मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदउदासीनवत्
उदासीन के समान
आसीनः
स्थित
गुणैः
गुणों द्वारा
यः
जो
न
नहीं
विचाल्यते
विचलित किया जाता
गुणाः
गुण
वर्तन्ते
व्यवहार कर रहे हैं
इति एव
ऐसा ही
यः
जो
अवतिष्ठति
स्थित रहता है
न
नहीं
इङ्गते
चलायमान होता।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो उदासीन के समान स्थित है, गुणों द्वारा विचलित नहीं होता, और "गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं" - ऐसा जानकर जो स्थित रहता है और न तो हिलता है...
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गुणातीत पुरुष गुणों के कार्यों को देखकर भी निष्क्रिय साक्षी बना रहता है। He remains like a witness, thinking that the gunas are acting among themselves, and is not moved.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: जो उदासीन की भाँति बैठा है, गुणों द्वारा विचलित नहीं होता, और यह जानकर कि "गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं" स्थित रहता है और चलायमान नहीं होता। He who sits like one unconcerned, not disturbed by the gunas, thinking "the gunas act," and remains steady and unmoved.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह साक्षी भाव ही गुणातीतता की कुंजी है। This witness attitude is the key to transcending the gunas.