श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 7

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 42 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम | नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ||७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
अस्माकम्
हमारी ओर
तु
तो
विशिष्टा
विशेष
ये
जो
तान्
उन्हें
निबोध
जानो
द्विजोत्तम
हे द्विजश्रेष्ठ
नायका
नायक
मम
मेरी
सैन्यस्य
सेना के
संज्ञार्थम्
सूचना के लिए
तान्
उन्हें
ब्रवीमि
बताता हूँ
ते
आपको।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

किन्तु हे द्विजश्रेष्ठ! आपकी जानकारी के लिए मैं अपनी सेना के जो विशेष नायक हैं, उन्हें बताता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय संकेत

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता का स्थान सर्वोच्च है। इसे केवल एक युद्ध के मैदान में दो सेनाओं के बीच हुआ संवाद नहीं माना जाता, बल्कि यह मानव चेतना, आत्मा के उत्थान और जीवन के प्रत्येक संकट में उचित निर्णय लेने का एक दिव्य मार्गदर्शक ग्रंथ है। महाभारत के युद्ध का आरंभ होने से ठीक पूर्व, जब कुरुक्षेत्र की उस पावन भूमि पर दोनों दल आमने-सामने खड़े थे, तब कौरवों के सेनापति और हस्तिनापुर के युवराज दुर्योधन के मन में उत्पन्न होने वाली मनोदशा का वर्णन इस श्लोक में अत्यंत मनोवैज्ञानिक और सूक्ष्मता के साथ किया गया है।

जब हम श्रीमद्भागवतगीता के प्रथम अध्याय के सातवें श्लोक—"अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम..."—का अध्ययन करते हैं, तो हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि किस प्रकार एक महत्वाकांक्षी, भयभीत और चापलूसी से घिरे हुए शासक की मानसिकता कार्य करती है। यहाँ दुर्योधन अपनी सेना की श्रेष्ठता का बखान गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष कर रहा है। वह अपने पक्ष के उन विशिष्ट और पराक्रमी योद्धाओं का परिचय दे रहा है, जो उसकी दृष्टि में युद्ध की दिशा बदलने में सक्षम हैं।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जब मनुष्य अहंकार, आश्रयहीनता या बाहरी बल पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तो वह अपने बल की गणना तो करता है परंतु सत्य और धर्म के मार्ग की उपेक्षा कर बैठता है। इस लेख में हम इसी श्लोक के शाब्दिक अर्थ, इसके पीछे की पौराणिक पृष्ठभूमि, इसके व्याकरणिक स्वरूप और इसके गूढ़ आध्यात्मिक संदेशों का अत्यंत विस्तार से विश्लेषण करेंगे, ताकि पाठकगण गीता के मर्म को सहज हिंदी भाषा में आत्मसात कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

— श्रीमद्भागवतगीता, प्रथम अध्याय (ार्जुनविषादयोग), श्लोक 7 —

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम |
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ||७||

"हे द्विजोत्तम! हमारे पक्ष में भी जो विशिष्ट (प्रधान) सेनापति हैं, आप उनको समझ लीजिए; आपकी जानकारी के लिए मैं अपनी सेना के नायकों के नाम गिनवा रहा हूँ।"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का संस्कृत व्याकरण, सरल हिंदी अर्थ और उसका दार्शनिक भावार्थ निम्नलिखित तालिका में स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अस्माकं हमारे पक्ष के भौतिक अहंकार और अहंता (Mine-ness) का प्रतीक; जहाँ व्यक्ति अपने कुल, सेना और साधनों को सर्वश्रेष्ठ मानता है।
तु लेकिन / और तो एक ऐसा योजक पद जो पांडवों की सेना के वर्णन के ठीक बाद दुर्योधन के मन में उत्पन्न तुलनात्मक भाव और स्पर्धा को दर्शाता है।
विशिष्टाः विशेष, प्रमुख या अत्यंत पराक्रमी वे योद्धा जो सामान्य सैनिकों से अलग अपनी असाधारण युद्ध कला और अस्त्र-शस्त्र की महारत के लिए जाने जाते हैं।
ये जो जो कौरव सेना के उन तमाम विशिष्ट महारथियों की ओर संकेत जो युद्ध के इस महायज्ञ में आहुति देने के लिए एकत्र हुए हैं।
तान् उनको उन सभी विशिष्ट व्यक्तियों को जिनका उल्लेख दुर्योधन अपने गुरु के समक्ष करना अनिवार्य समझता है ताकि उनका मनोबल ऊँचा रहे।
निबोध भली-भांति जान लीजिए / समझ लीजिए गुरु को ज्ञान देने के अहंकार में दुर्योधन द्वारा आदेशात्मक या आग्रहपूर्ण मुद्रा में अपनी बात को मनवाने का प्रयास।
द्विजोत्तम हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ (गुरु द्रोणाचार्य) द्रोणाचार्य जैसे महान ब्रह्मर्षि और अस्त्रगुरु का संबोधन, जो यह दर्शाता है कि दुर्योधन कर्तव्य और शिष्टाचार का दिखावा कर रहा है।
नायकाः सेनापति या मुख्य संचालक वे लोग जो सेना का नेतृत्व करते हैं और जिनके बल पर पूरी युद्ध नीति टिकी हुई होती है, जैसे भीष्म, कर्ण और अश्वत्थामा।
मम मेरी स्वामित्व का भाव (Possessiveness), जो दुर्योधन की इस भावना को उजागर करता है कि सेना और सत्ता पर केवल उसका अधिकार है।
सैन्यस्य सेना के कौरवों की विशाल अक्षौहिणी सेना, जो संख्या बल में अधिक होने के बावजूद आंतरिक रूप से नैतिक रूप से कमजोर थी।
संज्ञार्थम् आपकी जानकारी के लिए / विशेष रूप से स्मरण कराने हेतु गुरु द्रोणाचार्य को यह याद दिलाने के लिए कि वे किसके पक्ष से युद्ध कर रहे हैं और किसकी विजय चाहनी चाहिए।
ब्रवीमि मैं कहता हूँ / वर्णन करता हूँ दुर्योधन के द्वारा स्वयं मुख से अपनी सेना के गौरव का बखान करना, जो उसकी अंतर्निहित असुरक्षा और भय को छिपाने का प्रयास है।
ते आपके लिए (आपको) गुरु द्रोण को संबोधित करते हुए, ताकि वे अपनी सेना के शक्ति संतुलन को भली-भांति समझ सकें।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता के प्रथम अध्याय की रचना महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाकाव्य 'महाभारत' के भीष्म पर्व का एक अभिन्न अंग है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब पांडवों की सुव्यवस्थित और व्यूहबद्ध सेना को देखकर दुर्योधन के भीतर एक अज्ञात भय और चिंता जागृत हो उठी थी। उसने तुरंत अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर पांडवों की सेना के गठन और उनके महान योद्धाओं का परिचय दिया था (जैसा कि पिछले श्लोकों में वर्णित है)।

परंतु जैसे ही दुर्योधन ने पांडव सेना की ताकत का आकलन किया, उसे यह अहसास हुआ कि कहीं उसके गुरु द्रोणाचार्य और अन्य सेनापति पांडवों के प्रति पक्षपात न कर बैठें, क्योंकि द्रोणाचार्य का अर्जुन के प्रति विशेष स्नेह जगजाहिर था। इसी आशंका के वशीभूत होकर, दुर्योधन तुरंत अपनी सेना के उन प्रमुख और विशिष्ट योद्धाओं का नाम लेना शुरू करता है जो उसकी तरफ से युद्ध लड़ने आए थे।

इस श्लोक में दुर्योधन द्वारा प्रयुक्त शब्द 'द्विजोत्तम' अत्यंत महत्वपूर्ण है। द्रोणाचार्य यद्यपि ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए थे और वेदों-शास्त्रों के ज्ञाता थे, तथापि उन्होंने क्षत्रिय धर्म अपनाते हुए शस्त्र संचालन को अपनी आजीविका और कर्म बनाया था। दुर्योधन उन्हें 'द्विजोत्तम' (ब्राह्मणों में श्रेष्ठ) कहकर संबोधित करता है ताकि वह उनके अहंकार या उनकी विद्वता को स्पर्श कर सके और उन्हें यह स्मरण करा सके कि वे कौरव साम्राज्य के वेतनभोगी और रक्षक हैं। यह पौराणिक प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जब व्यक्ति स्वार्थ और अहंकार से प्रेरित होता है, तब वह रिश्तों, पदों और गुरु-शिष्य परंपरा का भी उपयोग अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए करने लगता है।

महर्षि वेदव्यास ने इस संवाद के माध्यम से मानव मनोविज्ञान का एक ऐसा यथार्थ चित्र खींचा है, जो आज के आधुनिक युग में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि तब था। जब कभी मनुष्य संकट में होता है, तो वह सबसे पहले अपने संसाधनों, अपने मित्रों और अपने बल की लंबी सूची तैयार करता है—बिल्कुल उसी प्रकार जैसे दुर्योधन ने यहाँ किया।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के श्लोकों का नियमित पठन, मनन और उनके अर्थ को समझना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आत्मिक शुद्धि का एक अचूक साधन है। इस विशेष श्लोक के अध्ययन और पाठ से निम्नलिखित आध्यात्मिक व मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक स्पष्टता और अंतर्दृष्टि

गीता के श्लोकों का उच्चारण करने से मस्तिष्क में एकाग्रता बढ़ती है और व्यक्ति अपने जीवन की जटिल परिस्थितियों को स्पष्टता से देख पाता है।

2. अहंकार और भय का शमन

दुर्योधन की मानसिकता का अध्ययन करने से हमें अपने भीतर छिपे अहंकार, असुरक्षा और अत्यधिक संग्रह की प्रवृत्ति को पहचानने और उससे मुक्त होने की प्रेरणा मिलती है.

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

संस्कृत के पवित्र श्लोकों के नियमित सस्वर पाठ से घर और मन की ऊर्जा में सकारात्मक बदलाव आता है, जिससे नकारात्मक विचार दूर होते हैं।

4. कर्म और कर्तव्य का बोध

यह श्लोक हमें सिखाता है कि केवल बाह्य साधनों या बल पर निर्भर रहने के बजाय हमें अपने कर्मों की नैतिक गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।

5. वाणी और स्मरण शक्ति में वृद्धि

संस्कृत छंदों और पदों का उच्चारण करने से वाक्पटुता बढ़ती है और स्मरण शक्ति (Memory Power) में उल्लेखनीय सुधार होता है।

6. तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता

श्लोक के पद-विच्छेद और शब्दार्थ को समझने से बौद्धिक विकास होता है और व्यक्ति सतही ज्ञान के बजाय गहराई से सोचना सीखता है।

7. कर्मफल के प्रति जागरूकता

दुर्योधन की कूटनीति और अंततः उसके पतन के इतिहास से जोड़कर देखने पर यह हमें अधर्म के मार्ग से बचने की शाश्वत सीख देता है।

8. ईश्वरीय शरणागति की प्रेरणा

जब हम देखते हैं कि सांसارिक बल और सेनाएं अंततः नष्ट हो जाती हैं, तो मन स्वतः ही भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाने के लिए प्रेरित होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तलोक डॉट इन (Bhaktilok.in) के संपादकीय मंडल और प्राचीन संस्कृत भाषाविदों की देखरेख में इस आलेख को अत्यंत प्रामाणिक ग्रंथों—विशेष रूप से महर्षि वेदव्यास रचित 'श्रीमद्भागवतगीता' (गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण और शंकराचार्य भाष्य) के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का तथ्यात्मक, दार्शनिक और सांस्कृतिक रूप से शुद्ध ज्ञान पहुँचाना है।

प्रत्येक श्लोक के शब्दार्थ, व्याकरण और उसके ऐतिहासिक प्रसंगों को वेदों, उपनिषदों और महाभारतांगों के तर्कों के साथ परखा गया है। हम किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से दूर रहकर पाठकों को विशुद्ध आध्यात्मिक और शैक्षणिक सामग्री प्रदान करने के लिए कटिबद्ध हैं। यदि इस आलेख से संबंधित आपके पास कोई सुझाव या प्रश्न है, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक में दुर्योधन कौरव सेना के मुख्य सेनापति और गुरु 'द्रोणाचार्य' को संबोधित कर रहा है। वह उन्हें 'द्विजोत्तम' (ब्राह्मणों में श्रेष्ठ) कहकर अपनी सेना के प्रमुख और विशिष्ट योद्धाओं का परिचय दे रहा है ताकि गुरु का ध्यान अपनी सेना की शक्ति की ओर आकर्षित कर सके।

उत्तर: पांडवों की सुव्यवस्थित सेना को देखकर दुर्योधन के मन में असुरक्षा और भय उत्पन्न हो गया था। इसके साथ ही, उसके मन में यह आशंका भी थी कि कहीं गुरु द्रोणाचार्य पांडवों के प्रति पक्षपात न कर बैठें। इसी भय और मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण उसने अपनी सेना के पराक्रमी नायकों का नाम लेकर अपना और अपनी सेना का मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया।

उत्तर: 'द्विजोत्तम' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'द्विजों (ब्राह्मणों) में श्रेष्ठ' होता है। महाभारत के प्रसंग में यह संबोधन आचार्य द्रोणाचार्य के लिए प्रयोग किया गया है, जो जन्म से ब्राह्मण थे परंतु क्षत्रिय धर्म निभाते हुए कौरव सेना के अस्त्रगुरु और सेनापति बने थे।

उत्तर: यह श्लोक सिखाता है कि जब मनुष्य अहंकार, स्वार्थ और बाह्य संसाधनों के बल पर जीता है, तो वह हमेशा भय और असुरक्षा से घिरा रहता है। इसके विपरीत, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को बाहरी बलों की गिनती करने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर (भगवान श्रीकृष्ण) करते हैं।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भागवतगीता के किसी भी श्लोक का सस्वर पाठ, उसका मनन और उसके अर्थ को समझना मानसिक एकाग्रता को बढ़ाता है, तनाव को कम करता है और जीवन के संघर्षों से निपटने के लिए आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।

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आत्मविश्वास / Confidence

दुर्योधन यहाँ अपनी सेना के बल का परिचय दे रहा है, ताकि द्रोणाचार्य को यह भरोसा हो कि हमारी ओर भी अनेक महारथी हैं। Duryodhana tries to reassure his teacher by naming the powerful commanders on their side.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/47 15% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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