मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् | न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् || २९ ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदसमम्
समान
पश्यन्
देखता हुआ
हि
निश्चय ही
सर्वत्र
सर्वत्र
समवस्थितम्
समभाव से स्थित
ईश्वरम्
ईश्वर को
न
नहीं
हिनस्ति
हिंसा करता
आत्मना
अपने द्वारा
आत्मानम्
आत्मा को
तत
इसलिए
याति
जाता है
पराम्
परम
गतिम्
गति को
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
क्योंकि वह सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, इसलिए वह अपने द्वारा अपनी आत्मा की हिंसा नहीं करता (अर्थात् आत्मा को शरीर समझकर उसका अहित नहीं करता) और तब परमगति को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जो सबमें एक ईश्वर को देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता और न ही अपने वास्तविक स्वरूप को भूलता है। This leads to the supreme goal. One who sees the one God in all does not hate anyone nor forget his own true nature, and thus attains the highest.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखने वाला अपने द्वारा आत्मा की हिंसा नहीं करता और इस प्रकार परमगति को प्राप्त होता है।
Seeing the same Lord existing equally everywhere, he does not injure the Self by the self; and thus he attains the supreme goal.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
समदर्शन से अहंकार और द्वेष मिटते हैं और मोक्ष मिलता है।
Equal vision eradicates ego and hatred, leading to liberation.