मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदन
नहीं
रूपम्
रूप
अस्य
इसका
इह
इस संसार में
तथा
उस प्रकार
उपलभ्यते
प्राप्त होता है (दिखता है)
न
नहीं
अन्तः
अंत
न
नहीं
च
और
आदिः
आदि
न
नहीं
च
और
सम्प्रतिष्ठा
स्थिर आधार
अश्वत्थम्
अश्वत्थ वृक्ष
एनम्
इस
सुविरूढमूलम्
दृढ़ जड़ों वाला
असङ्गशस्त्रेण
वैराग्य रूपी शस्त्र से
दृढेन
दृढ़
छित्त्वा
काटकर।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस (वृक्ष) का वास्तविक रूप इस संसार में उस प्रकार नहीं दिखता, न इसका अंत, न आदि और न ही स्थिर आधार। इस दृढ़ जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से काटकर...
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इस वृक्ष का वास्तविक स्वरूप (कि यह माया है) समझना कठिन है। इसका न आदि है, न अंत, और न ही कोई स्थिर आधार। यह दृढ़ जड़ों वाला है, परंतु इसे वैराग्य रूपी शस्त्र से काटा जा सकता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं कि इस संसार-वृक्ष (अश्वत्थ) का वास्तविक रूप यहाँ नहीं दिखता। इसका न आदि है, न अंत, और न ही कोई स्थिर आधार। यह दृढ़ जड़ों वाला है, परंतु इसे दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से काट डालना चाहिए।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह संसार माया से बना है, अतः इसका वास्तविक स्वरूप समझना कठिन है। इसके बंधन से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है प्रबल वैराग्य – विषयों में आसक्ति का त्याग। वैराग्य ही वह शस्त्र है जो अज्ञान रूपी वृक्ष को काट सकता है।