श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 4

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 3 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
ततः
उसके बाद
पदम्
स्थान (परम पद)
तत्
उस
परिमार्गितव्यम्
खोजना चाहिए
यस्मिन्
जहाँ
गता
जाकर
न
नहीं
निवर्तन्ति
लौटते
भूयः
फिर
तम्
उस
एव
ही
च
और
आद्यम्
आदि (मूल) पुरुष
प्रपद्ये
मैं समर्पित होता हूँ (शरण लेता हूँ)
यतः
जिससे
प्रवृत्तिः
प्रवृत्ति (सृष्टि)
प्रसृता
फैली
पुराणी
सनातन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

तत्पश्चात उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद फिर लौटना नहीं पड़ता। मैं उस आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह सनातन प्रवृत्ति (सृष्टि) फैली है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

संसार-वृक्ष को काटने के बाद, साधक को उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ से लौटना नहीं होता। वह आदि पुरुष ही परमात्मा है, जिससे यह सृष्टि प्रवाहित हुई है। उसी की शरण लेनी चाहिए।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि वैराग्य से इस वृक्ष को काटने के बाद, उस परम पद (धाम) की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद जीव फिर से संसार में नहीं लौटता। वह परम पद उस आदि पुरुष (परमात्मा) का है, जिससे यह सनातन सृष्टि फैली है। उसी की शरण लेनी चाहिए।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मोक्ष का मार्ग है – पहले संसार से वैराग्य, फिर परमात्मा की शरण में जाना। परमात्मा ही सृष्टि का मूल स्रोत हैं, उनकी शरण लेने से जीव जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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