श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 33

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 103 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते | सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते || ३३ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यथा
जैसे
सर्वगतम्
सर्वव्यापी
सौक्ष्म्यात्
सूक्ष्म होने के कारण
आकाशम्
आकाश
न
नहीं
उपलिप्यते
लिप्त होता
सर्वत्र
सर्वत्र
अवस्थित
स्थित
देहे
शरीर में
तथा
वैसे ही
आत्मा
आत्मा
न
नहीं
उपलिप्यते
लिप्त होता

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्म होने के कारण कहीं भी लिप्त नहीं होता, वैसे ही शरीर में सर्वत्र स्थित आत्मा (परमात्मा) कहीं लिप्त नहीं होता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आकाश की भाँति आत्मा भी सर्वव्यापी और सूक्ष्म है, इसलिए शरीर के गुणों से लिप्त नहीं होती। Like the all-pervading ether, the Self is subtle and not tainted by the qualities of the body.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्म होने के कारण कहीं लिप्त नहीं होता, वैसे ही शरीर में सर्वत्र स्थित आत्मा भी कहीं लिप्त नहीं होता।

As the all-pervading ether is not tainted, because of its subtlety, so the Self, seated everywhere in the body, is not tainted.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मा सदा शुद्ध और निर्लिप्त है। शरीर के धर्म उस पर लागू नहीं होते।

The Self is eternally pure and untainted. The attributes of the body do not apply to it.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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