श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 32

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः | शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते || ३२ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
अनादित्वात्
अनादि होने के कारण
निर्गुणत्वात्
निर्गुण होने के कारण
परमात्मा
परमात्मा
अयम्
यह
अव्यय
अविनाशी
शरीरस्थ
शरीर में स्थित
अपि
भी
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न
नहीं
करोति
करता
न
नहीं
लिप्यते
लिप्त होता

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! यह परमात्मा अनादि होने के कारण और निर्गुण होने के कारण अविनाशी है। शरीर में स्थित होने पर भी न तो कर्म करता है और न लिप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

परमात्मा अनादि और निर्गुण है, इसलिए शरीर में रहते हुए भी वह कर्म नहीं करता और न उनके फलों से लिप्त होता है। The Supreme Self, being beginningless and without qualities, does not act nor is affected by actions, even while residing in the body.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कौन्तेय! यह परमात्मा अनादि और निर्गुण होने के कारण अविनाशी है। शरीर में स्थित होने पर भी न तो कर्म करता है और न लिप्त होता है।

Being beginningless and devoid of qualities, this Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O son of Kunti, neither acts nor is tainted.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मा नित्य अकर्ता है, उस पर किसी कर्म का लेप नहीं होता।

The Self is eternally actionless; no action can taint it.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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