मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः | शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते || ३२ ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदअनादित्वात्
अनादि होने के कारण
निर्गुणत्वात्
निर्गुण होने के कारण
परमात्मा
परमात्मा
अयम्
यह
अव्यय
अविनाशी
शरीरस्थ
शरीर में स्थित
अपि
भी
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न
नहीं
करोति
करता
न
नहीं
लिप्यते
लिप्त होता
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कौन्तेय! यह परमात्मा अनादि होने के कारण और निर्गुण होने के कारण अविनाशी है। शरीर में स्थित होने पर भी न तो कर्म करता है और न लिप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
परमात्मा अनादि और निर्गुण है, इसलिए शरीर में रहते हुए भी वह कर्म नहीं करता और न उनके फलों से लिप्त होता है। The Supreme Self, being beginningless and without qualities, does not act nor is affected by actions, even while residing in the body.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे कौन्तेय! यह परमात्मा अनादि और निर्गुण होने के कारण अविनाशी है। शरीर में स्थित होने पर भी न तो कर्म करता है और न लिप्त होता है।
Being beginningless and devoid of qualities, this Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O son of Kunti, neither acts nor is tainted.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
आत्मा नित्य अकर्ता है, उस पर किसी कर्म का लेप नहीं होता।
The Self is eternally actionless; no action can taint it.