव ७क ०स्तथाज़न्यो। पमं सह ते द्विः एख। न्न्ते च व्या०। दण्क. हु। कः शपरचदृस्तेऽव्यय मु०। शरक. षेदशासतरेषु मा०।
सयापूव्वेभिदं सर्वमुत्पन्नं सचराचरम् ! ससुरासुरभर्न्व्वं . सेयलोरगराक्षसमू 0 १८॥
भोतुमिच्छामहे सूत दूहि सव्यं यया! जगत् ! बभूव भूयश्च यथा महाभाग भविष्यति॥ १९
यत्त्वेव जगत" सूतं यतरचैव 'चरायरमू। छीनमासोत्तथा यन्न लूयमेप्यत्ति यत्र च*।२०॥
लोमहुपण उवाच
भविकाराय श्शुद्धाय नित्याय परमारमने ॥ सदैषरूपरूपाय विष्णवे सर्व्वनिष्णघे 0२१0१
नमो हिरण्यगर्भाय हस्ये स्ष्धरय च! वासुदेवाय ताराय सरगे्यित्यन्तकम्मेणे ५२२५
अाषारमूतं विरवस्याप्यणीयाक्तमणोयतताम्। प्रणम्य प्सव्वमूतस्यमच्युतं पुरोत्तमम् ॥२५॥
ज्ञानस्वरूपमत्यन्त भिर्म्मल परमार्थत। तमेवार्थस्दसूपेण श्यान्तिदर्शनत रिथितमु ॥२६॥
विष्णु ग्रसिष्णु विदवस्य स्थितौ, सर्गे तथा प्रभुम्। स्वंज्ञं भगतामोश्षपजमक्षयमस्ययम् ॥२७॥
आद्य सुसूदषम विड्वे ब्रह्मादीन् प्रणिपरय च। इतिहासपुराणज्ञं वेदवेदाद्धपारगम् ॥२८॥
सब्दंधास्त्रार्यतत्वत परादारसृत श्भुम्। गुहं प्रणस्य वक्ष्यामि पुराणं वेदसनम्मितम् ॥२९॥
द, सर्म, दैत्य आदि योनियों सहित यह चराचर जगत् जिस प्रवार उत्पभ्न हुआ उस प्रथिया को हमरोग सुनना चाहत हैं इपया सुनाइए।
१८। महामाग सुतरी। जिस प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति हुई है और प्रलय के याद जिस प्रकार फ़िर उत्पन्न होगी तया चराचर सहित जगत जिसमे लीन रहकर उलन हमा गौर किर जिसमे लीन होगा उसका समस्त उत्पत्ति एव लयब्रम हम बतलाइये।
१९-२०॥
लोमहु्पंण बोले--रनिविवार शद्ध युद्ध, नित्य यर्वा, भावत, सर्वव्यापकः सूर्वजयौ हिरप्यमे, हरि, कर, वासुदेव--तामपारी अखिल उद्धार गृष्टि स्थिति अरल्ये के कारणत एनः भौर येक स्वत्प धारण कसे वाले, स्थूल और सूदम आत्मा वाटे, च्यवत ओर व्यक्त तथा मोशन बै कारण मगवान् विप्या को नमस्कार है।
२१-२३॥
सृष्टि की उत्पति, स्थिति और प्रलय के कारणभूतं अजर, अमर, नित्य परह्य निच्णश्ने नमस्व्रारहै।
१२८। विदद के शाधार सूदमातिसुदम एव समी प्राणियों में स्थित पुरुषोत्तम भगवान अच्युत वी प्रयाम है।
२५। स्वनं ज्ञानस्वरूप और अत्यन्त निर्मर ठो रण मी प्रम से पदार्येरुप से णित सबको ग्रशनेवारे विद्व को उत्पत्ति स्थिति करने मे समर्थ कने रसार के स्वामी जम मरण द्वात रहित प्वादि भर अत्यंत सुगम परद्याण्डनायक विष्णु को तया ब्रह्मा आदि देवों को प्रणाम है।
२६-२७॥
वेद और देदाद्भू म लिप्यत इतिहास, दुरा तथा सभी शास्त्रा थे तत्दन परादर मुनि भे पृथ परमगुरु व्याराजी की प्रणाम है। मैं जो कुछ शक स्यागितमूत कर रक सत्यियें य रेक मिष्य भक शा पह रो गृणा धर वइसाप त न छक च्यदनटेतवे। दवे ग॒ ण्णाना ज०। रुख ग या जयम मूरा ष्ण्यः ऽतोम्वव्रत्तरमै; ११ न्भूतयम०। शरक तमेक स्वस्व रेग. न्दापत्मस्द० स्यितिसर्ग ग स्पितिसं। द्व न्व मूग दृष्तं न्दम थे विस एण्य ये।
ष प्रथमोऽध्याय
कययामि यथापुम्वं दक्षायर्भुनिसत्ते। पृष्ट प्रोवाच भगवानग्नयोनि पितामह ॥३०॥
श्रुणुध्व सम्प्रवक्ष्यामि कयः पापप्रणाधिनोम। कथ्यमानां मया चित्रा बहुथा तिधिस्तराम ॥३९॥
यस्त्विमा धारयेभ्नित्य शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णश। स्ववशघारण कृत्वा स्वर्गलोके महीयते ॥२९॥
अव्यक्तं कारण पत्त्नित्य सदसदा-मकम। प्रधान प्ररपस्तस्माछिम्ममे विदवमोश्वर ॥१३३॥
त॒ वुध्यष्व सुनिष्ेच्छा द्ह्याण्मितौजसम। सष्टार स्व्वंभूतानां नारायणपरायणम ॥३४॥
अहङ्कारस्तु महतस्तस्मादभूतानि जज्ञिरे भूतभवाश्च भूतेम्य एति सगं सनातन ॥३५॥
धिस्तरावयव चैव ययपरज्ञ
ने जिसप्रवार बताया था दैसेही मैं दगन करता हैं सुनिये। मैं पापनाशिनी वथा कटमा ॥३०३॥।
सदिव रहस्पदाद एव इलेय-ग्मित कथा वो जो व्यक्ति दार-बार सुनेगा या धारण करेगा वहं अपने वश का वशधर बनकर स्वगलौक ये पूनित्त होगा॥। ३१ ३२ जो अयवत कारण है वह सत-असत निय प्रइति ओर प्रस्थ है। उसी से इंत्वर मे विश्व की रचना वी है ॥३३॥ मुनिश्रष्ठ उस ईश्वर को आप सब प्राणियों वा स्रप्टा तथा नारायण का आश्रित अ यन्त तेजस्वी ब्रह्मा समश्चिये। ॥ ३४॥ महत्-तस्व मे अहकार उत्पन्न छुआ अहंकार से पचमहाभत और उनसे उनके मद उपद् हए। यही सनातन सप्टि है॥३५॥ अब सा मैंत सता है और ज्सौ मेरी गति मति है तदनूसार सका विस्तत वणन वरता हैं आप लोग सुना यशः शरीर से अमर व्यवितयों का स्मरण पुण्यप्रद होता है यह सष्टि क्या आप लोगों की प्रतिष्टा कोब्दाने बाली है ३६३।
सवयम भगवान् नै जनकं प्रकारकौ प्रजाभो को उपद करन की इच्छा रखकर पहले जल की ही सब्टि की। उसमें बीज डाला। नारः शब्द जलराशि और नर-पत्र इन दो अर्धो में प्रययत होता है॥३७ ३८॥
उस परम प्श्य का आशय पहले जल रादि ही थी। इसलिए उसको नारायण कहा गया। जल में सये हुए परम ररुप की नामि से एक सुवणमय अडा उत्पन्न हुआ॥ ३९॥ उससे स्वयम ब्रह्मा उत्पन्न हुए --एसा हमने सुना है।
१ नार ज्ञान तस्य अधन स्थान नारायण --इस व्यत्यत्ति के अनसार शान के धाम को नारायण कहा जाता है। नारका तत्पय ज्ञान से है अर्थात् भौतिक सष्टिसे पूव ब्रह्मा न ज्ञान-सब्टि की। २ ब्रह्म मे अन्तर्निहित स्यनकषै्च का दहिभत होना सवणपमप अंडा है। इस प्रवार इस कया वे इलेय का भी व्यानं रखना चाहिए।
ब्रह्मपुराणम् ५
तवष्डमकसोददैषं॑दियं भुवसयापि च। तयोः श्षकलयोम्मेष्य आकावामकरोत्मुः १४४॥।
अप्तु पारिप्लवां पृथिवों दिशादच दक्षा द्े"। तत्र फालं मनो वाचं कामं प्रोधमथो रतिम् १४२॥
ससरं सृष्टं तद्रूपां सष्टूमभिच्छन् प्रजापतीनु*। मरीचिमञ्पद्भिरसौ" पुलस्त्यं पुरं फतुम् १४३
यतिष्ठ च महातेजाः सोऽसुभतेसप्त मानसान्। सप्त बरह्मा त्यते पुराणे निदचयं गताः ४४५॥
नारायणात्मंकानां तु" सप्तानां ब्रह्मजन्मनाम्। ततोऽसृजत् धुरा^रह्ा षं रोपारमसम्भवम् ४५०॥
सनत्कुमार च विभुं पूर्वेषामपि ू्ववंजम् ९। सप्तस्वेता" अजयन्त प्रजा शदराश्च भो द्विजा.
स्कन्दः सनत्कुमारइच तेजः संक्षिप्य निस्टतःध तेषां सप्त महावंशा दिव्या प्दरेवमणान्विताः ४७
क्रियावन्तः प्रजावन्तो भ्रहुषिभिरलडहृताः। विचुतोऽदानिमेघादच रोहितेग्द्रपनूंपि. च १४८॥
पयसि च सपर्जादों पर्लन्यथ्व ससर हैं। ऋचो मजूंधि सामानि निर्ममे यज्सिद्धये॥४९॥
साध्यानजनपद्' "देवा नित्ये वबमनुसऊजगुर' ९ \ उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य ज्निरे १५०
शापवस्या, प्रजाकतगं सृजतो हि प्रनापते' ॥ सृज्यमानाः प्रजा नव विवदन्ते पदा तदा ५१॥
द्विषा इत्यरमनों देहमर्देन पुरुपोश्मवत्। जडेन नारी तस्यां तु सोऽसृजद्विविषाः प्रजाः 0५२
दिवञ्च पूथिवों चैव महिम्ना व्याप्य पतिप्ठि। विराजमसुजद्धिप्यु: सोऽसूजत् पुरयं विराट् 0५३॥
हिर्ययम भगवान् ने वर्षों तक वास करने उस अडे वो स्वर्ग सौर पूर्वी इन दो टुव दी में विभकत षर दिया थण्दे परमात्मा ने उन दोनो टुकष्टी के मध्य माग में आकाश वनाया और जल में द्वो हुई पृथिवी तथा दमौ दिशाओं वो घारण पिया ॥४३॥। तदनन्तर काल, मन, वाणी, काम, रोष और रति की रचना बी और फिर प्रजापतियों बी सुप्टि बी इच्छा रपकर मरीचि, थत्रि, समिसा,
ते पहले बद्या ने कोषे रद वा उत्पन्न सियां ४४४५५
फिर पूर्वजों वे मी पूर्वज तया मदत्र व्यापफ समतुमार को भी उत्पन्न किया। इन स्नपा ते, प्राहमो। प्रजामी और शदो मी उत्पत्ति हुई रग६॥
स्वन्द और एनः
हहुमार अपने अपने तेज वो समिट कर स्थित हैं। उनके दिष्य भौर देवगणों से युवन छात महाव क्रियावान् प्रजाः यान् और मददपियों से अदइत हैं पई3है॥
जादि मे विनी, बस, लाल इन्दघनुष जल भर भेष को रचदर यह छिदि के लिये ऋग्वेद, यजुरदेद और ामवेद ष निर्माण बह्मा ने शिया॥ ८ ४९१
वदवात उन्हान साध्यों मोर देववाओ को भी उत्प किया! फिर छोटेन्द सब प्राणी ब्रह्मारी दे अप से उपघ्न टूंए 0५०0
'आापव मामक प्रजापति जब भृष्टि करते हैं, सब सर्जन की जानें यादी प्रमा जब-तद नहीं बत्ती है।प१॥
ब्रह
मे अपनों देह के दी माग सिए मापि भाग से पुरप नायर आपि भाग से रन्नी यनी। उस सती में उट अनेर पार हो प्रमाभो की सूष्टि को॥॥५२।॥
अपनी महिमा से स्वगं और पृथिवी को ध्याप्त बरे वे स्थित हैं विरणु ने विराट, को सुप्टि को। विराद्ने पुरुष को उत्पन्न दिया प५३॥
उस पुष्य वो मनु समसिय। उसी वा हैक, दपी। एक न्यनि। स०। देखे म रस चुर छदः स। धस मलूर) दवः नम्
हदयेन एय. «पल खेगा अर दष रच श्व तिष्ठनि (० स्यविता। एष न्प्यानन्यारषा देदा०। १२ स ण्नुगुधुम॥
उन य॒ शनुपुषूम॥ सना शष भयत क्न षष्ट ग +