मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदमाम्
मुझको
च
और
यः
जो
अव्यभिचारेण
अव्यभिचार (निष्काम) भाव से
भक्तियोगेन
भक्तियोग द्वारा
सेवते
सेवा करता है
सः
वह
गुणान्
गुणों को
समतीत्य
सम्यक प्रकार से अतिक्रम करके
एतान्
इन
ब्रह्मभूयाय
ब्रह्म होने के लिए
कल्पते
उपयुक्त हो जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
और जो अव्यभिचार (निष्काम) भक्तियोग द्वारा मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभाव को प्राप्त होने योग्य हो जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गुणों से परे जाने का सीधा उपाय भक्ति है। निष्काम भक्त गुणातीत होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। The direct means to transcend the gunas is unwavering devotion; such a devotee becomes Brahman.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: और जो मेरा अव्यभिचार भक्तियोग से सेवन करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभूत होने के योग्य हो जाता है। He who serves Me with unwavering devotion, transcending these gunas, becomes fit for becoming Brahman.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति सबसे सरल उपाय है गुणों से परे जाने का। Bhakti is the easiest way to transcend the gunas.