श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 31

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 99 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || ३१ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
यदा
जब
भूतपृथग्भावम्
भूतों के पृथक्-पृथक् भाव को
एकस्थम्
एक में स्थित
अनुपश्यति
देखता है
तत
उससे
एव
ही
च
और
विस्तारम्
विस्तार को
ब्रह्म
ब्रह्म
सम्पद्यते
प्राप्त हो जाता है
तदा
तब

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जब मनुष्य यह देख लेता है कि सम्पूर्ण प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव एक (ब्रह्म) में ही स्थित हैं और उसी से उनका विस्तार हुआ है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जब साधक यह अनुभव कर लेता है कि सब वस्तुएँ एक ही ब्रह्म से उत्पन्न और उसी में स्थित हैं, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। When one realizes that all diversity arises from and rests in the One Brahman, one attains Brahman.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जब मनुष्य यह देख लेता है कि समस्त प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव एक (ब्रह्म) में ही स्थित हैं और उसी से उनका विस्तार हुआ है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

When a man realizes that the diversity of beings rests in the One and that their expansion is from That alone, he then attains Brahman.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

एकत्व का अनुभव ही ब्रह्मप्राप्ति है।

The experience of oneness is the attainment of Brahman.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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