श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 47

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 34 मिनट का पठन 115 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् | विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ||४७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
एवम्
इस प्रकार
उक्त्वा
कहकर
अर्जुनः
अर्जुन
सङ्ख्ये
युद्ध में
रथोपस्थे
रथ के पिछले भाग में
उपाविशत्
बैठ गए
विसृज्य
त्यागकर
सशरम्
बाणों सहित
चापम्
धनुष
शोक
शोक से
संविग्न
व्याकुल
मानसः
मन वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

युद्धभूमि में इस प्रकार कहकर अर्जुन ने बाणों सहित धनुष त्याग दिया और शोक से व्याकुल मन से रथ के पिछले भाग में बैठ गए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय संदर्भ

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु साक्षात भगवान श्री हरि विष्णु के श्रीमुख से निःसृत अमृत वाणी माना जाता है। कुरुक्षेत्र के पावन और धर्मक्षेत्र के मैदान में जब दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मसंकट में पड़े गांडीवधारी अर्जुन की मनोदशा का सजीव और अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्रण इस प्रथम अध्याय के अंतिम श्लोक में हुआ है। "एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् | विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ||४७||" यह श्लोक केवल एक योद्धा की पराजय या कायरता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उस परम आध्यात्मिक जिज्ञासा, मोह-जन्य विषाद और अहंकार के विसर्जन का आदि बिंदु है, जहां से संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए गीता ज्ञान का सूर्योदय होता है।

जब मनुष्य अपने जीवन के निर्णायक मोड़ पर स्वजनों के मोह, कर्तव्य के प्रति भ्रम और नैतिक दुविधाओं से घिर जाता है, तब उसकी चेतना ठीक वैसी ही हो जाती है जैसी रणभूमि में अर्जुन की हुई थी। यह श्लोक हमें सिखाता है कि अहंकार और झूठे अभिमान के साथ उठाए गए शस्त्र या किए गए निर्णय कभी कल्याणकारी नहीं हो सकते। जब तक मनुष्य का मानस शोक और मोह से संतप्त नहीं होता, तब तक वह पूर्ण शरणागति की अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता। अर्जुन का रथ पर बैठ जाना और अपने अस्त्र-शस्त्रों को त्याग देना इस बात का प्रतीक है कि जब तक जीव अपने सारे बौद्धिक और शारीरिक अहंकार का त्याग करके भगवान के चरणों में समर्पण नहीं करता, तब तक उसे सदगुरु या ईश्वर का वास्तविक मार्गदर्शन प्राप्त नहीं हो सकता। इस प्रकार, यह श्लोक महाभारत के विराट युद्ध के प्रारंभ में एक आध्यात्मिक विराम का द्योतक है, जो संपूर्ण विश्व को कर्म, धर्म और मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः

एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय 'सङ्ख्ये' पर विसर्ग/अनुस्वार का स्पष्ट उच्चारण करें। 'शोकसंविग्नमानसः' बोलते समय मन की व्याकुलता और गंभीरता को अपने स्वर में स्थान दें, क्योंकि यह अर्जुन के असीम मानसिक संताप को व्यक्त करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
एवम् (Evam) इस प्रकार पूर्व में कहे गए तर्कों और अपनी बात को समाप्त करते हुए।
उक्त्वा (Uktva) कहकर अपने मुख से भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी दीनता प्रकट करके।
अर्जुनः (Arjunah) अर्जुन ने जो पाप-पुण्य और कुल-धर्म को लेकर తీవ్ర असमंजस में पड़ गए थे।
सङ्ख्ये (Sankhye) युद्धभूमि में कुरुक्षेत्र के उस मैदान में जहां धर्म और अधर्म का निर्णय होना था।
रथोपस्थे (Rathopaste) रथ के पिछले भाग / आसन पर अपने उच्च पद, पराक्रम और शौर्य के प्रतीकात्मक रथ पर नीचे बैठ जाना।
उपाविशत् (Upavishat) बैठ गए कर्तव्यविमूढ होकर रणभूमि में शस्त्र त्यागकर निराश बैठ जाना।
विसृज्य (Visrijya) त्यागकर / छोड़कर अपने अभिमान, वीरता और अस्त्र-शस्त्रों का पूरी तरह परित्याग करना।
सशरम् चापम् (Sasharam Chapam) बाण सहित धनुष को गांडीव जैसे दिव्य और शक्तिशाली अस्त्र को जमीन पर रख देना।
शोक (Shoka) शोक से / दुःख से स्वजनों के नाश की आशंका से उत्पन्न मानसिक संताप।
संविग्नमानसः (Samvigna-manasah) व्याकुल और संतप्त मन वाले वह अवस्था जहां बुद्धि काम करना बंद कर देती है और केवल भय व मोह बचता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के महाकाव्य के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में, यह श्लोक कौरव और पाण्डव सेनाओं के बीच उस निर्णायक क्षण का अंत करता है जिसे महर्षि वेद व्यास ने अत्यंत नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया है। कौरवों के अत्याचारों से त्रस्त होकर जब पांडवों ने अपने अधिकारों के लिए धर्मयुद्ध का शंखनाद किया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन के सारथी बनना स्वीकार किया था। युद्ध के ठीक आरंभ में, अर्जुन के अनुरोध पर श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्य रथ ला खड़ा किया। उस समय अर्जुन ने जब अपने ही गुरुओं (द्रोणाचार्य, कृपाचार्य), पितामह (भीष्म), भाइयों, और प्रियजनों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखा, तो उनका मोह जागृत हो गया।

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि वे अपने ही स्वजनों का खून बहाकर किसी भी प्रकार का राज्य या सुख नहीं चाहते। उनके अंग शिथिल होने लगे, उनका गांडीव धनुष उनके हाथों से फिसलने लगा, और उनका मन भ्रमित हो गया। प्रथम अध्याय के इस अंतिम श्लोक में अर्जुन की यह मानसिक पराकाष्ठा अपने चरम पर पहुंच जाती है। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों को रथ पर रखकर हताश हो बैठ जाते हैं। यह प्रसंग हमें यह शिक्षा देता है कि सांसारिक मोह और अज्ञान किस प्रकार एक महान योद्धा को भी कर्तव्यच्युत कर सकता है। यहीं से वेदव्यास जी महाभारत के इस पर्व को 'भगवद्गीता पर्व' के रूप में मोड़ते हैं, जहां अज्ञान के अंधकार में डूबे अर्जुन का उद्धार करने के लिए साक्षात जगद्गुरु श्रीकृष्ण अपने उपदेशों का अमृत बरसाते हैं।

यह कथा केवल द्वापर युग की नहीं है, बल्कि यह हर उस मनुष्य की कहानी है जो जीवन के किसी न किसी मोड़ पर मोह, भय और हताशा के कारण अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ना चाहता है। इस ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि विषाद की यह अवस्था अंततः भगवान की शरण में जाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मानसिक व्याकुलता और अवसाद से मुक्ति

इस श्लोक का चिंतन और स्मरण करने से मनुष्य को यह अहसास होता है कि महान आत्माओं के जीवन में भी मानसिक विषाद और भ्रम की स्थिति आ सकती है, जिससे अवसादग्रस्त व्यक्तियों को मानसिक संबल मिलता है।

2. अहंकार और घमंड का शमन

अर्जुन द्वारा अपने अस्त्र-शस्त्र त्यागने की कथा हमें सिखाती है कि व्यक्ति को अपने बल, बुद्धि और पराक्रम पर अत्यधिक अभिमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय आने पर अहंकार टूट जाता है।

3. पूर्ण शरणागति की भावना का विकास

जब मन शोक और संताप से भर जाता है, तब व्यक्ति ईश्वर के समक्ष पूर्ण समर्पण करना सीखता है। यह श्लोक भक्त के हृदय में आत्मसमर्पण के भाव को जाग्रत करता है।

4. आंतरिक ऊर्जा और सकारात्मक औरा

गीता के इन प्रारंभिक श्लोकों का पारायण करने से विचारों की शुद्धि होती है, नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और शरीर के चारों ओर एक सकारात्मक आध्यात्मिक औरा (Aura) का निर्माण होता है।

5. कर्म और कर्तव्य के प्रति नई दृष्टि

यह श्लोक उस शून्य अवस्था को दर्शाता है जिसके तुरंत बाद ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है, जिससे साधक को अपने जीवन के सही कर्तव्यों को पहचानने में सहायता मिलती है।

6. निर्णय लेने की क्षमता में सुधार

भ्रम की स्थिति से उबरने के लिए भगवान के उपदेशों को सुनने की इच्छाशक्ति इस श्लोक के माध्यम से जागृत होती है, जो जीवन के कठिन निर्णयों में मददगार है।

7. कर्मिक शुद्धिकरण (Karmic Purification)

पवित्र भाव से गीता का अध्ययन करने से पिछले जन्मों के संचित कर्मों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और चेतना उच्च लोकों व आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होती है।

8. भगवत कृपा और सदगुरु की प्राप्ति

जैसे अर्जुन की विह्वल दशा देखकर श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का ज्ञान दिया, वैसे ही साधक के सच्चे समर्पण पर ईश्वर स्वयं किसी सदगुरु के रूप में उसका मार्गदर्शन करते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख Bhaktilok.in के विशेषज्ञ विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के शोधकर्ताओं द्वारा गहन अध्ययन के उपरांत संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है। श्रीमद्भागवतगीता के इस प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के अंतिम श्लोक की व्याख्या महर्षि वेद व्यास रचित मूल महाभारत, आदि पर्व तथा विभिन्न आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञाननानंद जी) की टीकाओं के आधार पर की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों, उपनिषदों और पुराणों का अकाट्य, सरल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध ज्ञान प्रदान करना है, जिससे आधुनिक जीवन की जटिलताओं के बीच आध्यात्मिक शांति प्राप्त की जा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जब मनुष्य सांसारिक मोह, अहंकार और भ्रम में फंसकर अपने कर्तव्यों से विमुख होता है और पूरी तरह हताश हो जाता है, तब वह अपनी बौद्धिक क्षमता खो बैठता है। यह श्लोक इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान प्राप्ति और ईश्वर की शरण में जाने से पहले अहंकार और झूठे अभिमान का त्याग करना अनिवार्य है।

उत्तर: अर्जुन ने अपने गुरुओं, कुल के बुजुर्गों, भाइयों और प्रियजनों को शत्रु पक्ष में देखकर अगाध मोह और शोक का अनुभव किया। उन्हें लगा कि अपने ही परिजनों की हत्या करके मिलने वाला राज्य और सुख किसी काम का नहीं है। इसी घोर मानसिक तनाव और कर्तव्यविमूढता के कारण उन्होंने अपने बाण और गांडीव धनुष को त्याग दिया और रथ पर बैठ गए।

उत्तर: 'शोकसंविग्नमानसः' संस्कृत के तीन शब्दों से मिलकर बना है—शोक (दुःख), संविग्न (व्याकुल या डगमगाया हुआ) और मानसः (मन)। इसका अर्थ है वह व्यक्ति जिसका मन अत्यधिक शोक, चिंता और मानसिक संताप के कारण पूरी तरह विचलित और व्याकुल हो चुका हो।

उत्तर: हां, इस श्लोक और इसके भावों का मनन करने से व्यक्ति को यह समझ आता है कि मानसिक विषाद मानव जीवन का एक हिस्सा है जिससे पार पाया जा सकता है। यह साधक को अपने जीवन के भ्रमों को दूर करने और भगवान श्रीकृष्ण के ज्ञान (गीता) को अपने जीवन में उतारने के लिए प्रेरित करता है, जिससे आंतरिक शांति प्राप्त होती है।

उत्तर: श्रीमद्भागवतगीता के प्रथम अध्याय का नाम 'अर्जुनविषादयोग' है। यह श्लोक इसी अध्याय का अंतिम श्लोक है, जो अर्जुन की पूर्ण हताशा और विषाद को दर्शाते हुए अध्याय का समापन करता है और इसके ठीक बाद द्वितीय अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ज्ञान के उपदेश का मंच तैयार करता है।

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युद्ध से विरति / Cessation from War

अर्जुन का युद्ध से विरत होना गीता के उपदेश का आधार बनता है। Arjuna's refusal to fight sets the stage for the teachings of the Gita.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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