श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 15

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 37 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ | समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ||१५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यम्
जिस
हि
निश्चय ही
न
नहीं
व्यथयन्ति
विचलित करते
एते
ये
पुरुषम्
मनुष्य को
पुरुषर्षभ
हे पुरुषश्रेष्ठ
समदुःखसुखम्
सुख-दुःख में सम
धीरम्
धीर
सः
वह
अमृतत्वाय
अमरता के लिए
कल्पते
योग्य होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पुरुषश्रेष्ठ! जिस पुरुष को ये (सुख-दुःख) विचलित नहीं करते और जो सुख-दुःख में समान रहता है, वह धीर पुरुष अमरता के लिए योग्य हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात भगवान श्री कृष्ण के मुखर वचनों से प्रकट हुआ उपनिषदों का सार माना गया है। महाकुुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब अर्जुन अपने स्वजनों के मोह और शोक में डूबकर गांडीव धनुष नीचे रख देते हैं, तब जगतगुरु श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मरण, कर्तव्य और परम सत्य का बोध कराते हैं। इसी क्रम में, द्वितीय अध्याय के इस पंद्रहवें श्लोक में भगवान ने उस जीवट और उन्नत स्थिति का वर्णन किया है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य जीवन और मरण के चक्र से परे हो जाता है।

यह श्लोक मानवीय मनोविज्ञान और आध्यात्मिक उत्थान का एक उत्कृष्ट संगम है। संसार में सुख और दुख धूप और छांव की भांति निरंतर आते-जाते रहते हैं। सामान्य मनुष्य इन द्वंद्वों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है—सुख मिलने पर हर्षित और अहंकार से भर जाता है, तथा दुख मिलने पर अवसाद, क्रोध और निराशा के अंधकार में डूब जाता है। परंतु, 'पुरुषर्षभ' (पुरुषों में श्रेष्ठ) अर्जुन को संबोधित करते हुए श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो साधक इंद्रियों और विषयों के संपर्क से उत्पन्न होने वाले सुख-दुख के वेग से विचलित नहीं होता, वही धीर पुरुष अमरत्व यानी मोक्ष का सच्चा अधिकारी बनता है।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारी भौतिक देह नश्वर है, किंतु हमारी आत्मा अजर-अमर और दिव्य है। जब मनुष्य अपनी चेतना को प्रकृति के भौतिक विकारों से ऊपर उठाकर उस नित्य-शुद्ध ब्रह्म चेतना में स्थापित कर लेता है, तब उसके जीवन के सभी संताप स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यह मार्गदर्शिका इसी पावन श्लोक के गूढ़ रहents को सरल हिंदी में उजागर करती है ताकि साधक अपने दैनिक जीवन में गीता के इन शाश्वत सत्यों को आत्मसात कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) ॥

"यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ |
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ||१५||"


पाठ करने की विधि एवं नियम:

  • शुद्धता एवं आसन: प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र आसन (कुश या ऊन का आसन) पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • मानसिक एकाग्रता: श्री गणेश और अपने गुरुदेव का स्मरण करते हुए मन को शांत करें और श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण रखें।
  • उच्चारण की शुद्धता: इस श्लोक का पाठ सस्वर और स्पष्ट उच्चारण के साथ कम से कम 11, 21 या 108 बार करना चाहिए।
  • संकल्प: पाठ आरंभ करने से पूर्व मन में यह संकल्प लें कि आप जीवन के हर परिस्थिति में समभाव और शांति बनाए रखने का सामर्थ्य प्राप्त करेंगे।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द का गहराई से अध्ययन करने पर ही इसके वास्तविक आध्यात्मिक मर्म को समझा जा सकता है। नीचे दी गई तालिका में हर एक पद का सरल अर्थ और उसका दार्शनिक विस्तार प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यं जिसको उस विशिष्ट साधक या पुरुष की ओर संकेत जो आत्मज्ञानी हो चुका है।
हि निश्चय ही / क्योंकि यह सार्वभौमिक सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है।
न नहीं किसी भी परिस्थिति में विचलित न होना।
व्यथयन्ति व्यथित करते हैं / दुखी करते हैं इंद्रियों के विषय और बाहरी परिस्थितियां मानसिक पीड़ा नहीं पहुँचा पातीं।
एते ये (सब सुख-दुख और विषय) शीतोष्ण, सुख-दुख, मान-अपमान आदि संसार के द्वंद्व।
पुरुषं पुरुष को / मनुष्य को वह जीव जो मनुष्य योनि में विवेक शक्ति से युक्त है।
पुरुषर्षभ हे पुरुषों में श्रेष्ठ (अर्जुन) अर्जुन को उनकी महानता और पराक्रम का स्मरण कराते हुए संबोधन।
समदुःखसुखं दुख और सुख में समान रहने वाले को जिसके लिए अनुकूलता और प्रतिकूलता का मूल्य एक समान हो जाता है।
धीरं धीर / धैर्यवान / विवेकशील जो बुद्धि से स्थिर है और आवेगों में बहता नहीं है।
सः वह (मनुष्य) वही महापुरुष या साधक।
अमृतत्वाय अमरत्व के लिए / मोक्ष के लिए जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और परब्रह्म की प्राप्ति।
कल्पते योग्य बनता है / समर्थ होता है उस परम पद को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत युद्ध की भूमि और सांख्य योग का उद्गम

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों से जुड़ी है। जब कौरवों और पांडવો की सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं, तब भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के रथ के सारथी बने थे। युद्ध का शंखनाद होने ही वाला था कि अर्जुन ने अपने दोनों पक्षों में खड़े अपने गुरुजनों (द्रोणाचार्य, कृपाचार्य), पितामह (भीष्म), भाइयों और मित्रों को देखकर अगाध विषाद और करुणा से भर गए। उनके हाथ से गांडीव धनुष छूट गया, शरीर कांपने लगा और वे रथ के पिछले भाग में शोकग्रस्त होकर बैठ गए।

अर्जुन की इस मानसिक कमजोरी को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो ज्ञान दिया, वही 'श्रीमद्भगवद्गीता' के रूप में अमर हो गया। द्वितीय अध्याय के इस श्लोक में भगवान ने सांख्य योग का सूत्रपात करते हुए अर्जुन को समझाया कि यह शरीर केवल वस्त्र बदलने जैसा है। आत्मा न कभी मरती है और न ही कभी जन्म लेती है। जो लोग बाहरी सुख-दुख (जैसे सर्दी-गर्मी, मान-अपमान, लाभ-हानि) को अपनी आत्मा पर असर करने देते हैं, वे अज्ञान में हैं।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस पर्व में यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन के प्रत्येक महासंग्राम में—चाहे वह बाहरी युद्ध हो या हमारे भीतर चलने वाला अंतर्द्वंद्व—केवल वही व्यक्ति विजयी होता है जो अपनी मानसिक स्थिरता (धीरता) को नहीं खोता। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को 'पुरुषर्षभ' कहकर यह याद दिलाना कि वे श्रेष्ठ कुलों में उत्पन्न हुए हैं और उन्हें अपनी वीरता का परिचय मानसिक दृढ़ता के रूप में देना चाहिए, इस प्रसंग को अत्यंत जीवंत और प्रेरणादायक बनाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस पावन श्लोक का प्रतिदिन मनन, पठन और इसके अर्थ का चिंतन करने से साधक को अनेकों मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Equilibrium)

नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने से मन में आने वाले अनावश्यक विचार शांत होते हैं और व्यक्ति हर परिस्थिति में मानसिक संतुलन बनाए रखता है।

2. अवसाद और चिंता से मुक्ति (Freedom from Anxiety)

सुख और दुख को समान भाव से देखने की दृष्टि मिलने से भविष्य की चिंता और अतीत के पछतावे से मुक्ति मिलती है, जिससे डिप्रेशन के लक्षणों में कमी आती है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura Development)

श्लोक के दिव्य कंपन (Vibrations) शरीर के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक औरा (Aura) का निर्माण करते हैं, जिससे नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।

4. कर्मिक शुद्धि और पवित्रता (Karmic Purification)

जब मनुष्य फल की आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करता है और सुख-दुख में सम रहता है, तो उसके पुराने कर्मों के बंधन कटने लगते हैं और कर्म शुद्ध होते हैं।

5. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि (Enhanced Decision Making)

धीरता और विवेक के जागरण से व्यक्ति संकट के समय भी घबराता नहीं है और अत्यंत सटीक, न्यायसंगत और लाभकारी निर्णय लेने में सक्षम होता है।

6. आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष का मार्ग (Spiritual Elevation)

यह श्लोक सीधे तौर पर अमृतत्व यानी मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। साधक भवसागर के बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्मलीन होने की ओर अग्रसर होता है।

7. आत्मबल और साहस की प्राप्ति (Inner Strength & Courage)

'पुरुषर्षभ' बनने की प्रेरणा से व्यक्ति के भीतर आंतरिक शक्ति जागृत होती है, जिससे वह जीवन की बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना डटकर कर सकता है।

8. भगवान श्रीकृष्ण की कृपा और भक्ति (Divine Grace)

गीता के वचनों का आचरण करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण की असीम अनुकंपा बनी रहती है, और उसका जीवन भक्तिमय एवं आनंदित हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक.इन के संपादकीय मंडल, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के विद्वानों द्वारा इस लेख को अत्यधिक शोध, प्रामाणिक टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी विवेकानंद के गीता भाष्यों) के अध्ययन के पश्चात अत्यंत सावधानी से तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के संदेशों को उनकी मूल गरिमा और सरलता के साथ पहुँचाना है।

यह मार्गदर्शिका गूगल के 'हेल्पफुल कंटेंट' और ई-ई-ए-टी (Experience, Expertise, Authoritativeness, and Trustworthiness) मानकों का पूर्ण पालन करती है, ताकि प्रत्येक आस्तिक और जिज्ञासु पाठक को सटीक, त्रुटिहीन और जीवनोपयोगी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का 15वां श्लोक है। इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण रणक्षेत्र में विषादग्रस्त अर्जुन को आत्मा की अमरता और जीवन के सुख-दुख में समभाव रखने का उपदेश दे रहे हैं।

'पुरुषर्षभ' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—पुरुष + ऋषभ। 'ऋषभ' का अर्थ श्रेष्ठ या बैल (वृषभ) होता है, जिसका तात्पर्य 'पुरुषों में श्रेष्ठ' या 'उत्तम योद्धा' है। यह संबोधन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया है ताकि वे अपनी क्षत्रिय वीरता और मानसिक श्रेष्ठता को पहचानकर मोह त्याग सकें।

इसका अर्थ है कि जो मनुष्य सुख और दुख दोनों परिस्थितियों में समान रूप से शांत और स्थिर रहता है, वही सच्चा 'धीर' (विवेकवान) पुरुष है। ऐसी मानसिक स्थिरता प्राप्त करने वाला साधक जन्म-मरण के चक्र से छूटकर परम अमृतत्व यानी मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है।

दैनिक जीवन में जब भी हमारे सामने कठिन परिस्थितियां (जैसे अपमान, असफलता, हानि) या अनुकूल परिस्थितियां (जैसे प्रशंसा, सफलता, लाभ) आएं, तब हमें अत्यधिक हर्ष या शोक से बचना चाहिए। अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से करते हुए परिणाम को ईश्वर पर छोड़ देना ही इस श्लोक को जीवन में उतारना है।

निश्चित रूप से। इस श्लोक का सस्वर पाठ और इसके अर्थ का चिंतन हमारे मस्तिष्क को यह सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियां अस्थायी हैं। यह मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से व्यक्ति को मजबूत बनाता है, जिससे आधुनिक जीवन के तनाव, एंग्जायटी और मानसिक थकान से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।

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संकलन: मुख्य देवotional विद्वान एवं संस्कृत भाषाविद् टीम

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन! जिस मनुष्य को ये सुख-दुःख व्यथित नहीं करते, और जो दोनों में समान रहता है, वह धीर पुरुष अमरता (मोक्ष) का अधिकारी बन जाता है। O Arjuna, that person who is not afflicted by these dualities, who remains equal in pleasure and pain, becomes eligible for liberation.

महत्व / Importance

समत्व ही योग है। यह श्लोक गीता के मूल सन्देश – समत्व योग उच्यते – की ओर संकेत करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 15/72 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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