मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदनिर्मानमोहा
मान और मोह से रहित
जितसङ्गदोषा
संग के दोषों को जीतने वाले
अध्यात्मनित्या
अध्यात्म में नित्य लगे रहने वाले
विनिवृत्तकामाः
कामनाओं से सर्वथा रहित
द्वन्द्वैः
द्वंद्वों से
विमुक्ताः
मुक्त
सुखदुःखसंज्ञैः
सुख-दुःख नामक
गच्छन्ति
जाते हैं
अमूढाः
मूढ़ता रहित (ज्ञानी जन)
पदम्
पद को
अव्ययम्
अविनाशी
तत्
उस।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो मान और मोह से रहित हैं, संग के दोषों को जीत चुके हैं, अध्यात्म में नित्य लगे रहते हैं, कामनाओं से सर्वथा विमुख हो गए हैं, और सुख-दुःख रूपी द्वंद्वों से मुक्त हैं, वे अमूढ़ (ज्ञानी) जन उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इस श्लोक में उन साधकों के गुण बताए गए हैं जो परम पद को प्राप्त करते हैं: वे अहंकार और मोह से मुक्त, आसक्ति के दोषों से रहित, निरंतर आत्म-चिंतन में लीन, कामनाओं से रहित, सुख-दुःख से परे और ज्ञानी होते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो साधक अहंकार और मोह से रहित हैं, आसक्ति के दोष को जीत चुके हैं, अध्यात्म (आत्म-ज्ञान) में नित्य तत्पर रहते हैं, कामनाओं से पूर्णतः विरत हैं, तथा सुख-दुःख रूपी द्वंद्वों से मुक्त हैं – वे ऐसे ज्ञानी जन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
परमात्मा की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि साधक इन दोषों से मुक्त हो। ये गुण आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में सहायक होते हैं। सुख-दुःख के द्वंद्व से परे होना ही स्थितप्रज्ञता का लक्षण है।