श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 23

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 40 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः | न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ||२३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
न
नहीं
एनम्
इस (आत्मा) को
छिन्दन्ति
काटते हैं
शस्त्राणि
शस्त्र
न
नहीं
एनम्
इसको
दहति
जलाता है
पावकः
अग्नि
न
नहीं
च
और
एनम्
इसको
क्लेदयन्ति
गीला करते हैं
आपः
जल
न
नहीं
शोषयति
सुखाता है
मारुतः
वायु।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती, जल नहीं गीला कर सकता और वायु नहीं सुखा सकती।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आत्मा की अमरता और ब्रह्मांडीय सत्य की प्रस्तावना

सनातन धर्म के सर्वोच्च दार्शनिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (जिसे 'सांख्य योग' के नाम से जाना जाता है) का यह तेईसवां (२३वां) श्लोक भारतीय अध्यात्म, वेदान्त दर्शन और सनातन संस्कृति का वह सर्वोच्च स्तंभ है, जिस पर संपूर्ण जीवन और मरण का रहस्य टिका हुआ है। जब-जब मानव मन विषाद, संशय, मृत्यु के भय और अस्तित्वहीनता की आशंका से ग्रस्त होता है, तब-तब यह श्लोक एक महाऔषधि की तरह जीव को पुनर्जीवित कर उसे उसकी मूल अभौतिक एवं दिव्य सत्ता का बोध कराता है।

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के मोह को भंग करते हुए आत्मा (जीव) के उस अद्वितीय स्वरूप का वर्णन करते हैं, जो पंचभौतिक तत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु—से पूरी तरह परे, अछूता और स्वतंत्र है। संसार की हर वस्तु जो इस भौतिक जगत में दिखाई देती है, वह नाशवान है, परिवर्तनशील है और विलीन होने के लिए अभिशप्त है। किंतु, शरीर के भीतर विराजमान वह चेतन तत्व—आत्मा—न तो कभी जन्म लेता है और न ही कभी मरता है। यह श्लोक केवल एक संस्कृत का श्लोक नहीं है, बल्कि यह अस्तित्व के विज्ञान (Ontology) की वह परम ऋचा है जो मनुष्य को भौतिकवादी चंगुल से मुक्त कर अद्वैत और ब्रह्मभाव की ओर ले जाती है।

Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर हम इस महामंत्र के सूक्ष्म से सूक्ष्म अर्थ, व्याकरणगत विन्यास, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और दैनिक जीवन में इसके प्रयोगात्मक महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह मार्गदर्शिका उन सभी साधकों, जिज्ञासुओं और भक्तों के लिए समर्पित है जो अपने भीतर की अजर-अमर ज्योति को पहचानना चाहते हैं और भौतिक दुखों के समंदर से तर कर मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करना चाहते हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

देवनागरी मूल पाठ

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि

नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो

न शोषयति मारुतः॥ २३॥

रोमन लिपि (IAST Transliteration)

nainaṁ chhindanti śastrāṇi

nainaṁ dahati pāvakaḥ |

na cainaṁ kledayantyāpo

na śoṣayati mārutaḥ || 23 ||

पाठ विधि एवं उच्चारण निर्देश:

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात पवित्र मन से करना चाहिए। उच्चारण करते समय 'शस्त्राणि' और 'पावकः' तथा 'क्लेदयन्त्यापो' (क्लेदयन्ति + आपः) की संधियों का स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए। दीर्घ स्वरों पर उचित बल देना श्लोक की ऊर्जा को और अधिक प्रबल बनाता है। इसका नियमित मानसिक जप चित्त की वृत्तियों को शांत करता है और मृत्यु के भय (अभिनिवेश क्लेश) को समूल नष्ट कर देता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

संस्कृत व्याकरण और वेदान्त दर्शन के दृष्टिकोण से इस श्लोक के प्रत्येक पद का गहन अर्थ नीचे सारणीबद्ध किया गया है। यह विश्लेषण साधक को यह समझने में सहायता करता है कि कैसे भगवान श्री कृष्ण ने भौतिक विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय किया है।

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Implication)
न (Na) नहीं निषेधात्मक पद जो आत्मा पर भौतिक प्रभावों के पूर्ण अभाव को सिद्ध करता है।
एनम् (Enam) इस (आत्मा को) प्रत्यक्ष रूप से शरीर के भीतर स्थित उस सूक्ष्म चेतना या दृष्टा की ओर संकेत।
छिन्दन्ति (Chhindanti) काटते हैं / खंड-खंड करते हैं तलवार, खड्ग या किसी भी शस्त्र की काटने की क्षमता का आत्मा पर प्रभाव न होना।
शस्त्राणि (Śastrāṇi) अस्त्र और शस्त्र संसार के सभी प्रकार के घातक हथियार, जो केवल नश्वर शरीर को विभाजित कर सकते हैं।
दहति (Dahati) जलाता है / भस्म करता है अग्नि की दाहक शक्ति, जो भौतिक पदार्थों को राख कर देती है, किंतु चेतना को नहीं छू सकती।
पावकः (Pāvakaḥ) अग्नि / पावन करने वाली आग पंचतत्वों में से एक तेज तत्व, जो केवल जड़ द्रव्यों का रूपांतरण कर सकता है, आत्मा का नहीं।
क्लेदयन्ति (Kledayanti) गीला करती है / गलाती है जल की वह प्रकृति जिससे वस्तुएं घुल जाती हैं या गल जाती हैं।
आपः (Āpaḥ) जल / पानी द्रव तत्व, जो पृथ्वी और शरीर की संरचना को विघटित कर सकता है, परंतु अमर आत्मा पर प्रभावहीन है।
शोषयति (Śoṣayati) सुखाता है वायु का वह प्रचंड वेग जो नमी और जीवन को सोख लेता है।
मारुतः (Mārutaḥ) वायु / पवन देवता पंचतत्वों में वायु तत्व, जो वृक्षों और पर्वतों को हिला सकता है किंतु अभौतिक आत्मा को नहीं सुखा सकता।

विस्तृत भावार्थ: उपर्युक्त शब्दों का समग्र निष्कर्ष यह है कि पृथ्वी पर जितने भी भौतिक साधन या आघात उपलब्ध हैं—चाहे वह शस्त्रों की धार हो, अग्नि की उष्णता हो, जल का प्रवाह हो या वायु का प्रचंड झोंका हो—इनमें से कोई भी तत्व आत्मा को खंडित, दग्ध, क्लिन्न या शोषित करने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आत्मा इन भौतिक तत्वों से सर्वथा भिन्न, सूक्ष्म और चेतनामय है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के उस ऐतिहासिक रणक्षेत्र से जुड़ी हुई है जहाँ महाभारत का महायुद्ध प्रारंभ होने ही वाला था। कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। शंखनाद हो चुका था, युद्ध के नगाड़े बज रहे थे। ऐसे रोमांचक और तनावपूर्ण क्षण में जब हस्तिनापुर के राजकुमार और पांडवश्रेष्ठ अर्जुन ने अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाने को कहा, तो उन्होंने अपने ही परिजनों, गुरुओं (द्रोणाचार्य), कुलपितामह (भीष्म पितामह) और मित्रों को सामने युद्ध की मुमुक्षु स्थिति में खड़ा पाया।

अपनों के संहार की आशंका से अर्जुन का मानसिक संतुलन डगमगा गया। उनके हाथ से गाण्डीव धनुष फिसलने लगा, शरीर कांपने लगा, मुंह सूखने लगा और उनके मन में गहरा विषाद छा गया। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि वे इस युद्ध को नहीं लड़ेंगे क्योंकि अपनों को मारकर प्राप्त होने वाला राज्य या सुख रक्त रंजित और पापमय होगा। अर्जुन का यह मोह और कायरताजन्य विलाप केवल एक व्यक्ति का संकट नहीं था, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति के उस अज्ञान का प्रतीक था जो शरीर और आत्मा को एक मान बैठता है।

तब जगतगुरु श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इसी भ्रम को तोड़ने के लिए 'सांख्य योग' का उपदेश दिया। भगवान ने सबसे पहले अर्जुन को डांटा और कहा कि यह क्लीब्य (नपुंसकता या कमजोरी) तुम्हारे अनुकूल नहीं है। इसके पश्चात, उन्होंने जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य को खोलते हुए समझाया कि जिसे तुम मारना चाहते हो या जिससे तुम्हें मोह है, वह केवल नश्वर शरीर है। शरीर बदलता है, वस्त्र की तरह पुराना होने पर त्याग दिया जाता है, किंतु भीतर बैठा वास्तविक 'मैं' यानी आत्मा अमर है। यह श्लोक उसी महान उपदेश की धुरी है, जो महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में सुरक्षित है।

कुरुक्षेत्र का उपदेश

"अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥" — भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए स्पष्ट किया कि ज्ञानीजन न तो जीवित के लिए और न ही मृत के लिए शोक करते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस दिव्य श्लोक का स्मरण, मनन और नियमित पाठ करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। शास्त्रीय मान्यताओं और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसके निम्नलिखित प्रमुख लाभ हैं:

1. मृत्यु के भय से मुक्ति (Overcoming Fear of Death)

इस श्लोक का नियमित ध्यान करने से मनुष्य के भीतर से अकाल मृत्यु, दुर्घटना या उम्र के ढलने का स्वाभाविक भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है, क्योंकि वह यह जान जाता है कि आत्मा अजर-अमर है।

2. मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Peace & Stability)

अत्यधिक तनाव, अवसाद (Depression) और निर्णयहीनता की स्थिति में यह श्लोक मन को anchoring प्रदान करता है, जिससे मस्तिष्क में शांति और स्थिरता का संचार होता है।

3. सकारात्मक और दिव्य औरा का निर्माण (Positive Aura)

इसके संस्कृत शब्दों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Vibrations) शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि के आध्यात्मिक ऊर्जा आवरण (Aura) का निर्माण करते हैं जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखते हैं।

4. कर्मयोग की प्रेरणा (Inspiration for Karma Yoga)

आत्मा की अमरता का बोध होने पर व्यक्ति फल की आसक्ति से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों (कर्म) का पालन करता है, जिससे उसके संचित कर्म शुद्ध होते हैं और कर्मबंधन कमजोर पड़ते हैं।

5. शोक और मोह का नाश (Eradication of Grief & Attachment)

प्रियजनों के वियोग या मृत्यु पर उत्पन्न होने वाले असहनीय मानसिक आघात को सहन करने और जीवन के वास्तविक सत्य को स्वीकार करने की आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है।

6. आत्म-साक्षात्कार की यात्रा (Journey to Self-Realization)

यह श्लोक साधक को 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) और 'अयम् आत्मा ब्रह्म' की वेदान्त दर्शन की उच्च अवस्थाओं की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करता है।

7. संकट काल में धैर्य (Patience during Crises)

जीवन के बड़े से बड़े संकट, आपदा या पराजय के समय भी व्यक्ति अंदर से टूटता नहीं है, क्योंकि उसे अपने शाश्वत स्वरूप का ज्ञान रहता है।

8. ईश्वर के प्रति गाढ़ शरणागति (Surrender to the Divine)

श्रीकृष्ण के मुख से कहे गए इन वचनों को आत्मसात करने से साधक की बुद्धि में दिव्यता आती है और वह परमात्मा के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदान्त दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता (विशेषकर आदि शङ्कराचार्य, स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामसुखदास जी की टीकाओं) के प्रामाणिक ग्रंथों के गहन अध्ययन और व्याकरणिक विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन संस्कृति के मूल एवं शुद्ध सत्यों को बिना किसी मिलावट या अतिशयोक्ति के पहुँचाना है।

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अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का 23वां (२३) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता और कर्तव्य का महान उपदेश दिया है।

इस श्लोक में चार प्रमुख भौतिक साधनों और तत्वों का उल्लेख किया गया है जो शरीर को नष्ट कर सकते हैं—1. शस्त्र (जो काट सकते हैं), 2. पावक यानी अग्नि (जो जला सकती है), 3. आपः यानी जल (जो गला सकता है), और 4. मारुतः यानी वायु (जो सुखा सकती है)। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इनमें से कोई भी तत्व आत्मा को प्रभावित नहीं कर सकता।

इस श्लोक का नियमित स्मरण करने से मृत्यु का भय समाप्त होता है, मानसिक तनाव व अवसाद कम होता है, और कठिन परिस्थितियों में भी आंतरिक स्थिरता तथा धैर्य बनाए रखने की शक्ति मिलती है।

अध्यात्म और वेदान्त के अनुसार, आत्मा ऊर्जा का वह शुद्धतम और सूक्ष्म रूप है जो भौतिक विज्ञान के नियमों (जैसे ऊर्जा का संरक्षण का सिद्धांत) से भी परे चेतना का मूल स्रोत है। हालांकि विज्ञान अभी तक चेतना को पूरी तरह माप नहीं पाया है, किंतु प्राचीन भारतीय ऋषियों ने इसे अनुभूत सत्य के रूप में प्रतिपादित किया है।

इस श्लोक को सीखने के लिए पहले इसके प्रत्येक शब्द (नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...) का शुद्ध उच्चारण अभ्यास करना चाहिए। प्रातःकाल स्नान के पश्चात शांत चित्त से इसका 11 या 21 बार मानसिक पाठ करना अत्यंत लाभदायक और फलदायी माना गया है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती, जल नहीं गीला कर सकता, वायु नहीं सुखा सकती। The Self cannot be cut by weapons, burned by fire, wetted by water, or dried by wind.

अभौतिकता / Non-material Nature

आत्मा पंचमहाभूतों से परे है। वह अविनाशी, अविकारी और सदा एकरस है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/72 32% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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