श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 34

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 4 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यथा
just as
प्रकाशयति
illuminates
एकः
one
कृत्स्नम्
whole
लोकम्
world
इमम्
this
रविः
the sun
क्षेत्रम्
the field
क्षेत्री
the knower of the field
तथा
similarly
कृत्स्नम्
the entire
प्रकाशयति
illumines
भारत
O descendant of Bharata.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्रज्ञ (पुरुष) सम्पूर्ण क्षेत्र (शरीर) को प्रकाशित करता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

This verse beautifully illustrates the relationship between the knower (consciousness) and the known (material nature). Just as the sun illumines the entire world without being affected, the soul illumines the body with consciousness. The sun is one, yet its light pervades everywhere; similarly, the soul, though one, manifests consciousness throughout the body. "भारत" addresses Arjuna as one who is worthy of this knowledge.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्रज्ञ (पुरुष) सम्पूर्ण क्षेत्र (शरीर) को प्रकाशित करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह श्लोक बताता है कि चेतना (आत्मा) सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर उसे चेतन करती है, परन्तु स्वयं सूर्य की भाँति असंग रहती है। सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है, परन्तु उसके दोषों से लिप्त नहीं होता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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