मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदश्रीभगवानुवाच
भगवान् ने कहा
प्रकाशम्
प्रकाश (सत्त्व के कार्य)
च
और
प्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति (रज के कार्य)
च
और
मोहम्
मोह (तम के कार्य)
एव
ही
च
और
पाण्डव
हे पाण्डव
न
नहीं
द्वेष्टि
द्वेष करता है
सम्प्रवृत्तानि
प्राप्त होने पर
न
नहीं
निवृत्तानि
निवृत्त होने पर
काङ्क्षति
इच्छा करता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: हे पाण्डव! जो प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) के प्राप्त होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके निवृत्त होने पर उनकी इच्छा नहीं करता...
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गुणातीत पुरुष गुणों के आने-जाने पर न तो द्वेष करता है, न आसक्ति। The transcendent one neither hates the gunas when they appear nor desires them when they vanish.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: हे पाण्डव! जो पुरुष प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) के उपस्थित होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके चले जाने पर उनकी इच्छा नहीं करता... The Lord said: O Pandava, he who does not hate illumination, activity, and delusion when they appear, nor longs for them when they disappear...
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
गुणातीत पुरुष गुणों के उतार-चढ़ाव से अप्रभावित रहता है, वह साक्षी भाव में स्थित रहता है। The transcendent one remains unaffected by the play of gunas, abiding as a witness.