श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 1

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 3 मिनट का पठन 104 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः | यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया || १||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
श्रीभगवान् उवाच
भगवान् ने कहा
भूय
फिर
एव
ही
महाबाहो
हे महाबाहो
शृणु
सुन
मे
मेरे
परमम्
परम
वचः
वचन
यत्
जो
ते
तुमसे
अहम्
मैं
प्रीयमाणाय
प्रिय होने के कारण
वक्ष्यामि
कहूँगा
हितकाम्यया
हित की इच्छा से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे महाबाहो! तुम मेरे परम प्रिय हो, इसलिये तुम्हारे हित की इच्छा से मैं फिर से कहता हूँ, मेरे इन परम रहस्यमय वचनों को सुनो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Lord Krishna begins this chapter by addressing Arjuna as Mahabaho (mighty-armed), indicating his capability to receive this knowledge. He says He will speak again (bhūya eva) because Arjuna is dear to Him and He wishes his welfare. This sets the tone for the vibhuti yoga, where the Lord will describe His divine opulences.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि वे उनके परम प्रिय हैं और उनके हित के लिए पुनः परम वचन सुनाएंगे। यह श्लोक दर्शाता है कि गुरु शिष्य के प्रति प्रेम और कृपा से ही गूढ़ ज्ञान प्रदान करते हैं।

The Lord addresses Arjuna as His dear devotee and out of compassion promises to reveal the highest wisdom. This verse highlights the intimate relationship between the teacher and the student.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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