श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 2

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 3 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः | अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः || २||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
न
नहीं
मे
मेरे
विदुः
जानते
सुर-गणाः
देवता
प्रभवम्
उद्भव (ऐश्वर्य)
न
नहीं
महर्षयः
महर्षि
अहम्
मैं
आदि
आदि कारण
हि
निश्चय ही
देवानाम्
देवताओं के
महर्षीणाम्
महर्षियों के
च
और
सर्वशः
सब प्रकार से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

न देवता समूह और न ही महर्षि लोग मेरी उत्पत्ति (ऐश्वर्य) को जानते हैं, क्योंकि सब प्रकार से मैं ही देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Krishna states that even the celestial beings and great sages do not comprehend His divine origin. He is the source of all, including those who are considered creators or seers. This establishes His supreme transcendental position.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि देवता और महर्षि भी उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते। क्योंकि वे स्वयं सभी के आदि कारण हैं। यह उनकी सर्वोच्च सत्ता को स्थापित करता है।

Lord Krishna emphasizes His supremacy by stating that even the celestial beings and great sages are unaware of His divine nature, as He is the very source of their existence.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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