अध्याय 12 : जम्बूद्वीप का विस्तृत वर्णन
जम्बूद्वीप का विस्तृत स्वरूप
ऋषिगण बोले – “हे सूत जी! आपने सप्तद्वीपों का संक्षिप्त वर्णन सुनाकर हमें कृतार्थ किया। अब हम जम्बूद्वीप के बारे में अधिक विस्तार से जानना चाहते हैं। इसका नाम जम्बूद्वीप क्यों पड़ा? इसके कितने वर्ष (खण्ड) हैं? इसके पर्वत और सीमाएँ क्या हैं? कृपया विस्तार से बताइए।” सूत जी ने कहा – “जम्बूद्वीप यही हमारा द्वीप है। इसका नाम यहाँ स्थित विशाल जम्बू वृक्ष के कारण पड़ा, जो सुमेरु पर्वत के दक्षिण में स्थित है और जिसके पके फलों का रस बहकर जम्बू नदी बनाता है। वही रस सूखकर स्वर्ण बनता है, जिसे जाम्बूनद कहते हैं।”
सुमेरु पर्वत और नौ वर्ष
जम्बूद्वीप के मध्य में सुमेरु पर्वत स्थित है, जो चौरासी हजार योजन ऊँचा है। इसके चारों ओर नौ वर्ष (क्षेत्र) हैं – इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, हरिवर्ष, केतुमालवर्ष, रम्यकवर्ष, हिरण्मयवर्ष, कुरुवर्ष, किंपुरुषवर्ष और भारतवर्ष। इलावृतवर्ष सुमेरु के ठीक मध्य में है। भारतवर्ष इस द्वीप के दक्षिण में स्थित है।
जम्बूद्वीपस्य मध्ये तु सुमेरुर्नाम पर्वतः ।
चतुरशीतिसाहस्रो योजनानां समुच्छ्रितः ॥
वर्ष-सीमा के पर्वत
जम्बूद्वीप में छः प्रमुख वर्ष-पर्वत हैं जो इन नौ खण्डों को एक-दूसरे से पृथक करते हैं। हिमालय, हेमकूट और निषध – ये तीन पर्वत दक्षिण में पूर्व से पश्चिम तक फैले हुए हैं। इसी प्रकार उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगवान नामक तीन पर्वत हैं। इनके मध्य में इलावृतवर्ष है। सुमेरु के चारों ओर चार पर्वत हैं – मन्दराचल, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व। इन पर्वतों पर अनेक देव-नगर और उद्यान स्थित हैं।
चार विष्कम्भ पर्वत और अद्भुत उद्यान
मन्दराचल, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व – ये चार विष्कम्भ पर्वत सुमेरु को चारों दिशाओं में आधार देने वाले हैं। मन्दराचल पर देवराज इन्द्र का नन्दनवन है। गन्धमादन पर कुबेर का चैत्ररथ वन है। विपुल पर्वत पर वरुण का वैभ्राज वन है और सुपार्श्व पर यमराज का सर्वतोभद्र वन है। इन वनों में देवताओं का निवास है और ये दिव्य फल-फूलों से सुसज्जित हैं।
मन्दरो गन्धमादश्च विपुलः सुपार्श्वकः ।
चत्वारो विष्कम्भगिरयः सुमेरोः परितः स्थिताः ॥
जम्बूद्वीप का कल्याणकारी श्रवण
सूत जी ने बताया कि जम्बूद्वीप में ही भारतवर्ष है, जो कर्मभूमि कहलाता है। यहाँ किये गए अच्छे-बुरे कर्मों का फल अवश्य मिलता है। अन्य वर्ष भोगभूमि हैं, जहाँ स्वर्गीय सुख भोगे जाते हैं। जो मनुष्य जम्बूद्वीप के इस वर्णन का श्रवण करता है, उसे तीर्थयात्रा का फल प्राप्त होता है और अनेक पापों से मुक्ति मिलती है।
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥