मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥७७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदतत्
that
च
and
संस्मृत्य संस्मृत्य
remembering again and again
रूपम्
form
अति-अद्भुतम्
most wonderful
हरेः
of Hari (Krishna)
विस्मयः
wonder
मे
my
महान्
great
राजन्
O King
हृष्यामि
I rejoice
च
and
पुनः पुनः
again and again.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
और हरि के उस अत्यद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके, हे राजन्, मुझे बड़ा विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सञ्जय विशेष रूप से भगवान् के विश्वरूप को स्मरण करते हैं (जो अध्याय 11 में दिखाया गया था) और उससे उत्पन्न विस्मय और हर्ष को व्यक्त करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
और हरि के उस अत्यद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके, हे राजन्, मुझे बड़ा विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के दिव्य स्वरूप का स्मरण विस्मय और आनन्द से भर देता है। यह भक्ति की अनुभूति है।