मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदअर्जुन
Arjuna
उवाच
said
संन्यासस्य
of renunciation
महाबाहो
O mighty-armed
तत्त्वम्
the truth
इच्छामि
I wish
वेदितुम्
to know
त्यागस्य
of abandonment
च
and
हृषीकेश
O Hrishikesha
पृथक्
separately
केशिनिषूदन
O killer of Keshi.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्जुन बोले: हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्याग का तत्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन का प्रश्न गीता के अंतिम अध्याय का प्रारंभ है। वह संन्यास (कर्मों का त्याग) और त्याग (फल का त्याग) के बीच अंतर जानना चाहते हैं। यह जिज्ञासा आध्यात्मिक साधना के उच्चतम बिंदु को स्पर्श करती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से संन्यास और त्याग के तत्व को अलग-अलग जानने की इच्छा व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि हे महाबाहु, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, कृपया मुझे इन दोनों का यथार्थ स्वरूप बताएं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
साधक के लिए यह समझना आवश्यक है कि केवल कर्मों का त्याग (संन्यास) और फल का त्याग (त्याग) में क्या अंतर है। अर्जुन की यह जिज्ञासा हर साधक के मन में उठनी चाहिए।