श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 25

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 100 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
मान-अपमानयोः
मान और अपमान में
तुल्यः
समान
तुल्यः
समान
मित्र-अरि-पक्षयोः
मित्र और शत्रु के पक्ष में
सर्वारम्भ-परित्यागी
सब आरम्भों (कर्मों) का त्यागी
गुणातीतः
गुणातीत
सः
वह
उच्यते
कहा जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान है, और सब आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

गुणातीत पुरुष मान-अपमान, मित्र-शत्रु में समान रहता है और किसी भी सकाम कर्म का आरम्भ नहीं करता। The transcendent one is equal in honour/dishonour, friend/foe, and has renounced all selfish undertakings.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान है, और सब आरम्भों (सकाम कर्मों) का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है। He who is same in honour and dishonour, same to friend and foe, and who has renounced all undertakings—he is called transcendent of the gunas.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुणातीत पुरुष द्वन्द्वों से परे होता है और निष्काम भाव से रहता है। The transcendent one is beyond all dualities and lives desirelessly.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 25/27 93% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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