श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 3

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 3 मिनट का पठन 107 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् | असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते || ३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
य
जो
माम्
मुझे
अजम्
अजन्मा
अनादिम्
अनादि
च
और
वेत्ति
जानता है
लोक-महेश्वरम्
लोकों का महान ईश्वर
असम्मूढः
मोहरहित
स
वह
मर्त्येषु
मनुष्यों में
सर्व-पापैः
सब पापों से
प्रमुच्यते
मुक्त हो जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों का महेश्वर जानता है, वह मनुष्यों में असम्मूढ़ (मोहरहित) है और सब पापों से मुक्त हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Knowing Krishna as unborn, beginningless, and the supreme Lord of all worlds leads to freedom from delusion and sin. This knowledge liberates one from the bondage of material existence.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि जो मनुष्य उनके अजन्मा, अनादि और सर्वेश्वर स्वरूप को जान लेता है, वह सांसारिक मोह से मुक्त होकर समस्त पापों से छूट जाता है। यह ज्ञान मुक्ति का मार्ग है।

Understanding the transcendental nature of the Lord as unborn, beginningless, and supreme ruler of the universe eradicates ignorance and sin, leading to liberation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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