मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदमान-अपमानयोः
मान और अपमान में
तुल्यः
समान
तुल्यः
समान
मित्र-अरि-पक्षयोः
मित्र और शत्रु के पक्ष में
सर्वारम्भ-परित्यागी
सब आरम्भों (कर्मों) का त्यागी
गुणातीतः
गुणातीत
सः
वह
उच्यते
कहा जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान है, और सब आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गुणातीत पुरुष मान-अपमान, मित्र-शत्रु में समान रहता है और किसी भी सकाम कर्म का आरम्भ नहीं करता। The transcendent one is equal in honour/dishonour, friend/foe, and has renounced all selfish undertakings.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान है, और सब आरम्भों (सकाम कर्मों) का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है। He who is same in honour and dishonour, same to friend and foe, and who has renounced all undertakings—he is called transcendent of the gunas.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
गुणातीत पुरुष द्वन्द्वों से परे होता है और निष्काम भाव से रहता है। The transcendent one is beyond all dualities and lives desirelessly.