मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || ३१ ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदयदा
जब
भूतपृथग्भावम्
भूतों के पृथक्-पृथक् भाव को
एकस्थम्
एक में स्थित
अनुपश्यति
देखता है
तत
उससे
एव
ही
च
और
विस्तारम्
विस्तार को
ब्रह्म
ब्रह्म
सम्पद्यते
प्राप्त हो जाता है
तदा
तब
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जब मनुष्य यह देख लेता है कि सम्पूर्ण प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव एक (ब्रह्म) में ही स्थित हैं और उसी से उनका विस्तार हुआ है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जब साधक यह अनुभव कर लेता है कि सब वस्तुएँ एक ही ब्रह्म से उत्पन्न और उसी में स्थित हैं, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। When one realizes that all diversity arises from and rests in the One Brahman, one attains Brahman.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जब मनुष्य यह देख लेता है कि समस्त प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव एक (ब्रह्म) में ही स्थित हैं और उसी से उनका विस्तार हुआ है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
When a man realizes that the diversity of beings rests in the One and that their expansion is from That alone, he then attains Brahman.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
एकत्व का अनुभव ही ब्रह्मप्राप्ति है।
The experience of oneness is the attainment of Brahman.