मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदब्रह्मणः
ब्रह्म का
हि
निश्चय ही
प्रतिष्ठा
आधार
अहम्
मैं हूँ
अमृतस्य
अमृत का
अव्ययस्य
अविनाशी का
च
और
शाश्वतस्य
शाश्वत का
च
और
धर्मस्य
धर्म का
सुखस्य
सुख का
एकान्तिकस्य
एकान्त (परम) का
च
और।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
क्योंकि मैं ही ब्रह्म (वेदों का प्रतिपाद्य) का, अमृत का, अविनाशी का, शाश्वत धर्म का और एकान्त सुख का आधार (प्रतिष्ठा) हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान स्वयं को परब्रह्म, अमृत, शाश्वत धर्म और परम सुख का आश्रय बताते हैं। अतः भक्तियोग द्वारा वे ही प्राप्त होते हैं। The Lord declares Himself to be the support of Brahman, immortality, eternal Dharma, and absolute bliss. Thus, by devotion one attains Him.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: क्योंकि मैं ही ब्रह्म (वेदों का प्रतिपाद्य) का, अमृत का, अविनाशी का, शाश्वत धर्म का और एकान्त सुख का आधार हूँ। For I am the support of Brahman, the immortal and immutable, of eternal Dharma, and of absolute bliss.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान ही सब कुछ हैं। वे ही परम लक्ष्य हैं। उनकी भक्ति से सब कुछ प्राप्त होता है। The Lord is everything; He is the supreme goal. By devotion to Him, everything is attained.