मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदऊर्ध्वमूलम्
ऊपर मूल (जड़) वाला
अधःशाखम्
नीचे शाखाओं वाला
अश्वत्थम्
पीपल का वृक्ष
प्राहुः
कहते हैं
अव्ययम्
अविनाशी
छन्दांसि
वेद (छन्द)
यस्य
जिसके
पर्णानि
पत्ते
यः
जो
तम्
उस (वृक्ष) को
वेद
जानता है
सः
वह
वेदवित्
वेदों का ज्ञाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
ऊपर मूल (जड़) और नीचे शाखाओं वाले अविनाशी पीपल के वृक्ष की बात कहते हैं, जिसके पत्ते वेद हैं; जो उसे जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन करता है, जिसकी जड़ें ब्रह्म में हैं और शाखाएँ संसार में फैली हैं। इस वृक्ष को जानना ही वेदों का सार जानना है। This verse describes the world as an inverted Ashvattha tree, with its roots in the Supreme and branches in the material world. Knowing this tree is knowing the essence of the Vedas.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस श्लोक में भगवान कृष्ण संसार की तुलना एक अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष से करते हैं, जो अविनाशी है, लेकिन उल्टा दिखता है – जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे। इसकी पत्तियाँ वेद हैं। जो इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, वही वेदों का तत्त्व जानने वाला है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह वृक्ष माया का प्रतीक है। इसकी जड़ें परब्रह्म में हैं, परंतु यह उल्टा दिखता है, जैसे वृक्ष का प्रतिबिंब जल में उल्टा दिखता है। वेद इसके पत्ते हैं, अर्थात वेद इसी संसार के विस्तार का वर्णन करते हैं। इस वृक्ष को काटने के लिए वैराग्य रूपी शस्त्र की आवश्यकता होती है।