श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 1

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 118 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच | प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च | एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव || १ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
अर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
प्रकृतिम्
प्रकृति को
पुरुषम्
पुरुष को
च
और
एव
ही
क्षेत्रम्
क्षेत्र
क्षेत्रज्ञम्
क्षेत्रज्ञ
एव
ही
च
और
एतत्
यह
वेदितुम्
जानने के लिए
इच्छामि
चाहता हूँ
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञेयम्
ज्ञेय तत्व
केशव
हे केशव

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन बोले: हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह अर्जुन का प्रश्न है, जो आगे के ज्ञान का द्वार खोलता है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विवेक से ही मोक्ष प्राप्त होता है। This verse sets the stage for the entire chapter, where Krishna explains the distinction between the material world and the spiritual self.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन ने भगवान कृष्ण से प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की।

Arjuna expresses his desire to know about Prakriti and Purusha, the field and its knower, and knowledge and the object of knowledge.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह प्रश्न गहन आध्यात्मिक जिज्ञासा को दर्शाता है। साधक को भी इसी प्रकार तत्वज्ञान की जिज्ञासा रखनी चाहिए।

This question reflects deep spiritual inquiry. A seeker should also have such curiosity about the ultimate truth.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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