मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन | न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || ३९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदयत्
जो
च
और
अपि
भी
सर्व-भूतानाम्
सब प्राणियों का
बीजम्
बीज
तत्
वह
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन
न
नहीं
तत्
वह
अस्ति
है
विना
बिना
यत्
जो
स्यात्
हो
मया
मुझसे
भूतम्
प्राणी
चर-अचरम्
चर और अचर।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे अर्जुन! और सब प्राणियों का जो बीज है, वह भी मैं हूँ। मुझसे रहित कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna reveals His role as the primal seed (cause) of all existence. Nothing — whether moving (living beings) or unmoving (inanimate objects) — can exist without Him. He is the essential ground of all being.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "हे अर्जुन! और सब प्राणियों का जो बीज है, वह भी मैं हूँ। मुझसे रहित कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है।"
The Lord reveals His ontological primacy — He is the causal seed from which all existence springs. Everything, without exception, depends on Him for its being.