श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 14

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 38 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ||१४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
मात्रास्पर्शाः
इन्द्रिय और विषयों के संयोग
तु
तो
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
शीतोष्णसुखदुःखदाः
सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख देने वाले
आगमापायिनः
आते-जाते रहने वाले
अनित्याः
अनित्य
तान्
उन्हें
तितिक्षस्व
सहन करो
भारत
हे भारत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों के विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख तो आते-जाते रहते हैं और अनित्य हैं। हे भारत! तू उन्हें सहन कर।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय (सांख्य योग)

Bhaktilok.in's Chief Devotional Scholar & Sanskrit Linguistic Presentation

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय संदर्भ

सनातन धर्म के सार्वकालिक एवं सर्वोच्च दार्शनिक ग्रंथ 'श्रीमद्भगवद्गीता' के द्वितीय अध्याय, जिसे 'सांख्य योग' के नाम से जाना जाता है, का यह चौदहवां श्लोक (मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय...) मानव जीवन के सबसे बड़े और गहरे सत्य का उद्घाटन करता है। कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब अर्जुन अपने मोह और विषाद के कारण कर्तव्य-विमुख हो रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल एक योद्धा के रूप में ही नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड के मार्गदर्शक के रूप में व्यावहारिक और परम आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया। यह श्लोक उसी शाश्वत श्रृंखला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो हमें भौतिक जगत की नश्वरता और आंतरिक चेतना की अमरता के बीच के भेद को स्पष्ट रूप से समझाता है।

सांसारिक जीवन में मनुष्य निरंतर सुख और दुःख, ठंड और गर्मी, मान और अपमान, तथा लाभ और हानि के द्वंद्वों (Duality) के बीच घिरा रहता है। ये सभी अनुभव इंद्रियों और उनके विषयों (मात्रास्पर्श) के परस्पर संपर्क से उत्पन्न होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'कौन्तेय' और 'भारत' कहकर संबोधित करते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि वे महान वंश और उच्च संस्कारों से ताल्लुक रखते हैं, अतः उन्हें इन क्षुद्र मानसिक विकारों और संवेदनाओं से ऊपर उठना चाहिए। भारतीय संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'तितिक्षा' (सहनशीलता) को एक महान तपस्या माना गया है। जब कोई साधक या सामान्य मनुष्य सुख और दुःख में समान भाव (समत्व) रखना सीख जाता है, तब उसके जीवन से विकर्षण और आकर्षण का चक्र समाप्त होने लगता है। यह श्लोक केवल एक संस्कृत का श्लोक मात्र नहीं है, बल्कि यह जीवन को जीने की एक ऐसी कला है जो मानसिक शांति, स्थिरता और आधिदैविक संतुलन प्रदान करती है। आधुनिक युग में, जहाँ तनाव, चिंता और अवसाद चरम सीमा पर हैं, इस श्लोक का प्राकट्य और इसका मर्म हमारे जीवन को एक नई दिशा देने में पूरी तरह सक्षम है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर पाठ विधि

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ||१४||


पदान्छेद (पद-विच्छेद):

मात्रा-स्पर्शाः तु कौन्तेय शीत-उष्ण-सुख-दुःख-दाः |
आगम-अपायिनः अनित्याः तान् तितिक्षस्व भारत ||

उच्चारण विधि एवं लय:

इस श्लोक का पाठ करते समय 'मात्रास्पर्शास्तु' में दीर्घ स्वर और अनुस्वार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'कौन्तेय' और 'भारत' संबोधन आदर और प्रेम के भाव से सस्वर पढ़ने चाहिए। प्रत्येक पंक्ति के अंत में विश्राम (यति) देकर पढ़ने से इसका आंतरिक सौंदर्य और अर्थ और अधिक स्पष्ट हो जाता है। नियमित रूप से प्रातःकाल स्नान के पश्चात इस श्लोक का तीन, सात या ग्यारह बार सस्वर पाठ करने से मन में एक अलौकिक ऊर्जा का संचार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
मात्रास्पर्शाः इंद्रियों और उनके विषयों का संपर्क इंद्रियों (श्रोत्र, त्वचा, चक्षु आदि) का अपने विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप आदि) के साथ जुड़ना।
तु परंतु, लेकिन एक नया और अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक मोड़ देने वाला अव्यय।
कौन्तेय हे कुंतीपुत्र (अर्जुन) माता कुंती के पराक्रमी पुत्र को उनके उच्च कुल और शौर्य का स्मरण कराना।
शीतोष्ण सर्दी और गर्मी प्रकृति के दो प्रमुख भौतिक द्वंद्व जो शरीर को प्रभावित करते हैं।
सुखदुःखदाः सुख और दुःख को देने वाले मन और इंद्रियों के स्तर पर सुख और पीड़ा का अनुभव कराने वाले कारक।
आगमापायिनः आने-जाने वाले (उत्पन्न होकर नष्ट होने वाले) इन अनुभवों की शाश्वतता न होना; इनका निरंतर बदलते रहना।
अनित्याः अस्थायी, नाशवान जो सच नहीं हैं, जिनका अस्तित्व केवल कुछ समय के लिए है।
तान् उन (सबको) उन तमाम सुख, दुःख, ठंड, गर्मी और परिस्थितियों को।
तितिक्षस्व सहन करो, सहनशीलता अपनाओ बिना किसी क्षोभ या विलाप के धैर्यपूर्वक उन्हें सहन करने की कला।
भारत हे भरतवंशी (अर्जुन) भरतवंश की महान परंपरा के वाहਕ होने के नाते धैर्य धारण करने का उपदेश।

विस्तृत भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण यहाँ समझाते हैं कि जिस प्रकार सर्दी और गर्मी ऋतुओं के परिवर्तन से आती-जाती हैं और शरीर को प्रभावित करती हैं, ठीक उसी प्रकार संसार के सुख और दुःख भी इंद्रियों के माध्यम से आते और चले जाते हैं। ये कभी भी एक जैसे नहीं रहते। चूँकि ये अनित्य (अस्थायी) हैं, इसलिए एक बुद्धिमान मनुष्य को इनके आने पर बहुत अधिक हर्षित और जाने पर अत्यंत दुखी नहीं होना चाहिए, बल्कि इन्हें धीरज के साथ सहन करना चाहिए।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & Context)

महाभारत के महायुद्ध का आरंभ होने से ठीक पहले, कौरव और पांडव सेनाएं कुरुक्षेत्र के खुले मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं। पाण्डव सेना के मुख्य सेनापति और महान धनुर्धर अर्जुन ने जब अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण (जो उनके सारथी बने थे) से कहा, तो उन्होंने देखा कि सामने खड़े लोगों में उनके अपने गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, भाई, चचेरे भाई और मित्र खड़े हैं। इस अदृश्य मोह और करुणा के आतिरेक में अर्जुन का गांडीव धनुष उनके हाथों से छूटने लगा। उनका शरीर कांपने लगा, मुंह सूखने लगा और उनके मन में यह विचार आया कि ऐसे स्वजनों की हत्या करके मिलने वाला राज्य या सुख किसी काम का नहीं है।

इस महान विषाद और मानसिक अवसाद की स्थिति में अर्जुन ने अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए और भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाकर कहा— "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः..." (मैं कायरता रूपी दोष से ग्रस्त हूँ और धर्म के विषय में मोहग्रस्त होकर आपसे पूछता हूँ कि जो मेरे लिए श्रेष्ठ हो, वह निश्चित रूप से कहें)। अर्जुन की इस विकल अवस्था को दूर करने के लिए और उन्हें उनके क्षत्रिय धर्म तथा आत्मिक स्वरूप का बोध कराने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान ज्ञान का सूत्रपात किया।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत महाकाव्य के अंतर्गत भीष्म पर्व का यह प्रसंग केवल एक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह हर उस मनुष्य की कथा है जो जीवन के हर मोड़ पर भ्रमित और दुखी होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह समझाया कि शरीर नश्वर है और इंद्रियों के भोग अस्थायी हैं। यदि तुम केवल शरीर और सुख-दुःख के स्तर पर ही सोचते रहोगे, तो कभी भी मोक्ष या वास्तविक शांति को प्राप्त नहीं कर पाओगे। अतः अपने भीतर स्थित उस अचल आत्म-तत्त्व को पहचानो जो इन सभी परिवर्तनों से परे, द्रष्टा और साक्षी रूप में स्थित है। यही इस श्लोक की महत्ता और इसकी ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि का मूल सार है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

1. मानसिक स्थिरता एवं एकाग्रता

इस श्लोक के नियमित स्मरण से मन की चंचलता शांत होती है और व्यक्ति छोटी-छोटी परिस्थितियों से विचलित नहीं होता।

2. तितिक्षा (सहनशीलता) की वृद्धि

जीवन के कष्टों, अपमान और प्रतिकूल परिस्थितियों को धैर्य के साथ सहन करने की अद्भुत आंतरिक शक्ति विकसित होती है।

3. तनाव एवं अवसाद से मुक्ति

सुख और दुःख के प्रति आसक्ति कम होने के कारण आधुनिक युग की सबसे बड़ी समस्या—तनाव और डिप्रेशन से सहज ही मुक्ति मिलती है।

4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

गीता के वचनों का निरंतर चिंतन करने से आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और एक उच्च सकारात्मक और दिव्य औरा (Aura) का निर्माण होता है।

5. कर्मयोग की भावना का विकास

फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहने की प्रेरणा मिलती है, जिससे कर्मों के बंधन क्षीण होने लगते हैं।

6. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

राग और द्वेष से मुक्ति मिलने के कारण पुराने संचित कर्मों का प्रभाव कम होता है और चेतना का उच्च स्तर पर विकास होता है।

7. स्थितप्रज्ञता की प्राप्ति

यह श्लोक उस स्थिति की ओर पहला कदम है जहाँ साधक सुख और दुःख में एकसमान रहता है, जिसे गीता में स्थितप्रज्ञ कहा गया है।

8. ईश्वरीय कृपा और शरणागति

भगवान के वचनों पर पूर्ण विश्वास करने से साधक को भगवद्कृपा का अनुभव होता है और उसका आध्यात्मिक जीवन उन्नत होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को प्राचीन आर्ष ग्रन्थों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य के संदर्भों सहित), तथा पारंपरिक वैदिक विद्वानों के परामर्श के आधार पर अत्यंत सावधानी और शुचिता के साथ तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन संस्कृति के शुद्ध, प्रामाणिक और वैज्ञानिक सत्यों को पहुंचाना है ताकि वे अपने दैनिक जीवन में आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकें। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक गुरुजनों या प्रामाणिक टीकाओं का अध्ययन करने की सलाह दी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का चौदहवां (14वां) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सांख्य दर्शन और आत्म-तत्त्व का विस्तृत ज्ञान दिया है।

'मात्रास्पर्शाः' का अर्थ है— इंद्रियों (जैसे आंख, कान, त्वचा आदि) और उनके विषयों (जैसे रूप, शब्द, स्पर्श आदि) का आपस में संपर्क होना। जब इंद्रियां अपने विषयों के संपर्क में आती हैं, तो मनुष्य को सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख जैसे अनुभव होते हैं।

'तितिक्षस्व' का अर्थ है 'धैर्यपूर्वक सहन करो'। तितिक्षा सनातन धर्म के षडसपत्तियों (या साधना के अंगों) में से एक है। इसका अर्थ जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों, सुख-दुःख और द्वंद्वों को बिना किसी शिकायत या मानसिक अशांति के सहन करना है।

सांसारिक सुख और दुःख कभी भी एक जैसे नहीं रहते। वे ऋतुओं की तरह आते हैं और चले जाते हैं (आगमापायिनः)। चूँकि उनका कोई शाश्वत अस्तित्व नहीं है और वे समय के साथ बदलते रहते हैं, इसलिए उन्हें अनित्य (नाशवान) कहा गया है।

जब भी जीवन में कोई कठिन परिस्थिति, अपमान, अत्यधिक गर्मी-सर्दी या मानसिक कष्ट आए, तब इस श्लोक का स्मरण करना चाहिए। यह विचार करना चाहिए कि यह स्थिति भी अस्थायी है और चली जाएगी। इस प्रकार समभाव रखकर हम अपने दैनिक जीवन को तनावमुक्त बना सकते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इन्द्रियों के विषयों (शब्द, स्पर्श आदि) के संपर्क से जो सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी आदि उत्पन्न होते हैं, वे आते-जाते रहते हैं और अनित्य हैं। इसलिए हे भारत, तू उन्हें सहन करना सीख। O Arjuna, the sense perceptions of heat and cold, pleasure and pain, are temporary – they come and go. Learn to tolerate them without disturbance.

व्यावहारिक ज्ञान / Practical Wisdom

यह श्लोक हमें सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियों से विचलित न हों। सुख और दुःख तो आते ही रहेंगे, लेकिन हमारा आंतरिक साम्य बना रहना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 14 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 14/72 19% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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