श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 77

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥७७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
तत्
that
च
and
संस्मृत्य संस्मृत्य
remembering again and again
रूपम्
form
अति-अद्भुतम्
most wonderful
हरेः
of Hari (Krishna)
विस्मयः
wonder
मे
my
महान्
great
राजन्
O King
हृष्यामि
I rejoice
च
and
पुनः पुनः
again and again.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

और हरि के उस अत्यद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके, हे राजन्, मुझे बड़ा विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सञ्जय विशेष रूप से भगवान् के विश्वरूप को स्मरण करते हैं (जो अध्याय 11 में दिखाया गया था) और उससे उत्पन्न विस्मय और हर्ष को व्यक्त करते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

और हरि के उस अत्यद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके, हे राजन्, मुझे बड़ा विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के दिव्य स्वरूप का स्मरण विस्मय और आनन्द से भर देता है। यह भक्ति की अनुभूति है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 77 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 77/78 99% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!