अध्याय 5 : रुद्रदेव का प्रादुर्भाव और उनकी आठ मूर्तियाँ
रुद्रदेव का प्रादुर्भाव और उनकी आठ मूर्तियाँ
पिछले अध्याय में ब्रह्मा के मानस पुत्रों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया। अब सूत जी उस क्रोध की कथा सुनाते हैं जिससे रुद्रदेव का प्रादुर्भाव हुआ।
ब्रह्मा का क्रोध और रुद्र का प्राकट्य
जब सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार ने प्रजा-सृष्टि से मना कर दिया, तब ब्रह्मा जी को अत्यन्त क्रोध हुआ। वह क्रोध उनके भ्रू-मध्य से एक तेजपुंज के रूप में प्रकट हुआ। वह तेजपुंज रोता हुआ पृथ्वी पर गिरा – इसीलिए उसका नाम ‘रुद्र’ पड़ा।
स रोदिति यतो ब्रह्मा ततो रुद्र इति स्मृतः ।
मा रोदीस्त्वमिति प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
अर्धनारीश्वर रूप और स्त्री-पुरुष सृष्टि
रोने पर भी जब रुद्र शान्त नहीं हुए, तब ब्रह्मा जी ने उन्हें दो भागों में विभक्त कर दिया – एक भाग पुरुष और दूसरा स्त्री। पुरुष भाग से ग्यारह रुद्र उत्पन्न हुए और स्त्री भाग से ग्यारह रुद्राणियाँ प्रकट हुईं। इस प्रकार रुद्र का अर्धनारीश्वर स्वरूप प्रकट हुआ।
रुद्र की आठ मूर्तियाँ
सूत जी बोले – “हे ऋषियो! स्वयंभू ब्रह्मा ने रुद्र को आठ मूर्तियों में प्रकट किया। ये आठ मूर्तियाँ सम्पूर्ण जगत की रक्षा, पालन और संहार करती हैं।”
ये आठ मूर्तियाँ हैं –
१. सूर्य (आदित्य) – जो तेज और प्रकाश के अधिष्ठाता हैं।
२. सोम (चन्द्रमा) – जो औषधियों और मन के स्वामी हैं।
३. अग्नि – जो यज्ञों का वहन करने वाले देवता हैं।
४. वायु – जो प्राणवायु के रूप में सब जीवों में व्याप्त हैं।
५. जल – जो सृष्टि का आधार और जीवनदाता है।
६. आकाश – जो सबसे व्यापक और शब्द का आश्रय है।
७. पृथ्वी – जो सब प्राणियों का भार धारण करती है।
८. यजमान (ब्राह्मण) – जो वेदधर्म का पालन करने वाला है।
सूर्यश्चन्द्रो वायुरग्निश्चैव भूर्जलं तथा ।
आकाशं च तथा ब्रह्मा रुद्रस्याष्टौ तनूः स्मृताः ॥
ग्यारह रुद्रों के नाम और कार्य
स्त्री-पुरुष विभाग से उत्पन्न ग्यारह रुद्रों के नाम इस प्रकार हैं – मन्यु, मनु, महिनस, महान्, शिव, ऋतुध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव और धृतव्रत। इनकी पत्नियाँ रुद्राणियाँ कहलाती हैं। ये सभी रुद्र शिव के अंश हैं और ब्रह्माण्ड के विभिन्न कार्यों का संचालन करते हैं।
रुद्र का शिवस्वरूप और आशीर्वाद
ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर रुद्र से कहा – “तुम मेरे सबसे प्रथम और परम आज्ञाकारी पुत्र हो। तुम शिव, शंकर, महादेव और ईशान नामों से पूजित होओगे। समस्त देवताओं में तुम्हारा स्थान सर्वोच्च होगा।”
त्वमादिदेवो विश्वात्मा रुद्र शंकर शाश्वतः ।
पूज्यसे सर्वलोकानां देवानां च भविष्यसि ॥
फलश्रुति
सूत जी बोले – “जो मनुष्य रुद्र के इस प्रादुर्भाव और उनकी आठ मूर्तियों का श्रवण करता है, वह समस्त भयों से मुक्त हो जाता है। उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। रुद्र-कथा परम मंगलकारिणी और पापनाशिनी है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥