श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 35

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 107 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
क्षेत्र
the field
क्षेत्रज्ञयोः
and the knower of the field
एवम्
thus
अन्तरम्
distinction
ज्ञान-चक्षुषा
with the eye of knowledge
भूत-प्रकृति
from material nature
मोक्षम्
liberation
च
and
ये
those who
विदुः
know
यान्ति
attain
ते
they
परम्
the Supreme.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो लोग इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के अन्तर को तथा भूतप्रकृति (प्रकृति) से मोक्ष को ज्ञानचक्षु द्वारा जान लेते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

This is the concluding verse of chapter 13. It emphasizes that true knowledge is the discrimination between matter and spirit. "Eye of knowledge" refers to the intuitive wisdom gained through spiritual practice. Liberation (mokṣa) means freedom from the bondage of material nature. Those who understand this truth transcend the material world and reach the Supreme.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो लोग इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के अन्तर को तथा भूतप्रकृति (प्रकृति) से मोक्ष को ज्ञानचक्षु द्वारा जान लेते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह श्लोक गीता के इस अध्याय का सार है। आत्मा और शरीर, पुरुष और प्रकृति के भेद को समझना ही सच्चा ज्ञान है। इस ज्ञान से मनुष्य संसार बन्धन से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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