अध्याय 6 : मनु और शतरूपा की उत्पत्ति, प्रियव्रत और उत्तानपाद का जन्म
मनु और शतरूपा की उत्पत्ति, प्रियव्रत और उत्तानपाद का जन्म
रुद्रदेव की उत्पत्ति के पश्चात् ब्रह्मा जी ने मैथुन-सृष्टि का मार्ग अपनाया। अब सूत जी प्रथम मानव दम्पति और उनकी सन्तानों का वर्णन करते हैं।
स्वायम्भुव मनु और शतरूपा का प्राकट्य
ब्रह्मा जी ने अपनी योगशक्ति से अपने शरीर को दो भागों में विभक्त किया। बाएँ भाग से शतरूपा नामक दिव्य स्त्री और दाएँ भाग से स्वायम्भुव मनु नामक पुरुष प्रकट हुआ। शतरूपा साक्षात् लक्ष्मी का अंश थीं और मनु स्वयं भगवान विष्णु के अंशावतार थे।
ततः स्वयंभूर्भगवान् शरीरं द्विधा कृतम् ।
पुमानर्धेन तस्याथ त्वर्धेन प्रमदोत्तमा ॥
मनु-शतरूपा का विवाह और तप
ब्रह्मा जी ने शतरूपा का विवाह स्वायम्भुव मनु से कर दिया। दोनों ने दीर्घकाल तक साथ रहकर गृहस्थ धर्म का पालन किया और प्रजा-वृद्धि के लिए भगवान की आराधना की। उनका जीवन समस्त मानवों के लिए आदर्श बना।
प्रियव्रत और उत्तानपाद का जन्म
भगवान की कृपा से मनु और शतरूपा के दो महान् पुत्र उत्पन्न हुए – प्रियव्रत और उत्तानपाद। ये दोनों अत्यन्त पराक्रमी, धर्मपरायण और चक्रवर्ती राजा हुए। प्रियव्रत ने सप्तद्वीप पृथ्वी पर शासन किया और अपनी तपस्या से सूर्य के रथ के समान तेजस्वी रथ की प्राप्ति की। उत्तानपाद भी परम भागवत भक्त थे, जिनके पुत्र प्रह्लाद जी के पिता हिरण्यकशिपु नहीं बल्कि ध्रुव नामक परम भक्त हुए (उत्तानपाद का विवरण आगे आएगा)।
मनु की कन्याएँ – आकूति, प्रसूति और देवहूति
मनु और शतरूपा की तीन कन्याएँ हुईं – आकूति, प्रसूति और देवहूति। आकूति का विवाह प्रजापति रुचि से हुआ, जिनसे यज्ञदेव और दक्षिणा का जन्म हुआ। प्रसूति का विवाह प्रजापति दक्ष से हुआ, जिनसे अनेक पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ, जिनके पुत्र भगवान कपिलदेव हुए।
आकूतिं प्रथमं प्रादात् रुचये प्रजापतये ।
प्रसूतिं च दक्षाय देवहूतिं च कर्दमे ॥
मनु के वंश का शुभारम्भ
स्वायम्भुव मनु ने अनेक वर्षों तक राज्य किया और इसके बाद तपस्या में लीन हो गए। उनके वंश ने ही सम्पूर्ण मानव-सृष्टि का विस्तार किया। अगले अध्याय में मनु के वंश का विस्तार से वर्णन किया जाएगा।
फलश्रुति
सूत जी बोले – “हे ऋषियो! मनु और शतरूपा का यह पवित्र चरित्र जो सुनता या पढ़ता है, उसके समस्त पाप धुल जाते हैं और उसे उत्तम सन्तान, धन-धान्य और अन्त में मोक्ष की प्राप्ति होती है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥