श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 30

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 115 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः | यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति || ३० ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
प्रकृत्या
प्रकृति द्वारा
एव
ही
च
और
कर्माणि
कर्म
क्रियमाणानि
किये जाते हुए
सर्वशः
सब प्रकार से
य
जो
पश्यति
देखता है
तथा
तथा
आत्मानम्
आत्मा को
अकर्तारम्
अकर्ता
स
वह
पश्यति
देखता है

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो यह देखता है कि सम्पूर्ण कर्म प्रकृति द्वारा ही किये जा रहे हैं और आत्मा अकर्ता है, वही यथार्थ देखता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यथार्थ दृष्टि वह है जिसमें सभी क्रियाएँ प्रकृति को अर्पित कर दी जाती हैं और आत्मा को निर्लिप्त देखा जाता है। True vision is attributing all actions to Prakriti and seeing the Self as actionless.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो यह देखता है कि सम्पूर्ण कर्म प्रकृति द्वारा ही किये जा रहे हैं और आत्मा अकर्ता है, वही यथार्थ देखता है।

He who sees that all actions are performed by Prakriti alone, and that the Self is actionless, he alone sees (the truth).

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मा नित्य अकर्ता है, सभी क्रियाएँ प्रकृति की हैं। यह विवेक ही बंधन से मुक्त कराता है।

The Self is eternally actionless; all actions belong to Prakriti. This discernment liberates one from bondage.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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श्लोक 30/35 86% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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