श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 13

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 33 मिनट का पठन 136 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा | तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ||१३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
देहिनः
शरीरी (आत्मा) की
अस्मिन्
इस
यथा
जैसे
देहे
शरीर में
कौमारम्
बचपन
यौवनम्
जवानी
जरा
बुढ़ापा
तथा
वैसे ही
देहान्तरप्राप्तिः
दूसरे शरीर की प्राप्ति
धीरः
धीर पुरुष
तत्र
उसमें
न
नहीं
मुह्यति
मोहित होता।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे इस शरीर में आत्मा को बचपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होता है, वैसे ही उसे दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होते।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को समस्त उपनिषदों का सार माना गया है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश केवल एक युद्धभूमि के संवाद मात्र नहीं हैं, बल्कि यह मानव मात्र के लिए अस्तित्व, चेतना, आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्गदर्शक ग्रंथ है। जब-जब मनुष्य जीवन की अनिश्चितताओं, प्रियजनों की मृत्यु के शोक, और भविष्य के अज्ञात भय से घिरता है, तब-तब गीता के श्लोक संजीवनी बूटी का कार्य करते हैं। द्वितीय अध्याय, जिसे 'सांख्य योग' कहा जाता है, उसकी आधारशिला इसी महान श्लोक पर टिकी है— "देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति"।

इस ब्रह्मांड में भौतिक शरीर नश्वर है और आत्मा अमर। आधुनिक विज्ञान जहाँ केवल पदार्थ (Matter) और ऊर्जा (Energy) के संरक्षण के नियम की बात करता है, वहीं वैदिक विज्ञान चेतना (Consciousness) के निरंतर प्रवाह की व्याख्या करता है। मनुष्य का जीवन एक सतत परिवर्तन की प्रक्रिया है। जन्म से लेकर मृत्यु तक शरीर की हर कोशिका बदलती है, परंतु 'मैं कौन हूँ'—यह बोध जस का तस बना रहता है। यही 'मैं' यानी आत्मा (Dehi) जब इस जीर्ण-शीर्ण वस्त्र रूपी शरीर को त्यागती है, तो उसे मृत्यु नहीं बल्कि एक नई यात्रा का आरंभ कहा गया है। इस श्लोक का चिंतन न केवल हमारे भीतर वैराग्य और स्थिरता को जन्म देता है, बल्कि जीवन के हर पड़ाव पर उत्पन्न होने वाले अवसाद, मोह, और शोक रूपी अंधकार को भी जड़ से उखाड़ फेंकने की अद्भुत क्षमता रखता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर पाठ विधि

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥


श्लोक का उच्चारण एवं पाठ विधि:

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना अत्यंत फलदायी माना गया है। श्लोक का उच्चारण करते समय स्पष्टता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। प्रत्येक शब्द का उच्चारण करते समय इसके भीतर छिपे दार्शनिक अर्थ का अपने हृदय में स्मरण करें। नियमित रूप से इस श्लोक का 108 बार मानसिक जप करने से मस्तिष्क की चंचलता शांत होती है और मन में अगाध शांति का संचार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

प्रत्येक संस्कृत शब्द अपने भीतर एक विराट ब्रह्मांडीय सत्य को समेटे हुए है। आइए, इस श्लोक के एक-एक पद के सूक्ष्म अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
देहिनः शरीरधारी (आत्मा) का वह चेतना जो शरीर में निवास करती है, अर्थात अमर आत्मा, जो नाशवान नहीं है।
अस्मिन् इस (वर्तमान) इस प्रत्यक्ष दिखने वाले भौतिक शरीर के भीतर।
यथा जैसे, जिस प्रकार संसार के नियमों और प्राकृतिक चक्रों का एक स्पष्ट दृष्टांत।
देहे शरीर में भौतिक पिंड, जिसमें हड्डियां, मांस, रक्त और इंद्रियां सम्मिलित हैं।
कौमारम् बचपन (बाल्यावस्था) जीवन का वह शुरुआती दौर, जिसमें अज्ञानता, खेलकूद और माता-पिता पर निर्भरता होती है।
यौवनम् जवानी (युवावस्था) शारीरिक ऊर्जा, महत्वाकांक्षा, कर्मशीलता और आवेग से भरा जीवन का मध्यकाल।
जरा बुढ़ापा (जीर्णता) शरीर का शिथिल होना, बालों का सफेद होना और ऊर्जा का क्षीण होना।
तथा वैसे ही, इसी प्रकार नियम की एकरूपता, जो शरीर के भीतर और बाहर दोनों जगह लागू होती है।
देहान्तरप्राप्तिः अन्य शरीर की प्राप्ति (मृत्यु और पुनर्जन्म) आत्मा द्वारा पुराने वस्त्र की भांति जीर्ण शरीर को त्यागकर नया शरीर ग्रहण करना।
धीरः धैर्यवान, ज्ञानी, विवेकशील पुरुष वह व्यक्ति जो परिस्थितियों से विचलित नहीं होता और सत्यों को गहराई से समझता है।
तत्र उस विषय में, उस अवसर पर मृत्यु या परिवर्तन के इस मार्मिक और अवश्यभावी क्षण में।
न मुह्यति मोहित नहीं होता (शोक नहीं करता) मोह माया के पाश से मुक्त होकर मानसिक शांति और समता की स्थिति में रहना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के महायुद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब कौरव और पांडव सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मसंकट में फँसे अर्जुन ने अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे रख दिए थे। अर्जुन के मन में अपने ही गुरुओं (द्रोणाचार्य, कृपाचार्य), पितामह (भीष्म) और सगे-सम्बन्धियों को युद्ध में सामने देखकर असीम मोह, करुणा और विषाद उत्पन्न हो गया था। अर्जुन का शरीर कांप रहा था, उनका गांडीव धनुष हाथ से छूट रहा था और वे श्रीकृष्ण से कहते हैं कि अपनों को मारकर मुझे किसी भी राज्य या सुख की प्राप्ति की कोई इच्छा नहीं है।

उस अत्यंत नाजुक और ऐतिहासिक क्षण में, भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के इस कायरतापूर्ण मोह को तोड़ने के लिए 'सांख्य योग' का उपदेश दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन की इस मूर्खता पर कटाक्ष किया कि ऐसे समय में तुम्हारे मन में यह अज्ञानता कहाँ से उत्पन्न हुई, जो आर्यों के अनुकूल नहीं है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि जिसे तुम अपना मान रहे हो, वह केवल नाशवान मांस और हड्डियों का ढांचा है। वास्तविक सत्य यह है कि आत्मा अचल, अमर और अछूती है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीरों को छोड़कर नए शरीर को प्राप्त करती है। इस पृष्ठभूमि में यह श्लोक अर्जुन के अज्ञान को दूर करने और उसे उसके क्षत्रिय धर्म का पालन करने के लिए प्रेरित करने वाला सबसे बड़ा आध्यात्मिक संबल बना।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

1. मृत्यु के भय से मुक्ति

इस श्लोक के नियमित चिंतन से मनुष्य के मन से मृत्यु का प्राकृतिक भय समाप्त हो जाता है और वह जीवन की वास्तविकता को सहज स्वीकार करता है।

2. मानसिक शांति एवं स्थिरता

जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख और लाभ-हानि में मन विचलित नहीं होता, और व्यक्ति 'धीर' (संयमी) पुरुष की भाँति स्थिर रहता है।

3. प्रियजनों की वियोग पीड़ा में राहत

किसी अपने की मृत्यु पर होने वाले अत्यधिक शोक और मानसिक अवसाद से उबरने के लिए यह श्लोक एक महान सांत्वना और मानसिक औषधि का कार्य करता है।

4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्लोक के सस्वर पाठ से आसपास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और नकारात्मक विचार स्वतः नष्ट होने लगते हैं।

5. कर्म प्रधान जीवन की प्रेरणा

शरीर की नश्वरता का बोध होने पर व्यक्ति समय के सदुपयोग और निष्काम कर्म (बिना फल की चिंता किए कार्य करने) की प्रवृत्ति की ओर अग्रसर होता है।

6. आत्म-साक्षात्कार की यात्रा

यह श्लोक व्यक्ति को 'देह' और 'देही' (शरीर और आत्मा) के भेद को समझाते हुए आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) के मार्ग पर प्रशस्त करता है।

7. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

ईश्वर के वचनों का स्मरण करने से चित्त शुद्ध होता है और पिछले संचित पाप कर्मों के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

8. दिव्य कृपा और भगवद् प्राप्ति

नियमित रूप से गीता के वचनों को जीवन में उतारने से भगवान श्रीकृष्ण की असीम कृपा और आशीर्वाद साधक को प्राप्त होता है.

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) का गहन अध्ययन करके प्रस्तुत किया गया है। Bhaktilok.in के हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और शोधकर्ताओं ने यह सुनिश्चित किया है कि पाठकों तक सनातन धर्म के वास्तविक और शुद्ध दार्शनिक संदेश पहुंचे। हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि वेदों के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्यों को सहज हिंदी भाषा में जन-जन तक पहुँचाना है। सभी श्लोकों के अर्थ पारंपरिक संस्कृत व्याकरण और प्रामाणिक टीकाओं के आधार पर सत्यापित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि शरीर परिवर्तनशील और नश्वर है (बचपन से जवानी, और जवानी से बुढ़ापा), तथा अंततः मृत्यु के बाद यह नए शरीर को प्राप्त होता है। इसके विपरीत, आत्मा अमर और नित्य है। इसलिए ज्ञानी पुरुष (धीर) शरीर के बदलने या मृत्यु पर मोह या शोक नहीं करते हैं।

यहाँ 'धीर' शब्द का अर्थ धैर्यवान, विवेकशील, और आत्मज्ञानी पुरुष से है। जो व्यक्ति जीवन और मरण के सत्य को भली-भांति समझ चुका होता है, और सुख-दुःख या परिस्थितियों के आगे मानसिक रूप से विचलित नहीं होता, उसे 'धीर' कहा गया है।

हाँ, यह श्लोक शोक संतप्त व्यक्तियों के लिए सबसे बड़ा आध्यात्मिक संबल है। यह हमें यह स्मरण कराता है कि आत्मा अ अमर है और केवल शरीर बदला है, जिससे मृत्यु के बाद उत्पन्न होने वाले अत्यधिक मानसिक आघात और मोह से उबरने में सहायता मिलती है।

यह प्रसिद्ध श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का 13वां श्लोक है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा और शरीर का तात्विक ज्ञान दिया है।

दैनिक जीवन में यह श हमें बुढ़ापे, शारीरिक परिवर्तनों, और जीवन की अनिश्चितताओं को सहजता से स्वीकार करने की प्रेरणा देता है। यह हमें सिखाता है कि हम शरीर से परे अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान (आत्मा) पर ध्यान केंद्रित करें।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे इस शरीर में आत्मा बचपन, जवानी और बुढ़ापे को प्राप्त होती है, वैसे ही मृत्यु के बाद वह एक नया शरीर प्राप्त करती है। धीर पुरुष इस परिवर्तन से विचलित नहीं होते। Just as the soul passes through childhood, youth, and old age in this body, so it passes to another body after death. The wise are not deluded by this change.

शिक्षा / Lesson

शरीर का बदलना स्वाभाविक है। मृत्यु वस्त्र परिवर्तन के समान है। अतः शोक का कोई कारण नहीं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/72 18% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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