मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
6 पदसमदुःखसुखः
दुःख-सुख में समान
स्वस्थः
अपने में स्थित
समलोष्टाश्मकाञ्चनः
मिट्टी, पत्थर और सोने में समान
तुल्यप्रियाप्रियः
प्रिय और अप्रिय में समान
धीरः
धीर
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः
निन्दा और आत्म-स्तुति में समान।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो दुःख-सुख में समान है, स्वस्थ (आत्मस्थ) है, मिट्टी, पत्थर और सोने में समान है, प्रिय-अप्रिय में तुल्य है, धीर है, और निन्दा-स्तुति में समान है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गुणातीत पुरुष में ये समताएँ होती हैं। The transcendent one possesses equanimity in all dualities.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: जो दुःख-सुख में समान है, अपने आप में स्थित है, मिट्टी, पत्थर और सोने में समान है, प्रिय-अप्रिय में समान, धीर, और निन्दा-स्तुति में समान है। He who is the same in pain and pleasure, self-abiding, to whom a clod, stone, and gold are alike, same in pleasant-unpleasant, firm, and same in censure and praise.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह समत्व ही योग है। यह गुणातीत अवस्था का सूचक है। This equanimity is yoga; it indicates the state beyond gunas.