मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदयत्र
where
योग-ईश्वरः
the Lord of Yoga
कृष्णः
Krishna
यत्र
where
पार्थः
Partha
धनुः-धरः
the archer
तत्र
there
श्रीः
prosperity
विजयः
victory
भूतिः
opulence
ध्रुवा
certain
नीतिः
policy
मतिः
opinion
मम
my.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ श्री (लक्ष्मी), विजय, भूति (ऐश्वर्य) और ध्रुव नीति (निश्चित नीति) है – ऐसा मेरा मत है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गीता का यह अन्तिम श्लोक है। सञ्जय अपना अन्तिम कथन करते हैं कि जहाँ कृष्ण और अर्जुन हैं, वहाँ सम्पत्ति, विजय, ऐश्वर्य और नीति निश्चित है। यह धृतराष्ट्र के पक्ष की हार का संकेत भी है, क्योंकि कृष्ण-अर्जुन पाण्डव पक्ष में हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ श्री (लक्ष्मी), विजय, भूति (ऐश्वर्य) और ध्रुव नीति (निश्चित नीति) है – ऐसा मेरा मत है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक गीता के सन्देश को सार रूप में बताता है कि भगवान् और उनके भक्त की उपस्थिति में सब शुभ की सिद्धि होती है। यह विजय का मन्त्र है।