श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 23

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
उदासीनवत्
उदासीन के समान
आसीनः
स्थित
गुणैः
गुणों द्वारा
यः
जो
न
नहीं
विचाल्यते
विचलित किया जाता
गुणाः
गुण
वर्तन्ते
व्यवहार कर रहे हैं
इति एव
ऐसा ही
यः
जो
अवतिष्ठति
स्थित रहता है
न
नहीं
इङ्गते
चलायमान होता।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो उदासीन के समान स्थित है, गुणों द्वारा विचलित नहीं होता, और "गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं" - ऐसा जानकर जो स्थित रहता है और न तो हिलता है...

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

गुणातीत पुरुष गुणों के कार्यों को देखकर भी निष्क्रिय साक्षी बना रहता है। He remains like a witness, thinking that the gunas are acting among themselves, and is not moved.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: जो उदासीन की भाँति बैठा है, गुणों द्वारा विचलित नहीं होता, और यह जानकर कि "गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं" स्थित रहता है और चलायमान नहीं होता। He who sits like one unconcerned, not disturbed by the gunas, thinking "the gunas act," and remains steady and unmoved.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह साक्षी भाव ही गुणातीतता की कुंजी है। This witness attitude is the key to transcending the gunas.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 23/27 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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