श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 13

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 38 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः | सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ||१३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
ततः
उसके बाद
शङ्खाः
शंख
च
और
भेर्यः
नगाड़े
च
और
पणव
पणव (ढोल)
आनक
आनक (मृदंग)
गोमुखाः
गोमुख (तुरही)
सहसा
अचानक
एव
ही
अभ्यहन्यन्त
बजाए गए
स
वह
शब्दः
शब्द
तुमुलः
भयंकर
अभवत्
हो गया।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उसके बाद अचानक ही शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और तुरही आदि बजाए गए और वह शब्द अत्यंत भयंकर हो गया।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय गूँज

सनातन संस्कृति और श्रीमद्भागवतगीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के त्रयोदश श्लोक (१३वें श्लोक) में वर्णित यह पद्य केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध के प्रारंभ की घोषणा मात्र नहीं है, बल्कि यह भौतिक जगत (मटेरियल वर्ल्ड) और आध्यात्मिक चेतना के बीच होने वाले उस सनातन संघर्ष का प्रतीक है, जो हर मनुष्य के अंतःकरण में निरंतर चल रहा है। जब महामहिम पितामह भीष्म ने कौरव सेना की ओर से अपने पांचजन्य सदृश विशाल शंख को बजाया, तो उस शंखनाद ने कौरव छावनी में एक अभूतपूर्व ऊर्जा का संचार किया। इस श्लोक में जिन विभिन्न वाद्य यंत्रों—शंख, भेरी, पणव, आनक और गोमुख—का उल्लेख किया गया है, वे केवल युद्ध के बाजे नहीं हैं, बल्कि वे तामसिक और राजसिक प्रवृत्तियों के उस सामूहिक उद्गार के प्रतीक हैं जो धर्म के विरुद्ध अधर्म की स्थापना के लिए तत्पर थीं।

वैदिक वांग्मय में ध्वनि (नाद) को ब्रह्मांड की मूल उत्पत्ति का आधार माना गया है—'नादो ब्रह्म' अर्थात् नाद ही ब्रह्म है। महाभारत के युद्धरंगमंच पर कुरुक्षेत्र की उस पावन भूमि पर, जिसे धर्मक्षेत्र भी कहा गया है, बजने वाले ये वाद्य यंत्र इस बात का संकेत देते हैं कि जब-जब समाज में अहंकार, अनीति और दुर्योधन जैसी लोलुप प्रवृत्तियां सिर उठाती हैं, तब-तब एक आक्रामक और तुमुल (कोलाहलपूर्ण) ध्वनि उत्पन्न होती है। हालांकि, पांडव पक्ष का शंखनाद जहाँ दिव्य विजय और भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति की आश्वस्ति देता है, वहीं कौरवों के वाद्य यंत्रों का यह सहसा बज उठना उनके भीतर छिपे उस भय, आशंका और तात्कालिक उत्साह का मिश्रण था जो विनाश के कगार पर खड़े किसी साम्राज्य की अंतिम छटपटाहट को दर्शाता है। भक्तिलok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक और पौराणिक पक्षों का अत्यंत सूक्ष्मता से विश्लेषण करेंगे, ताकि साधकगण और पाठक इसके मर्म को अपने जीवन में उतार सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः |
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् || १३ ||


"ततः" (तत्पश्चात्) "शङ्खाः च" (शंख और) "भेर्यः च" (नगाड़े तथा) "पणव-आनक-गोमुखाः" (पणव, आनक और गोमुख नामक बाजे) "सहसा एव" (तत्काल ही, एक साथ) "अभ्यहन्यन्त" (बजाए गए) "सः शब्दः" (वह शब्द) "तुमुलः अभवत" (कोलाहलपूर्ण / भयानक हो गया)।

इस श्लोक के सस्वर पाठ की विधि यह है कि साधक प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर पवित्र आसन पर बैठकर शांत चित्त से गीता के प्रथम अध्याय का स्मरण करे। इस श्लोक का उच्चारण करते समय 'ततः शङ्खाश्च' पर हल्का विराम देते हुए 'भेर्यश्च' का उच्चारण स्पष्ट करना चाहिए। 'तुमुलोऽभवत्' बोलते समय स्वर में उस गंभीरता और युद्धकालीन भव्यता का आभास होना चाहिए जो कुरुक्षेत्र की महान वेला में व्याप्त थी। नियमित रूप से इस श्लोक का मानसिक जप और पाठन करने से साधक के भीतर साहस, वैराग्य और सत्य के प्रति निष्ठा की भावना जागृत होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक के एक-एक शब्द में गहन दार्शनिक अर्थ छिपे हैं। आइए, सारणी के माध्यम से इनका विस्तृत अध्ययन करें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ततः (Tataḥ) तत्पश्चात्, उसके बाद भीष्म पितामह द्वारा सिंहनाद और शंखध्वनि करने के ठीक तुरंत बाद की निरंतरता को दर्शाता है, जो कर्म और प्रतिक्रिया के चक्र का प्रतीक है।
शङ्खाः (Śaṅkhāḥ) विशाल शंख विजय, पवित्रता, और चेतना के उच्चतर स्तर का प्रतीक। शंख की ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है।
च (Cha) और विभिन्न प्रकार की शक्तियों और वाद्य यंत्रों के समुच्चय को जोड़ने वाला योजक, जो संपूर्णता का बोध कराता है।
भेर्यः (Bheryaḥ) बड़े नगाड़े / भेरियां युद्ध के आह्वान और अत्यधिक जोश का प्रतीक। नगाड़ों की गूँज सैनिकों के हृदय में वीरता और उत्तेजना भर देती है।
पणव (Paṇava) एक विशेष प्रकार का ढोल / छोटा बाजा मन की चंचलता और सांसारिक विकारों की तीव्र लय को दर्शाता है जो युद्धभूमि में गूंज रही थी।
आनक (Ānaka) ढोलक या बड़े ढोल पृथ्वी की धड़कन और भारीपन का प्रतीक, जो अधर्म के भारी बोझ को कुरुक्षेत्र की छाती पर प्रदर्शित करता है।
गोमुखाः (Gomukhāḥ) गाय के मुख के आकार के बाजे प्रकृति और जीव जगत की पुकार। गोमुख बाजा प्राचीन काल में विशेष अवसरों और युद्धारंभ पर बजाया जाता था।
सहसैवाभ्यहन्यन्त (Sahasā-evābhyahanyanta) अचानक ही एक साथ बजाए गए कौरव सेना की हड़बड़ी, सामूहिक प्रतिक्रिया और बिना सोचे-समझे अधर्म के पक्ष में एकजुट होने की तत्परता को दर्शाता है।
सः शब्दः (Saḥ Śabdaḥ) वह महान शब्द / ध्वनि संपूर्ण कुरुक्षेत्र के आकाश और पाताल को कंपा देने वाली वह सम्मिलित गूँज जो वातावरण में छा गई थी।
तुमुलः अभवत् (Tumulaḥ Abhavat) कोलाहलपूर्ण, भयानक हो गया भ्रम, मोह, और आसुरी शक्तियों के उन्माद का चरम रूप, जो अंततः विनाश की ओर संकेत करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के महाकाव्य युद्ध का प्रसंग कुरुक्षेत्र के मैदान से जुड़ा है, जहाँ कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित और भगवान गणेश द्वारा लिखित इस महाकाव्य में संजय ने धृतराष्ट्र को युद्ध की जो सजीव झांकी सुनाई है, उसका यह अत्यंत नाटकीय और महत्वपूर्ण मोड़ है। युद्ध के आरंभ से पूर्व, जब कौरव पक्ष के सेनापति पितामह भीष्म ने दुर्योधन का मनोबल बढ़ाने के लिए अपने शंख को पूरी शक्ति से बजाया, तो उस गर्जना से भयभीत या उत्साहित होकर कौरव सेना के अन्य महारथियों ने भी अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रों और वाद्यों को थाम लिया।

भारतीय संगीत शास्त्र और पुराणों में 'भेरी', 'पणव', 'आनक' और 'गोमुख' जैसे वाद्यों का विशेष स्थान रहा है। 'आनक' वह विशाल वाद्य था जिसे युद्ध की घोषणा के समय बजाया जाता था, जबकि 'गोमुख' अपनी अनूठी बनावट के लिए जाना जाता था जो गाय के मुख जैसा होता था—यह इस बात का द्योतक था कि भले ही युद्ध में अधर्मी लोग खड़े हैं, परंतु प्रकृति और गौ माता के नियम सर्वत्र विद्यमान हैं। जब इन सभी वाद्यों को एक साथ 'सहसा' (अचानक) बजाया गया, तो उत्पन्न होने वाला वह तुमुल शब्द दसों दिशाओं में गूंज उठा। यह इस बात का प्रतीक था कि दुर्योधन और उसके सहयोगियों का अहंकार अपनी चरम सीमा पर था। वे भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों की न्यायप्रियता के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहते थे। किंतु शास्त्रीय दृष्टिकोण से यह भी स्पष्ट होता है कि जितना अधिक कोलाहल अधर्म की ओर से होता है, सत्य की शांति और दिव्यता उतनी ही अधिक प्रभावशाली और स्थिर होती है, जैसा कि आगे चलकर पांचजन्य और देवदत्त शंखों की महाध्वनि से सिद्ध हुआ।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के श्लोकों का नियमित पठन, श्रवण और मनन करने से साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तलों पर असीम लाभ प्राप्त होते हैं। इस विशेष श्लोक (अध्याय १, श्लोक १३) के अध्ययन और स्मरण से मिलने वाले प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

१. मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि

युद्ध के कोलाहल और उथल-पुथल का वर्णन करने वाले इस श्लोक का पाठ करने से मन की आंतरिक अशांति शांत होती है, क्योंकि यह साधक को जीवन के संघर्षों को तटस्थ भाव से देखने की दृष्टि प्रदान करता है।

२. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

संस्कृत के इन प्रामाणिक श्लोकों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें (साउंड वेव्स) आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती हैं।

३. कार्मिक शुद्धि और आत्म-अवलोकन

यह श्लोक हमें आत्मविश्लेषण का अवसर देता है कि हमारे भीतर कौन से 'तुमुल' (कोलाहलपूर्ण) विचार चल रहे हैं, जिससे उन्हें नियंत्रित कर मानसिक शुद्धि प्राप्त की जा सके।

४. भय और संशय का निवारण

जीवन की विकट परिस्थितियों में जब व्यक्ति खुद को कौरव सेना की भांति घिरा हुआ महसूस करता है, तब गीता का यह ज्ञान उसे आंतरिक संबल और निर्भयता प्रदान करता है।

५. वेदों और महाकाव्यों के मर्म की प्राप्ति

महाभारत के ऐतिहासिक और दार्शनिक पक्षों से जुड़ने के कारण साधक की बुद्धि में परिपक्वता आती है और जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण व्यापक बनता है।

६. दिव्य कृपा और अनुशासन की प्राप्ति

नियमित रूप से गीता अध्ययन करने से व्यक्ति के दैनिक जीवन में अनुशासन, संयम और कर्तव्यपरायणता (धर्म) के गुणों का स्वतः विकास होता है।

७. वाक् शुद्धि और उच्चारण क्षमता

शुद्ध संस्कृत श्लोकों का सस्वर वाचन करने से स्वर तंत्र (Vocal Cords) मजबूत होते हैं और स्मरण शक्ति में उल्लेखनीय सुधार होता है।

८. वैराग्य और भक्ति भाव का उदय

भौतिक संघर्षों की नश्वरता को समझकर साधक धीरे-धीरे सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर की शरण में जाने की प्रेरणा प्राप्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, पुराणों, श्रीमद्भागवतगीता के विभिन्न टीकाग्रंथों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और श्री जयदयाल गोयंदका जी के दृष्टिकोण) तथा सनातन धर्म के स्थापित ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ व्याकरण की दृष्टि से पूर्णतः शुद्ध हो और उसका आध्यात्मिक मर्म पाठकों तक सहज हिंदी भाषा में पहुंचे। हम किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से बचते हुए केवल शास्त्रों में वर्णित यथार्थ और लोक-कल्याणकारी ज्ञान को आप तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई सुझाव या प्रश्न है, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक का मुख्य सार यह है कि जब पितामह भीष्म ने शंख बजाया, तो उनके समर्थन में कौरव सेना के सभी वाद्य यंत्र (शंख, भेरी, पणव, आनक और गोमुख) एक साथ बज उठे, जिससे युद्धभूमि में एक भयानक और कोलाहलपूर्ण (तुमुल) ध्वनि उत्पन्न हुई। यह कौरव पक्ष के उत्साह और युद्ध के आसन्न संकट को दर्शाता है।

उत्तर: ये प्राचीन भारतीय युद्धकालीन वाद्य यंत्र हैं। 'भेरी' एक प्रकार का बड़ा नगाड़ा है, 'पणव' छोटा ढोल या बाजा है, और 'आनक' एक विशाल ढोल या तबले की भांति युद्ध भूमि में जोश भरने वाला वाद्य है। इनके साथ 'गोमुख' बाजा भी बजाया जाता था।

उत्तर: आध्यात्मिक रूप से, कौरव सेना के वाद्यों का यह कोलाहल हमारे मन के भीतर चलने वाले विकारों, अहंकार, और असत्य के उस शोर का प्रतीक है जो मनुष्य को धर्म के मार्ग से भटकाने का प्रयास करता है। यह भौतिक संसार के प्रलोभनों और आसुरी प्रवृत्तियों की तीव्रता को दर्शाता है।

उत्तर: हाँ, गीता के किसी भी श्लोक का सस्वर पाठ और उसका मनन करने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है, आंतरिक अशांति दूर होती है, और जीवन के संघर्षों का सामना करने के लिए आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है।

उत्तर: भक्तिलok.in पर प्रस्तुत समस्त सामग्री वेदों, पुराणों और गीता के प्रतिष्ठित टीकाग्रंथों पर आधारित होती है। हमारी संपादकीय टीम प्रत्येक आलेख को शास्त्रीय नियमों और व्याकरण के अनुसार सत्यापित करके ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती है।

रणबाँगुरा / Battle Fanfare

युद्ध की शुरुआत में इस प्रकार के वाद्यनाद से सेना में उत्साह और भय दोनों उत्पन्न होते हैं। Such a fanfare at the start of battle creates both excitement and fear.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/47 28% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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