मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदअधः
नीचे
च
और
ऊर्ध्वम्
ऊपर
प्रसृताः
फैली हुई
तस्य
उसकी
शाखा
शाखाएँ
गुणप्रवृद्धा
गुणों से बढ़ी हुई
विषयप्रवालाः
इंद्रिय-विषय रूपी कोंपलें (पत्ते)
अधः
नीचे
च
भी
मूलानि
जड़ें
अनुसन्ततानि
फैली हुई
कर्मानुबन्धीनि
कर्मों से बँधी हुई
मनुष्यलोके
मनुष्य लोक में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हैं, जो तीन गुणों से पोषित हैं और जिनके कोपलें (पत्ते) इंद्रियों के विषय हैं। तथा नीचे की ओर मनुष्य लोक में कर्मों से बँधी हुई जड़ें फैली हुई हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इस श्लोक में अश्वत्थ वृक्ष की शाखाओं और जड़ों का विस्तार बताया गया है। शाखाएँ (उच्च और निम्न लोक) गुणों से पोषित हैं और इंद्रिय-विषय इनके पत्ते हैं। मनुष्य लोक में कर्मों के रूप में जड़ें और फैली हैं। यह संसार-चक्र का वर्णन है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण आगे बताते हैं कि इस संसार-वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे फैली हैं। ये शाखाएँ तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से पोषित होती हैं, और इन पर इंद्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) पत्तों के समान लगे हैं। नीचे मनुष्य लोक में कर्मों के रूप में और जड़ें फैलती हैं, जो मनुष्य को कर्मों में बाँधती हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह संसार का विस्तार गुणों और विषयों के माध्यम से होता है। मनुष्य इन विषयों में उलझकर कर्म करता है, जो नए-नए बंधन उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार वह जन्म-मरण के चक्र में फँसता जाता है।