मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् | मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् || ३८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पददण्ड
दण्ड
दमयताम्
दमन करने वालों में
अस्मि
हूँ
नीति
नीति
अस्मि
हूँ
जिगीषताम्
विजय की इच्छा वालों में
मौनम्
मौन
च
और
एव
ही
अस्मि
हूँ
गुह्यानाम्
रहस्यों में
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञानवताम्
ज्ञानियों में
अहम्
मैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ, विजय की इच्छा वालों में मैं नीति हूँ, रहस्यों में मैं मौन हूँ, और ज्ञानियों में मैं ज्ञान हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna continues: among those who enforce discipline, He is the scepter (symbol of authority); among those seeking victory, He is statesmanship (righteous policy); among secrets, He is silence (the deepest mystery); among the wise, He is knowledge itself.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: "दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ, विजय की इच्छा वालों में मैं नीति हूँ, रहस्यों में मैं मौन हूँ, और ज्ञानियों में मैं ज्ञान हूँ।"
The Lord identifies with the principles behind various human endeavors — righteous authority, wise policy, profound silence, and pure knowledge.