श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 23

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 39 मिनट का पठन 124 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः | धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ||२३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
योत्स्यमानान्
युद्ध करने वालों को
अवेक्षे
देखूँ
अहम्
मैं
ये
जो
एते
ये
अत्र
यहाँ
समागताः
एकत्र हुए हैं
धार्तराष्ट्रस्य
धृतराष्ट्र के पुत्र (दुर्योधन) के
दुर्बुद्धेः
दुष्ट बुद्धि वाले
युद्धे
युद्ध में
प्रियचिकीर्षवः
प्रिय करने की इच्छा वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं उन योद्धाओं को देखना चाहता हूँ जो दुष्टबुद्धि दुर्योधन का पक्ष लेकर युद्ध में उसे प्रसन्न करने के लिए यहाँ एकत्र हुए हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान श्री कृष्ण के मुख से निस्सृत वह अमृतोपम वाणी माना जाता है जो मानव जीवन के सबसे जटिल और गहरे अंतर्द्वन्द्वों का समाधान करती है। महाभारत के कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में, जब दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं और चारों ओर शंख-नाद तथा युद्ध की गूँज गूँज रही थी, तब अर्जुन का रथ भगवान श्री कृष्ण द्वारा दोनों सेनाओं के मध्य लाकर खड़ा किया गया था। इस अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक क्षण में, अर्जुन के मन में जो भाव उत्पन्न हुए, वेदों और पुराणों के अनुसार, वे केवल एक सामान्य योद्धा का भय नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए एक दिव्य जिज्ञासा और आत्म-मंथन का प्रतीक थे।

प्रस्तुत श्लोक—"योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः | धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ||२३||"—श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (जिसे 'अर्जुनविषादयोग' कहा जाता है) का तेईसवाँ श्लोक है। इस श्लोक में अर्जुन अपने सारथी और परम मित्र भगवान श्रीकृष्ण से उस क्षण अपने मन की व्याकुलता को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि वे उन सभी योद्धाओं को देखना चाहते हैं जो धृतराष्ट्र के दुष्ट बुद्धि वाले पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए इस युद्ध में सम्मिलित होने के लिए दूर-दूर से यहाँ आए हैं। यहाँ अर्जुन द्वारा दुर्योधन के लिए 'दुर्बुद्धि' (यानि दुष्ट बुद्धि वाला) शब्द का प्रयोग करना अत्यंत महत्वपूर्ण और गहरा अर्थ लिए हुए है। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि अर्जुन को धर्म और अधर्म का पूर्ण ज्ञान था। वे अच्छी तरह जानते थे कि यह युद्ध किसी व्यक्तिगत द्वेष या भूमि के छोटे टुकड़े के लिए नहीं, बल्कि दुर्योधन के उस अधर्म, अन्याय और अहंकार के विरुद्ध है जिसे उसने वर्षों से पाला था।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब-जब समाज में अधर्म और स्वार्थ की पराकाष्ठा होती है, तब-तब दुर्बुद्धि लोग दूसरों को अपने स्वार्थ की बलि चढ़ाने के लिए युद्ध के मैदान में खड़ा कर देते हैं। अर्जुन की यह दृष्टि केवल एक योद्धा की जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक करुणावान आत्मा का वह विलाप है जो यह देख रही है कि कैसे नासमझ लोग एक दुष्ट व्यक्ति के प्रिय कार्य को पूरा करने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर हैं। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी एक श्लोक के माध्यम से महाभारत की पृष्ठभूमि, इसके शब्दार्थ, दार्शनिक रहस्यों और आधुनिक जीवन में इसके प्रासंगिक संदेशों का अत्यंत सूक्ष्मता से अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ अथ श्रीमद्भगवद्गीता प्रथमोध्यायः (अर्जुनविषादयोग) ॥

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥ २३॥


श्लोकोच्चारण एवं पठन की विधि (Sanskrit Recitation Guide)

इस श्लोक का पाठ करते समय संस्कृत के वर्णों के उच्चारण की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 'योत्स्यमानान्' का उच्चारण करते समय अनुस्वार की ध्वनि नासिका से आनी चाहिए। 'अवेक्षेऽहम्' में संधि नियमों का पालन करते हुए स्पष्ट उच्चारण करें। पाठ के पूर्व भगवान गणेश और श्री कृष्ण का ध्यान करते हुए तीन बार आचमन करें। इसके उपरांत शांत मन से इस श्लोक का सस्वर पाठ करने से चित्त में एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई में उतरने से इसका वास्तविक दार्शनिक मर्म समझ में आता है। नीचे दी गई सारणी में श्लोक के हर एक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहन आध्यात्मिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
योत्स्यमानान (Yotsyamānān) युद्ध करने की इच्छा रखने वालों को / योद्धाओं को वे सभी व्यक्ति जो जीवन में संघर्ष या युद्ध को अपना मार्ग चुन चुके हैं, विशेषकर नकारात्मक प्रवृत्तियों के साथ।
अवेक्षेऽहम् (Avekshe'ham) देखना चाहता हूँ मैं जिज्ञासा का भाव; साधक या विवेकशील मनुष्य की वह दृष्टि जो अधर्म के समर्थकों के वास्तविक स्वरूप को पहचानना चाहती है।
य एते (Ya ete) जो ये सभी समाज या भीड़ में एकत्र हुए वे तमाम लोग जो बिना सोचे-समझे किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बन जाते हैं।
अत्र (Atra) यहाँ (इस कुरुक्षेत्र में) वर्तमान भौतिक शरीर रूपी रणक्षेत्र, जहाँ हर पल धर्म और अधर्म का आंतरिक संघर्ष चलता रहता है।
समागताः (Samāgatāḥ) एकत्रित हुए हैं / आए हुए हैं कर्मों के बंधन और संचित संस्कारों के कारण विभिन्न दिशाओं से एक ही स्थान पर एकत्रित होना।
धार्तराष्ट्रस्य (Dhārtarāṣhṭrasya) धृतराष्ट्र के पुत्र (दुर्योधन) का अंधे मोह (धृतराष्ट्र रूपी अज्ञान) से उत्पन्न होने वाली आसक्ति और स्वार्थ का परिणाम।
दुर्बुद्धेः (Durbuddheḥ) दुष्ट बुद्धि वाले / कुटिल मानसिकता के वह विकृत चेतना जो सत्य, न्याय और नैतिकता को ताक पर रखकर केवल अपने अहंकार की तुष्टि चाहती है।
युद्धे (Yuddhe) युद्ध में जीवन का वह कठिन पड़ाव जहाँ निर्णय लेना अनिवार्य होता है कि व्यक्ति किस पक्ष (धर्म या अधर्म) के साथ खड़ा है।
प्रियचिकीर्षवः (Priyachikīrṣhavaḥ) प्रिय कार्य करने की इच्छा रखने वाले / प्रसन्न करने वाले चाटुकारिता और गलत प्रवृत्तियों के समर्थन में अपने विवेक को गिरवी रख देने की मानवीय कमजोरी।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत का प्रसंग और कुरुक्षेत्र की वेला

वैदिक इतिहास और महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाकाव्य 'महाभारत' के अनुसार, कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो कुलों (कौरव और पाण्डव) के बीच भूमि की प्राप्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म के बीच का एक ब्रह्मांडीय निर्णायक युद्ध था। हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठने के लिए दुर्योधन की लालसा और उसकी कुटिल नीतियों ने सम्पूर्ण आर्यावर्त को इस विभीषिका में झोंक दिया था। धृतराष्ट्र का अपने पुत्र दुर्योधन के प्रति अंधी मोह-माया (अंधाधुंध प्रेम) ही इस संपूर्ण महाभारत युद्ध की मूल पृष्ठभूमि बनी थी।

जब विदुर, भीष्म पितामह, आचार्य द्रोण और गुरु कृपाचार्य जैसे महान ज्ञानियों ने दुर्योधन को बार-बार समझाने का प्रयास किया कि पाण्डवों को उनका न्यायसंगत हिस्सा दे दिया जाए और इस महाविनाश से बचा जाए, तब दुर्योधन ने अपनी 'दुर्बुद्धि' के कारण हर बार शांति प्रस्तावों को ठुकरा दिया। उसने न केवल बड़ों का अनादर किया, बल्कि संपूर्ण आर्यावर्त के राजाओं और योद्धाओं को अपने प्रभाव, धन और बल के दम पर अपने पक्ष में कर लिया। इन योद्धाओं में कई ऐसे भी थे जो व्यक्तिगत रूप से पाण्डवों के शुभचिंतक या ज्ञानी थे, किंतु नमक का कर्ज, राजधर्म या दुर्योधन की कूटनीति के जाल में फंसकर वे भी उसी की छांव में युद्ध करने आ पहुंचे थे।

यही वह पृष्ठभूमि है जहाँ अर्जुन अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच रुकवाते हैं। वे देखना चाहते हैं कि वे कौन-कौन से मूर्ख और भ्रमित लोग हैं जो दुर्योधन जैसे 'दुर्बुद्धि' व्यक्ति के मन को भाने वाले (प्रियचिकीर्षवः) यानी उसके स्वार्थी और अधार्मिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान देने को उतारू हैं। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि इतिहास में जब-जब कोई तानाशाह या दुष्ट शासक उठता है, तब-तब उसके इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का झुंड इकट्ठा हो जाता है जो अपने निजी लाभ या अज्ञानतावश उस दुष्ट के हर गलत कार्य को सही ठहराने और उसका 'प्रिय' करने का प्रयास करते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के इन श्लोकों का नियमित पठन, मनन और श्रवण करने से साधक को न केवल मानसिक शांति प्राप्त होती है, बल्कि उसकी जीवन के प्रति दृष्टि भी बदलती है। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. विवेक बुद्धि का विकास

इस श्लोक के नियमित चिंतन से मनुष्य के भीतर 'विवेक' जागृत होता है। वह आसानी से सही और गलत, तथा धर्म और अधर्म के बीच का अंतर पहचान लेता है, ठीक वैसे ही जैसे अर्जुन ने दुर्योधन की दुर्बुद्धि को पहचाना था।

2. नकारात्मक संगति से मुक्ति

यह श्लोक हमें उन लोगों और वातावरण से दूर रहने की प्रेरणा देता है जो 'दुर्बुद्धि' या कुटिल मानसिकता से ग्रसित होकर समाज में द्वेष फैलाते हैं, जिससे मानसिक शांति बनी रहती है.

3. मानसिक एकाग्रता और स्थिरता

गीता के श्लोकों का सस्वर पाठ करने से मस्तिष्क की तरंगे शांत होती हैं। तनाव, अवसाद और निर्णय लेने की दुविधा से जूझ रहे व्यक्तियों के लिए यह मानसिक टॉनिक का कार्य करता है।

4. कर्मों की शुद्धि (कर्म योग का आधार)

जब साधक यह समझ जाता है कि किसी दुष्ट के बहकावे में आकर गलत कार्य करना पतन का मार्ग है, तो वह केवल सत्कर्म और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होता है, जिससे कर्मों के बंधन कटते हैं।

5. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का निर्माण

संस्कृत के पवित्र श्लोकों के कंपन (Vibrations) से शरीर के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा का घेरा (Aura) बनता है, जो बाहरी नकारात्मकता को रोकता है।

6. नेतृत्व और निर्णय क्षमता में वृद्धि

अर्जुन की भाँति गंभीर परिस्थितियों में भी सत्य का साथ देने का साहस और नेतृत्व करने की क्षमता इस प्रकार के शास्त्रीय अध्ययन से स्वतः विकसित होती है।

7. ईश्वरीय शरणागति का भाव

जीवन के हर रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण को अपना सारथी मानने और उनके मार्गदर्शन पर चलने की विनम्रता साधक के भीतर उत्पन्न होती है।

8. आध्यात्मिक शांति और मोक्ष का मार्ग

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक को मोक्ष का द्वार माना गया है। नियमित पठन से भवसागर से तरने की चेतना पुष्ट होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह आलेख Bhaktilok.in के उच्च कोटि के विद्वान शोधकर्ताओं और संस्कृत भाषाविदों द्वारा संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस प्रस्तुति में महर्षि वेदव्यास रचित 'महाभारत' के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली 'श्रीमद्भगवद्गीता' के मूल प्रामाणिक पाठ, आदि शंकराचार्य तथा स्वामी रामानुजचार्य के भाष्यों के सार एवं पारंपरिक वैदिक मान्यताओं का पूर्ण ध्यान रखा गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का सबसे शुद्ध, तार्किक और आध्यात्मिक स्वरूप पहुंचाना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच हर साधक अपने मूल संस्कारों और वेदों के शाश्वत सत्यों से जुड़ा रह सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

अर्जुन भली-भांति जानते थे कि दुर्योधन की कुटिल नीतियां, अहंकार और पाण्डवों के प्रति अन्यायी रवैया ही इस महाविनाशक युद्ध का एकमात्र कारण है। दुर्योधन ने शांति के सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया था, इसलिए उसकी कुटिल और स्वार्थी मानसिकता को दर्शाने के लिए अर्जुन ने उसे 'दुर्बुद्धि' (दुष्ट बुद्धि वाला) कहा।

'प्रियचिकीर्षवः' का शाब्दिक अर्थ है— किसी का प्रिय कार्य करने की इच्छा रखने वाले। इस श्लोक के संदर्भ में इसका तात्पर्य उन सभी योद्धाओं से है जो दुर्योधन को प्रसन्न करने या उसकी चाटुकारिता में अंधे होकर अधर्म के मार्ग पर चलने के लिए कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए थे।

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय को 'अर्जुनविषादयोग' कहा जाता है। इसका मुख्य विषय युद्ध भूमि में अपनों को सामने देखकर अर्जुन के मन में उत्पन्न मोह, करुणा, विषाद और कर्तव्य-विमुखता की स्थिति का वर्णन करना है, जो अंततः भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए जाने वाले ज्ञान की पृष्ठभूमि बनता है।

निश्चित रूप से। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमें जीवन में उन लोगों और प्रसंगों से सावधान रहना चाहिए जो कुटिल मानसिकता (दुर्बुद्धि) से प्रेरित होकर समाज या परिवार में द्वेष फैलाते हैं। यह हमें सही और गलत का विवेक रखने की प्रेरणा देता है।

गीता के श्लोकों का पाठ स्नान आदि से निवृत्त होकर, शुद्ध चित्त से, उचित उच्चारण और उनके भावार्थ को समझते हुए करना चाहिए। केवल शब्दों को रटने के स्थान पर उनके दार्शनिक संदेश को अपने आचरण में उतारना ही इसका सबसे बड़ा फल है।

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दुर्योधन की दुष्टता / Evil of Duryodhana

अर्जुन ने स्पष्ट किया कि वह जानते थे कि युद्ध दुर्योधन के दुष्ट आचरण के कारण हो रहा है। Arjuna clearly recognized that the war was caused by Duryodhana's evil nature.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/47 49% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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