श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 21

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 49 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते | सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ||२१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
हृषीकेशम्
हृषीकेश (श्रीकृष्ण) से
तदा
तब
वाक्यम्
वचन
इदम्
यह
आह
बोला
महीपते
हे राजन् (धृतराष्ट्र)
सेनयोः
दोनों सेनाओं के
उभयोः
दोनों
मध्ये
बीच में
रथम्
रथ
स्थापय
खड़ा कर
मे
मेरा
अच्युत
हे अच्युत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

तब अर्जुन ने हृषीकेश (श्रीकृष्ण) से यह वचन कहा: हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दीजिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्माण्डकीय चेतना

सनातन संस्कृति और अध्यात्म के सर्वोच्च ग्रंथ 'श्रीमद्भगवद्गीता' के प्रथम अध्याय (विषाद योग) का यह इक्कीसवाँ (21वां) श्लोक केवल दो सेनाओं के बीच रथ ले जाने की एक सामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह जीव (अर्जुन) और परमेश्वर (श्रीकृष्ण) के बीच के eternal (शाश्वत) संबंध का एक अत्यंत जीवंत और दार्शनिक प्रतीक है। जब महाभारत के रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों की विशाल सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मसंकट में फंसे पाण्डु पुत्र अर्जुन ने अपने सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण से एक ऐसा निवेदन किया, जिसने इतिहास की धारा और मानवता के आध्यात्मिक विकास को हमेशा के लिए बदल दिया।

यहाँ 'हृषीकेश' और 'अच्युत' जैसे दिव्य संबोधनों का उपयोग केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह महर्षि वेद व्यास की वह अद्भुत काव्य कला और दार्शनिक दृष्टि है जो हर एक शब्द के माध्यम से गहरी आध्यात्मिक परतों को खोलती है। 'हृषीकेश' का अर्थ है समस्त इंद्रियों के स्वामी और नियंत्रणकर्ता, और 'अच्युत' का अर्थ है वह जो कभी अपनी स्थिति से च्युत (भ्रष्ट या विचलित) नहीं होते। अर्जुन का इन नामों से श्रीकृष्ण को संबोधित करना इस बात का प्रतीक है कि अर्जुन अपनी सीमित मानवीय बुद्धि से नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण के साथ उस सर्वोच्च शक्ति से मार्गदर्शन मांग रहे हैं जो संपूर्ण ब्रह्मांड की इंद्रियों और गतियों को नियंत्रित करती है।

सांस्कृतिक और ब्रह्माण्डकीय दृष्टिकोण से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन के प्रत्येक महायुद्ध या संघर्ष के समय, जब हमारा मन मोह और भ्रम के बादलों से घिर जाता है, तब हमें अपने जीवन के रथ की बागडोर उस 'हृषीकेश' के हाथों में सौंप देनी चाहिए जो हमारे भीतर की हर एक भावना और अंतःकरण की पुकार को भली-भांति जानते हैं। कुरुक्षेत्र का मैदान वस्तुतः हमारे अपने ही भीतर चल रहे धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञान, सात्विकता और तामसिकता के संघर्ष का बाह्य प्रकटीकरण है। इस श्लोक का अध्ययन और मनन हमें यह सिखाता है कि जब तक हम अपने जीवन के सारथी के रूप में भगवान को स्वीकार नहीं करते, तब तक हम अपने मोह रूपी शत्रुओं का सही आकलन नहीं कर सकते।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता महात्म्य एवं पाठ विधि

श्रीमद्भगवद्गीता - प्रथमोध्याय (अर्जुनविषादयोग)

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ २१॥

उद्देश्य: पाठ करते समय मन को शांत रखें, पूर्वाभिमुख होकर आसन पर बैठें और भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए इस श्लोक का उच्चारण करें।

श्लोक का सरल संदर्भ एवं भाव:

हे महीपते (राजन् धृतराष्ट्र)! उस समय (महायुद्ध के अवसर पर) अर्जुन ने हृषीकेश (भगवान श्रीकृष्ण) से इस प्रकार कहा— हे अच्युत! दोनों सेनाओं के बीच में मेरे रथ को तब तक के लिए स्थापित कर दीजिए, जब तक कि मैं युद्ध की अभिलाषा से खड़े हुए इन समस्त विपक्षी योद्धाओं को अच्छी प्रकार से देख न लूं कि इस युद्ध में मुझे किसके साथ संघर्ष करना है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
हृषीकेशम् इंद्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण को वह परम सत्ता जो मनुष्य की सभी बाह्य और आंतरिक इंद्रियों (हृषीक) को नियंत्रित करती है और सब कुछ जानती है।
तदा उस समय (युद्ध के आरंभ में) वह निर्णायक क्षण जब जीवन का सबसे बड़ा मोड़ आया और जीव ने अपने कर्तव्य और मोह के बीच निर्णय लेना चाहा।
वाक्यम् वचन, बात या निवेदन अर्जुन द्वारा विनम्रता और जिज्ञासा के साथ भगवान के समक्ष रखा गया आत्मसमर्पण युक्त संवाद।
इदम यह (कहा जाने वाला वचन) वह विशिष्ट संदेश जो संपूर्ण मानवता के लिए गीता ज्ञान के प्रकटीकरण का आधार बना।
आह कहा / निवेदन किया सखा और भगवान के मधुर संबंध के बीच एक भक्त की अपने गुरु और रक्षक से विनम्र पुकार।
महीपते हे राजन् (धृतराष्ट्र को संबोधित करते हुए संजय के शब्द) संजय द्वारा धृतराष्ट्र को उनके मोह और अंधेपन का अहसास कराते हुए युद्धभूमि का वास्तविक चित्रण देना।
सेनयोः दोनों सेनाओं की (कौरव और पांडव) संसार में सदा से विद्यमान दो प्रवृत्तियों—धार्मिक (दैवी) और अधार्मिक (आसुरी) शक्तियों का प्रतीक।
उभयोः मध्ये दोनों के बीच में तटस्थ भाव से स्थिति का अवलोकन करने का स्थान, जहां पक्षपात की कोई गुंजाइश न हो।
रथम् रथ को (जिस पर वे सवार थे) मानव शरीर रूपी रथ, जिसमें आत्मा (अर्जुन) बैठी है और बुद्धि रूपी सारथी भगवान हैं।
स्थापय खड़ा कर दीजिए या स्थापित कीजिए स्थिरता का आग्रह, ताकि अशांत मन को सही दिशा और सत्य का दर्शन प्राप्त हो सके।
मे मेरे (अर्थात अर्जुन के लिए) व्यक्तिगत जीव की भगवान से प्रत्यक्ष और व्यक्तिगत कृपा प्राप्ति की प्रार्थना।
अच्युत हे अच्युत (जो कभी अपने मार्ग या सत्य से विचलित नहीं होते) वह परमेश्वर जो कभी अपने भक्तों का साथ नहीं छोड़ते और जिनके आशीर्वाद में कोई पतन या विफलता नहीं है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध का प्रसंग संपूर्ण हिंदू पुराणों और वेदों के सार का जीवंत दस्तावेज है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों पक्षों की ओर से शंखनाद, भेरियों और युद्धघोषों की गूंज से आकाश और पृथ्वी कांप रहे थे, तब कौरव सेना के उत्साह और पाण्डव सेना की अटूट न्यायनिष्ठा के बीच एक अत्यंत गंभीर शांत वातावरण भी था। कौरवों की ओर से पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धा अपने अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर खड़े थे, तो दूसरी ओर धर्मराज युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव अपनी न्यायोचित भूमि की रक्षा के लिए तत्पर थे।

इस महान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित और संजय द्वारा हस्तिनापुर के अंधे महाराज धृतराष्ट्र को सुनाई जा रही इस कथा का यह प्रसंग अत्यंत नाटकीय और दार्शनिक महत्व रखता है। धृतराष्ट्र के मन में अपने पुत्रों के प्रति अंधा मोह था, और वह संजय से बार-बार यही पूछ रहे थे कि "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युत्सवः..." यानी मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने युद्ध की इच्छा से क्या किया? संजय अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ देखकर एक-एक घटना का जीवंत वर्णन कर रहे हैं।

जब अर्जुन ने अपने गाण्डीव धनुष को उठाया और युद्ध के लिए तत्पर हुए, तो उनके मन में एक क्षण के लिए यह विचार आया कि जिन गुरुजनों, संबंधियों, और भाइयों के रक्त से यह विजय प्राप्त होगी, उसका क्या लाभ? इस मानसिक द्वंद्व के आरंभिक बिंदु के रूप में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाने को कहा। यह पौराणिक प्रसंग हमें यह सिखाता है कि महान से महान योद्धा और ज्ञानी व्यक्ति भी जीवन के किसी न किसी मोड़ पर मोह के सागर में डूब सकता है, और ऐसे समय में केवल भगवान की शरण में जाना ही एकमात्र समाधान होता है।

इस प्रसंग के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्होंने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के इन अध्यायों को संकलित किया है। यह संपूर्ण संवाद इस बात का प्रमाण है कि सनातन धर्म में कभी भी प्रश्नों को दबाया नहीं गया, बल्कि अर्जुन के माध्यम से हर उस जिज्ञासा का समाधान किया गया जो आज भी मानवमात्र के मन में उठती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

इस श्लोक और इसके भाव का नियमित स्मरण करने से मन के भीतर चल रहे उद्वेग, चिंता और अनावश्यक तनाव शांत होते हैं, और व्यक्ति को मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

भगवान श्रीकृष्ण के 'हृषीकेश' और 'अच्युत' स्वरूपों के स्मरण मात्र से घर और आसपास के वातावरण में एक उच्च आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव उत्पन्न होता है।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

गीता के वचनों के प्रति निष्ठा रखने से पिछले जन्मों के नकारात्मक कर्मों के बंधनों से मुक्ति मिलती है और सत्कर्म की प्रेरणा जागृत होती है।

4. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

जैसे अर्जुन ने अपने रथ का नियंत्रण श्रीकृष्ण को सौंपा, वैसे ही इस श्लोक का अभ्यास करने से जीवन के जटिल निर्णयों में सही दिशा और बुद्धि का विकास होता है।

5. अहंकार का शमन और समर्पण

यह श्लोक मनुष्य को यह सिखाता है कि अपनी क्षमताओं पर अभिमान करने के बजाय परमेश्वर की शरण में जाना चाहिए, जिससे अहंकार का नाश होता है।

6. दैवी कृपा और सुरक्षा की प्राप्ति

नियमित रूप से गीता पाठ करने वाले साधक पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा बनी रहती है और वह जीवन के हर संकट से सुरक्षित बाहर निकलता है।

7. अंतःकरण की शुद्धि एवं संयम

'हृषीकेश' नाम के स्मरण से इंद्रियों पर स्वतः नियंत्रण प्राप्त होने लगता है, जिससे मनुष्य भोग-विलासिता से दूर होकर सात्विक जीवन जीता है।

8. मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति

भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इस श्लोक के नियमित पठन से जीव अपनी अंतिम यात्रा (मोक्ष) की ओर सहजता से अग्रसर होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख को प्राचीन वैदिक ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न टीकाग्रंथों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और गीताप्रेस गोरखपुर के संस्करणों) के अध्ययन के पश्चात अत्यंत सावधानी और समर्पण के साथ संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक केवल धार्मिक ज्ञान पहुंचाना ही नहीं, बल्कि उसके वैज्ञानिक, दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों को भी स्पष्ट रूप से रखना है।

सन्दर्भ ग्रंथ: महर्षि वेदव्यास रचित 'महाभारत' (भीष्म पर्व - श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 21)। सभी श्लोकों के अर्थ सनातन परंपरा के पारंपरिक व्याकरण और वैयाकरणों के नियमों के अनुसार प्रमाणित किए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'हृषीकेश' शब्द का अर्थ है—समस्त इंद्रियों (हृषीक) के स्वामी (ईश)। अर्जुन भली-भांति जानते थे कि इस समय उनके मन और इंद्रियां मोह के कारण भ्रमित हो रही हैं। भगवान ही एकमात्र ऐसी शक्ति हैं जो मनुष्य की आंतरिक और बाह्य इंद्रियों को नियंत्रित और संतुलित कर सकती हैं। इसलिए अर्जुन ने उन्हें इस विशेष नाम से संबोधित किया ताकि वे उनकी चेतना को सही दिशा दे सकें।

'अच्युत' वह है जो कभी अपनी स्थिति, सत्य या स्वरूप से च्युत (विचलित) नहीं होता और न ही अपने भक्तों का कभी पतन होने देता है। कुरुक्षेत्र के इस कठिन समय में अर्जुन यह जताना चाहते थे कि यद्यपि वे स्वयं भ्रमित हो चुके हैं, किंतु उनके सखा श्रीकृष्ण कभी अपने संकल्प और धर्म से विचलित नहीं हो सकते, अतः वे ही उनके सच्चे मार्गदर्शक हैं।

दोनों सेनाओं के मध्य रथ ले जाने का अर्थ है—जीवन के तटस्थ और सत्य के धरातल पर खड़े होना। जब तक मनुष्य मोह के घेरे में रहता है, वह सही और गलत का भेद नहीं कर पाता। जब रथ दोनों सेनाओं के बीच (यानी निष्पक्ष स्थान पर) खड़ा होता है, तभी जीवन के वास्तविक संघर्ष और कर्तव्यों का सही अवलोकन संभव हो पाता है।

बिल्कुल। श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक मानव जीवन के व्यावहारिक और मानसिक संकटों का समाधान है। जब भी व्यक्ति अपने जीवन में किसी बड़े निर्णय को लेकर असमंजस में हो, तो वह इस श्लोक का स्मरण कर भगवान से अपने जीवन के रथ की बागडोर संभालने की प्रार्थना कर सकता है, जिससे उसे आंतरिक स्पष्टता मिलती है।

यह श्लोक महाभारत के 'भीष्म पर्व' के अंतर्गत आने वाली 'श्रीमद्भगवद्गीता' के प्रथम अध्याय (जो कि 'अर्जुनविषादयोग' के नाम से प्रसिद्ध है) का इक्कीसवाँ श्लोक है। इसमें कुल 47 श्लोक हैं, जिनमें अर्जुन का मोह और विषाद वर्णित है।

© Bhaktilok.in — सर्वाधिकार सुरक्षित। प्रस्तुत सामग्री सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और अध्ययन हेतु समर्पित है।

निरीक्षण / Observation

अर्जुन युद्ध के पूर्व अपने समक्ष खड़े सभी योद्धाओं को देखना चाहते थे। Arjuna wanted to see all the warriors arrayed on both sides before the war began.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 21 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 21/47 45% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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