मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || ३ ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदक्षेत्रज्ञम्
क्षेत्रज्ञ को
च
और
अपि
भी
माम्
मुझको
विद्धि
जानो
सर्वक्षेत्रेषु
समस्त क्षेत्रों में
भारत
हे भारत
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयो
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का
ज्ञानम्
ज्ञान
यत्
जो
तत्
वह
ज्ञानम्
ज्ञान
मतम्
माना गया
मम
मेरे द्वारा
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भारत! सम्पूर्ण क्षेत्रों में (स्थित) क्षेत्रज्ञ को भी तू मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तविक) ज्ञान मेरा मत है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान स्वयं को सभी शरीरों में स्थित क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के रूप में घोषित करते हैं। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का यथार्थ बोध ही सच्चा ज्ञान है। The Lord declares Himself to be the knower in all bodies. True knowledge is understanding the distinction between the field and its knower.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं कि मैं सभी शरीरों में स्थित आत्मा के रूप में हूँ। क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का यथार्थ ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है।
The Lord says: I am the knower in all bodies. The true knowledge is the understanding of the field and its knower.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
परमात्मा सभी में व्याप्त है, और उसे पहचानना ही ज्ञान का लक्ष्य है।
The Supreme pervades all, and recognizing Him is the goal of knowledge.