श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 26

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
माम्
मुझको
च
और
यः
जो
अव्यभिचारेण
अव्यभिचार (निष्काम) भाव से
भक्तियोगेन
भक्तियोग द्वारा
सेवते
सेवा करता है
सः
वह
गुणान्
गुणों को
समतीत्य
सम्यक प्रकार से अतिक्रम करके
एतान्
इन
ब्रह्मभूयाय
ब्रह्म होने के लिए
कल्पते
उपयुक्त हो जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

और जो अव्यभिचार (निष्काम) भक्तियोग द्वारा मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभाव को प्राप्त होने योग्य हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

गुणों से परे जाने का सीधा उपाय भक्ति है। निष्काम भक्त गुणातीत होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। The direct means to transcend the gunas is unwavering devotion; such a devotee becomes Brahman.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: और जो मेरा अव्यभिचार भक्तियोग से सेवन करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभूत होने के योग्य हो जाता है। He who serves Me with unwavering devotion, transcending these gunas, becomes fit for becoming Brahman.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति सबसे सरल उपाय है गुणों से परे जाने का। Bhakti is the easiest way to transcend the gunas.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 26/27 96% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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