श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 2

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते | एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः || २ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
श्रीभगवान्
भगवान
उवाच
बोले
इदम्
यह
शरीरम्
शरीर
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
क्षेत्रम्
क्षेत्र
इति
इस प्रकार
अभिधीयते
कहा जाता है
एतत्
इसको
य
जो
वेत्ति
जानता है
तम्
उसको
प्राहु
कहते हैं
क्षेत्रज्ञ
क्षेत्रज्ञ
इति
इस प्रकार
तद्विद
तत्व को जानने वाले

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और जो इसको जानता है, उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं – ऐसा तत्ववेत्ताओं का कथन है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान कृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) की परिभाषा बताते हैं। The Lord defines the body as the field and the knower of the field as the conscious self within.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं कि यह शरीर क्षेत्र है, और जो इस शरीर को जानता है वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है।

Lord Krishna says that this body is the field, and one who knows it is called the knower of the field.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शरीर जड़ है, चेतन आत्मा उसका ज्ञाता है। यह विवेक ही आत्मज्ञान की नींव है।

The body is inert, the conscious self is its knower. This discernment is the foundation of self-realization.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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