श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 (विभूति योग (Vibhuti Yoga))

अध्याय 10 · श्लोक 39

विभूति योग (Vibhuti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 3 मिनट का पठन 102 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन | न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || ३९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
यत्
जो
च
और
अपि
भी
सर्व-भूतानाम्
सब प्राणियों का
बीजम्
बीज
तत्
वह
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन
न
नहीं
तत्
वह
अस्ति
है
विना
बिना
यत्
जो
स्यात्
हो
मया
मुझसे
भूतम्
प्राणी
चर-अचरम्
चर और अचर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे अर्जुन! और सब प्राणियों का जो बीज है, वह भी मैं हूँ। मुझसे रहित कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Krishna reveals His role as the primal seed (cause) of all existence. Nothing — whether moving (living beings) or unmoving (inanimate objects) — can exist without Him. He is the essential ground of all being.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं: "हे अर्जुन! और सब प्राणियों का जो बीज है, वह भी मैं हूँ। मुझसे रहित कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है।"

The Lord reveals His ontological primacy — He is the causal seed from which all existence springs. Everything, without exception, depends on Him for its being.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 10: विभूति योग (Vibhuti Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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