श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 18

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 15 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ||१८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
अन्तवन्तः
नाशवान
इमे
ये
देहाः
शरीर
नित्यस्य
नित्य
उक्ताः
कहे गए हैं
शरीरिणः
शरीरी (आत्मा) के
अनाशिनः
अविनाशी
अप्रमेयस्य
अप्रमेय (इन्द्रियों से अगम्य)
तस्मात्
इसलिए
युध्यस्व
युद्ध कर
भारत
हे भारत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत! तू युद्ध कर।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्माण्डकीय चेतना

सनातन धर्म और भारतीय मनीषी परंपरा में श्रीमद्भगवद्गीता को उपनिषदों का सार और समस्त वेदों का निचोड़ माना गया है। महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब अर्जुन अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और बन्धु-बान्धवों को सामने देखकर विषाद से ग्रस्त हो जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जो उपदेश देते हैं, वह केवल एक योद्धा का मार्गदर्शन नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए भवसागर से पार उतरने की अचूक नौका है। 'अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः' श्लोक गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) का एक ऐसा मेरुदण्ड है, जो जीवन और मृत्यु के सबसे बड़े भ्रम को एक झटके में छिन्न-भिन्न कर देता है।

इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी उत्पन्न हुआ है, उसका विनाश निश्चित है। यह नियम भौतिक जगत (प्रकृति) के प्रत्येक अणु पर लागू होता है, चाहे वह मनुष्य का स्थूल शरीर हो, विशालकाय पर्वत हों, या चमकते हुए नक्षत्र। परंतु इस नश्वरता के परे एक अजर, अमर और अविनाशी तत्व भी विद्यमान है, जिसे हम 'आत्मा' या 'शरीरी' कहते हैं। जब तक मनुष्य अज्ञानता के अंधकार में जीता है, तब तक वह नाशवान शरीर को ही अपना सर्वस्व मानकर शोक और मोह के बंधनों में जकड़ा रहता है। जिस क्षण उसे आत्मा के नित्य स्वरूप का बोध होता है, उसके भीतर का सारा भय, लालसा और कर्तव्य-विमुखता का भाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष अध्ययन में हम इसी महान श्लोक के अंतरंग में उतरेंगे। हम समझेंगे कि कैसे भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह को भंग करने के लिए सांख्य दर्शन का अत्यंत वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार प्रस्तुत करते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन की हर परिस्थिति में अपने कर्तव्यों (धर्म) का पालन करते हुए, परिणामों की आसक्ति से ऊपर उठकर कैसे जिया जाए। यह केवल एक धार्मिक श्लोक नहीं है, बल्कि मानसिक दृढ़ता, कर्मयोग और आत्मसाक्षात्कार का जीवंत ग्रंथ है जो हर पाठक के अंतःकरण को जागृत करने की सामर्थ्य रखता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीयोऽध्यायः (सांख्ययोगः) — श्लोक १८

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः l
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ll १८ ll

"हे भारत (अर्जुन)! इन नश्वर शरीरों के भीतर रहने वाली आत्मा (शरीरी) नित्य, अविनाशी और अप्रमेय (तर्क से परे) है। इसलिए, हे भारत, तुम युद्ध करो।"

पाठ विधि एवं ध्यान:

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल स्नान करके पवित्र मन से करना चाहिए। पाठ करते समय अपने इष्टदेव या भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें। श्लोक का उच्चारण करते समय दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि इसके कंपन (Vibration) से मन में सात्विक ऊर्जा का संचार हो सके।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

संस्कृत व्याकरण और वेदान्त दर्शन के दृष्टिकोण से इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का अपना विशिष्ट और गहरा अर्थ है। नीचे दी गई तालिका में शब्दों के सरल अर्थ के साथ उनके दार्शनिक मर्म को स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अन्तवन्तः अंत वाले, नाशवान, समाप्त होने वाले यह भौतिक शरीर प्रकृति के पांच तत्वों से बना है और इसका विनाश निश्चित है।
इमे ये सब प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाले समस्त भौतिक शरीर और संसार की वस्तुएं।
देहाः शरीर (भौतिक देह) जो लगातार बदल रहा है और अंततः जीर्ण होकर नष्ट हो जाता है।
नित्यस्य सदा रहने वाले, अमर, सनातन आत्मा काल, अवस्था और स्थान के परिवर्तनों से परे हमेशा एक जैसी रहती है।
उक्ताः कहे गए हैं, बताए गए हैं तत्वज्ञानी ऋषियों और वेदों द्वारा यह अकाट्य सत्य घोषित किया गया है।
शरीरिणः शरीर में रहने वाली आत्मा वह चेतन सत्ता जो इस नश्वर देह को धारण करती है और इसका संचालन करती है।
अनाशिनः जिसका कभी नाश न हो आत्मा को न तो शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है, न पानी भिगो सकता है।
अप्रमेयस्य तर्क और इंद्रियों की पकड़ से परे इसे साधारण बुद्धि, प्रयोगशालाओं या भौतिक उपकरणों से नहीं मापा जा सकता, यह केवल आनुभविक है।
तस्मात् इसलिए, इस कारण से सत्य के इस बोध को प्राप्त करने के बाद अब कोई संदेह नहीं रहना चाहिए।
युध्यस्व युद्ध करो, संघर्ष करो अपने नियत कर्तव्य, धर्म और कर्मपथ से पीछे मत हटो, पूरी निष्ठा से कर्म करो।
भारत हे भरतवंशी अर्जुन! अर्जुन को उनके महान वंश और उच्च उत्तरदायित्व का स्मरण कराना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के अवतरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध से जुड़ी हुई है। जब कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मराज युधिष्ठिर के पक्ष से अर्जुन सेनापति के समान प्रमुख योद्धा थे। युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाकर खड़ा करने का अनुरोध किया। जब अर्जुन ने देखा कि सामने खड़े लोगों में उनके अपने दादा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भाई, भतीजे और मित्र हैं, तो उनका मोह जागृत हो गया।

पारिवारिक प्रेम और पाप के भय से कांपते हुए अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष को नीचे रख दिया और रथ के पिछले भाग में बैठकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि वे युद्ध नहीं करना चाहते। अर्जुन का यह विषाद केवल शारीरिक कमजोरी नहीं था, बल्कि यह मानवता की उस मूल दुर्बलता का प्रतीक था जो हर व्यक्ति अपने जीवन के संकटकालीन क्षणों में अनुभव करता है। वह कर्तव्य और मोह के बीच भ्रमित हो गया था।

यहीं से भगवान श्रीकृष्ण ने एक सच्चे गुरु और जगतगुरु की भूमिका निभाते हुए सांख्य योग का उपदेश देना आरंभ किया। भगवान ने अर्जुन की इस कायरता और मोह को आड़े हाथों लेते हुए सबसे पहले उनके ज्ञान चक्षु खोलने का प्रयास किया। श्रीकृष्ण ने समझाया कि जिसे तुम मारना चाहते हो या जिसके मरने से तुम्हें शोक हो रहा है, वे शरीर हैं जो आज नहीं तो कल काल के गाल में समा जाने वाले हैं। असली तत्व—आत्मा—अमर है। इसलिए शोक करना मूढ़ता है। यह श्लोक उसी संवाद का अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ है, जहाँ भगवान अर्जुन को संशय से निकालकर स्पष्ट कर्मयोग के मार्ग पर चलने का आह्वान करते हैं।

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली यह गीता आज भी संपूर्ण विश्व में शांति, प्रबंधन, और मानसिक संतुलन का सबसे बड़ा ग्रंथ मानी जाती है। यह हमें सिखाती है कि जीवन एक धर्मक्षेत्र है और यहाँ कर्तव्यों से पलायन करना किसी भी स्थिति में समाधान नहीं हो सकता।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अमोघ श्लोक का नियमित मनन, पाठ और इसके अर्थ का चिंतन करने से जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मृत्यु के भय से मुक्ति

आत्मा की अमरता का बोध होने पर व्यक्ति के मन से मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है और वह जीवन को अधिक सार्थक रूप से जीता है.

2. मानसिक शांति और स्थिरता

शारीरिक परिवर्तनों और सुख-दुःख के द्वंद्वों से ऊपर उठकर मन में एक गहरी स्थिरता और आन्तरिक शांति की अनुभूति होती है.

3. कर्तव्यपरायणता और कर्मयोग

परिणामों की चिंता किए बिना अपने दैनिक कर्तव्यों और धर्म का पालन करने की प्रेरणा मिलती है, जिससे कार्यकुशलता बढ़ती है.

4. शोक और मोह का नाश

संसार के नश्वर पदार्थों और संबंधों के प्रति अत्यधिक आसक्ति (मोह) कम होती है, जिससे मानसिक कष्टों से राहत मिलती है.

5. सात्विक ऊर्जा और सकारात्मक आभा

श्लोक का नित्य उच्चारण शरीर और मन के चारों ओर एक मजबूत आध्यात्मिक कवच (Positive Aura) का निर्माण करता है.

6. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

दिव्य ज्ञान के अर्जन से पिछले संचित कर्मों के नकारात्मक प्रभावों का शमन होता है और चित्त शुद्ध होता है.

7. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

भ्रम और दुविधा की स्थितियों में सही और गलत का विवेक करने की शक्ति प्राप्त होती है, जिससे जीवन सुगम बनता है.

8. ईश्वर के प्रति अगाध निष्ठा

भगवान श्रीकृष्ण के वचनों पर विश्वास बढ़ने से भक्त की भगवद् भक्ति दृढ़ होती है और जीवन में समर्पण भाव विकसित होता है.

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Bhaktilok.in Editorial Content): यह आलेख श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत, तथा आद्य शंकराचार्य और स्वामी रामानुजचार्य जैसे महान आचार्यों के भाष्यों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों और उपनिषदों के शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पहुंचाना है।

इस सामग्री को तैयार करते समय भाषा की शुद्धता, दार्शनिक गहराई और गूगल की Helpful Content गाइडलाइन्स का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि प्रत्येक पाठक को एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो सके। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक टीकाओं और योग्य आचार्यों के मार्गदर्शन का अनुसरण करने की सलाह दी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का 18वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले आत्मा और शरीर के भेद को विस्तार से समझाया है।

'शरीरी' का अर्थ उस चेतन तत्व यानी 'आत्मा' से है जो इस नश्वर शरीर (देह) को धारण करता है। शरीर नाशवान है, परंतु शरीर में निवास करने वाली आत्मा नित्य और अमर है।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि युद्ध में मारे जाने वाले शरीर नश्वर हैं और आत्मा अमर है। एक क्षत्रिय के रूप में धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना अर्जुन का कर्तव्य (धर्म) था। कर्तव्य से पलायन करना कायरता है, इसलिए भगवान ने उन्हें युद्ध करने का उपदेश दिया।

'अप्रमेयस्य' का अर्थ है—जो प्रमाणों, तर्क, इंद्रियों और भौतिक उपकरणों की पकड़ से परे हो। आत्मा इतनी सूक्ष्म और अलौकिक है कि उसे सामान्य भौतिक विज्ञान या प्रयोगशालाओं द्वारा नहीं मापा जा सकता, उसकी अनुभूति केवल आत्मज्ञान और योग से ही संभव है।

हम इस श्लोक के संदेश को अपने जीवन में उतारकर भौतिक सुख-सुविधाओं और संबंधों के प्रति अत्यधिक मोह से मुक्त हो सकते हैं। यह हमें असफलता या संकट के समय विचलित हुए बिना अपने नैतिक कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करने की शक्ति देता है।

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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत! तू युद्ध कर। The bodies of the eternal, indestructible, and incomprehensible Self are perishable. Therefore, fight, O Arjuna.

कर्तव्य / Duty

आत्मा की अमरता को जानने के बाद शरीरों के नाश का शोक नहीं करना चाहिए। युद्ध करना अर्जुन का कर्तव्य है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/72 25% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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